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'सार्थक' दृष्टिकोणआस्थादेशसम्पादकीय

“पहलगाम में हुई धर्म की हत्या – और इसके बाद अब चुप रहना अपराध है” 26 लाशें, एक सवाल – क्या अब भी पाकिस्तान को बचाओगे?

क्या यही इंसानियत है? पहलगाम में 26 निर्दोषों की हत्या – दुनिया पूछ रही है अब क्या करेंगे हम?


✍️संपादक की दृष्टि से ‘सार्थक चिंतन’

22 अप्रैल को जम्मू-कश्मीर के पहलगाम में जो कुछ भी हुआ, वह केवल एक आतंकी हमला नहीं था – यह एक सुनियोजित धर्माधारित नरसंहार था। 26 से अधिक निहत्थे पर्यटकों को धर्म पूछ-पूछकर गोली मारी गई – और यह इस सदी की सबसे विभत्स घटनाओं में से एक है।

22 अप्रैल 2025 – यह तारीख भारतीय मानस में एक और काली स्याही से दर्ज हो गई। कश्मीर की वादियों में बसंत की खुशबू नहीं, बारूद की बू फैली। जहां बहारें आनी थीं, वहां मातम पसरा। और सबसे ज़्यादा दुख की बात – मारे गए इंसान नहीं गिने गए, उनके मजहब पूछे गए। पहलगाम की उस ज़मीन पर इंसानियत को धर्म के तराजू पर तोलकर गोली मारी गई।
पहलगाम में हुए इस बर्बर आतंकी हमले में 26 निर्दोष पर्यटकों को धर्म पूछ-पूछकर गोलियों से छलनी किया गया। यह केवल गोली नहीं थी – यह भारत की सहिष्णुता, एकता और विश्व में भाईचारे के संदेश पर किया गया प्रहार था।

धर्म नहीं, मानवता को मार दिया गया है

इस हमले ने भारत को ही नहीं, पूरे विश्व को हिला दिया है। विश्व मानवाधिकार संगठनों से लेकर संयुक्त राष्ट्र तक इस क्रूरता की निंदा कर चुके हैं, लेकिन क्या केवल निंदा अब पर्याप्त है? क्या भारत हर बार सहनशीलता का ही परिचय देता रहेगा जबकि पड़ोसी राष्ट्र पाकिस्तान, अपने ज़हर से पल रहे आतंकी संगठनों को पालता-पोसता रहेगा?

अब कूटनीति नहीं, निर्णायक नीति चाहिए

यह समय केवल शोक का नहीं, संकल्प का है। पाकिस्तान को बार-बार “वॉच लिस्ट” में डालना, या कुछ विदेशी सहायता रोकना – ये सब अब प्रतीकात्मक हो चुके हैं। भारत और विश्व समुदाय को अब स्पष्ट और कठोर रेखा खींचनी होगी।

  • पाकिस्तान को वैश्विक मंचों पर पूर्ण बहिष्कार मिले
  • जैसे ISIS और अल-कायदा को समाप्त किया गया, वैसे ही लश्कर और जैश जैसे संगठनों पर सैन्य व आर्थिक प्रहार हो
  • भारत को आतंक के हर ठिकाने को चिन्हित कर ‘सर्जिकल स्ट्राइक’ के अगले चरण की ओर बढ़ना चाहिए

क्या मानवता अब भी मौन रहेगी?

जब किसी मासूम को उसकी जाति या धर्म के आधार पर मौत दी जाए, वह केवल भारत का नहीं, पूरी मानवता का मामला बन जाता है। क्या संयुक्त राष्ट्र, जो जलवायु परिवर्तन पर दिन-रात चिंतन करता है, मानवता के इस नरसंहार पर निर्णायक आवाज़ नहीं उठाएगा?


सार्थक चिंतन

भारत की आत्मा अजेय है – लेकिन अब यह आत्मा केवल रक्षा में नहीं, प्रतिकार में भी जागनी चाहिए।
शब्दों से नहीं, अब उत्तर कार्य से दिया जाना चाहिए।
शांति तब तक संभव नहीं जब तक आतंक की जड़ों पर प्रहार न हो।
हर उस हाथ को रोकना होगा जो बंदूक उठाता है,
और हर उस जुबान को बेनकाब करना होगा जो इस बर्बरता का समर्थन करती है। ✍️ राजेश कुमरावत ‘सार्थक


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