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‘त्र्यम्बकं यजामहे… से जब सजीव हुआ शिवत्व – सोयत नगर में रामेश्वर धाम का अलौकिक प्राकट्य

तीन दिन रुद्रयज्ञ से गुंजता रहा नगर | जानिए कैसे प्रकट हुए बाबा भोलेनाथ रामेश्वर धाम में

“ॐ त्र्यम्बकं यजामहे सुगन्धिं पुष्टिवर्धनम्,
उर्वारुकमिव बन्धनान्मृत्योर्मुक्षीय माऽमृतात्॥”

जनमत जागरण @ सोयतकलां । जब वैदिक ऋचाएं आकाश को स्पर्श कर रही हों, भूमि पर रुद्राग्नि प्रज्वलित हो, और भक्तों की भावधारा शिवमयी हो – तब वहां केवल मंदिर नहीं बनते, धाम प्रकट होते हैं। ऐसा ही दृश्य देखने को मिला सोयत नगर में, जहाँ जादौन परिवार द्वारा निर्मित बाबा भोलेनाथ मंदिर में तीन दिवसीय रुद्र महायज्ञ और वैदिक विधान के पश्चात रामेश्वर धाम के रूप में शिव परिवार की प्राण प्रतिष्ठा हुई।

धर्म, श्रद्धा और परंपरा का त्रिवेणी संगम

नगर के पिड़ावा रोड पर स्थित श्री रमन बिहारी मंदिर के समीप, जादौन परिवार के निवास प्रांगण में निर्मित इस शिव मंदिर की स्थापना केवल स्थापत्य कला नहीं, बल्कि संस्कृति और संस्कारों की पुनर्स्थापना है।

पं. राम गोपाल शास्त्री और पं. चंद्रशेखर चतुर्वेदी के आचार्यत्व में तीन दिनों तक चले इस आयोजन में स्वाति नक्षत्र के पावन योग में भगवान शंकर, माता पार्वती, श्रीगणेश, कार्तिकेय एवं नंदी सहित पूरे शिव परिवार की प्रतिष्ठा की गई।

अनुष्ठानों की दिव्यता – हर क्षण बना एक उत्सव

  • शनिवार (हनुमान जन्मोत्सव): नगर में भव्य कलश यात्रा निकाली गई, जिसमें महिलाओं ने श्रृंगारित कलशों के साथ भक्ति की सुंदर धारा बहाई।
  • रविवार: महाभिषेक, अन्नाधिवास एवं शोभायात्रा के माध्यम से मंदिर क्षेत्र देव लोक में परिवर्तित हुआ।
  • सोमवार: पूर्णाहुति, प्राण प्रतिष्ठा एवं महाआरती के साथ शिवधाम में शिवत्व का साक्षात अवतरण हुआ। विशाल महाप्रसादी के आयोजन में सैकड़ों श्रद्धालुओं ने भाग लिया।

रामेश्वर धाम – केवल मंदिर नहीं, एक जागृत चेतना

इस आयोजन के मुख्य यजमान रहे ठा. विजयपाल सिंह जादौन, ठा. नरेंद्रपाल सिंह जादौन एवं कुंवर पुष्कर राजसिंह जादौन, जिन्होंने भाव, समर्पण और संस्कार के साथ इस धाम का निर्माण करवाया। श्रद्धालुओं ने इसे “सोयत की आत्मा में बसा शिव लोक” कहा।

रामेश्वर धाम अब न केवल पूजन का स्थान है, बल्कि सांस्कृतिक चेतना, वैदिक परंपरा और सामाजिक समरसता का केन्द्र बनेगा।


यह कोई सामान्य निर्माण नहीं, यह शिव की कृपा से निर्मित वह स्थल है जहाँ “ॐ नमः शिवाय” की ध्वनि पीढ़ियों तक गूंजती रहेगी।
सोयत की इस पुण्य भूमि पर रामेश्वर धाम, वैदिक संस्कृति का जीवंत स्तंभ बनकर खड़ा हो गया है।

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