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तेल: जो दे ऊर्जा वही बन गया रोगों की जड़! | जानिए रिफाइंड तेल के खतरनाक रहस्य

राजीव जी दीक्षित के देसी स्वास्थ्य अभियान पर आधारित लेखमाला – स्वास्थ्य संकल्प 365
भाग 9: तेल – ऊर्जा का स्रोत या हृदय का शत्रु?
“365 दिन – शरीर विज्ञान की देसी व्याख्या, स्वस्थ जीवन की सटीक दिशा”
“विज्ञान नहीं, विवेक की बात”


तेल – ऊर्जा का स्रोत या हृदय का शत्रु?

क्या आपके रसोई का तेल ही आपके रोगों की जड़ है?

हमारे भोजन में तेल की भूमिका अत्यंत महत्त्वपूर्ण है – यह ऊर्जा देता है, शरीर को चिकनाई देता है, विटामिन्स के अवशोषण में मदद करता है और स्वाद बढ़ाता है। परंतु प्रश्न यह है कि हम कौन-सा तेल खा रहे हैं?

आज के अधिकांश घरों में रिफाइंड तेल, वेजिटेबल ऑयल और फैट-फ्री जैसे लुभावने नामों से बेचे जाने वाले तेलों का उपयोग हो रहा है। पर क्या आपने कभी सोचा कि ये तेल कैसे बनते हैं?


रिफाइंड तेल: किचन से क्लिनिक तक का सफर!

रिफाइंड तेल कोई सामान्य तेल नहीं होता – ये पेट्रोलियम उद्योग में प्रयुक्त रसायनों से परिष्कृत किए जाते हैं।

  • हेक्सेन, एक विषैली गैस, तेल निकालने में प्रयोग होती है।
  • फिर उसे डिओडोराइज़, ब्लीच और रासायनिक फिल्टर से गुज़ारा जाता है।
  • इस प्रक्रिया में ट्रांस फैट और फ्री रेडिकल्स उत्पन्न होते हैं जो हमारे शरीर की कोशिकाओं को नष्ट करते हैं।
  • यही कारण है कि रिफाइंड ऑयल हार्ट अटैक, हाई ब्लड प्रेशर, मोटापा और कैंसर तक का कारण बन सकता है।

तो क्या खाएं? – लौटें देसी परंपरा की ओर

राजीव जी दीक्षित ने वर्षों पहले बताया था –

“तेल वहीं खाओ जो तुम्हारे क्षेत्र में पैदा होता हो और कोल्हू या घानी में निकाला गया हो।”

भारत की पारंपरिक तेल प्रणाली:

  • सरसों का तेल (उत्तर भारत)
  • तिल का तेल (दक्षिण और पश्चिम भारत)
  • नारियल तेल (केरल और तटीय क्षेत्र)
  • मूँगफली तेल (गुजरात, महाराष्ट्र, एमपी)

ये तेल न सिर्फ स्वदेशी हैं, बल्कि शरीर में प्राकृतिक लचीलापन, रोग प्रतिरोधक क्षमता और मानसिक स्थिरता भी प्रदान करते हैं।


तुलना – आधुनिकता बनाम परंपरा


सार्थक चिंतन

भोजन न केवल शरीर, बल्कि विचार और व्यवहार भी बनाता है। जो तेल जीवन को ऊर्जा देने के लिए था, वही आज बाजारवाद की चालाकियों के कारण मृत्यु का कारण बन रहा है।
क्या यह प्रगति है, या अनदेखी विनाश?
हमारी रसोई ही राष्ट्र की नींव है – उसमें इस्तेमाल होने वाला हर द्रव्य सिर्फ स्वाद नहीं, संस्कार तय करता है।
अब समय है कि हम “किराने की थैली” के भरोसे नहीं, विवेक और वैदिक विज्ञान के आधार पर अपने स्वास्थ्य के निर्णय लें।


लेखन व संकल्पना:
राजेश कुमरावत ‘सार्थक’
संपादक – जनमत जागरण न्यूज़ पोर्टल
स्वास्थ्य संकल्प – 365 दिन अभियान संयोजक

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