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'सार्थक' दृष्टिकोणसम्पादकीय

पहलगाम नरसंहार पर देश की आत्मा का सवाल : “जब अर्जुन मौन रहा और अभिमन्यु घेरकर मारा गया –पढ़िए✍️ संपादकीय विश्लेषण राजेश कुमरावत ‘सार्थक

जो लंका नहीं जला सकता, वह हनुमान नहीं…

– “संपादक की कलम से” –

रामायण का संदेश स्पष्ट है – जब सीमा का अतिक्रमण हो, तो केवल संवाद नहीं, शस्त्र ही अंतिम साधन होते हैं।
हनुमान जी शांति प्रस्ताव लेकर लंका गए थे। पर जब असुर नीति ने उन्हें अपमानित किया, तो वे लौटे नहीं – लंका को जला डाला।

आज की पहलगाम घटना भी वैसी ही है।
धर्म पूछकर 26 श्रद्धालुओं की हत्या कोई सामान्य आतंक नहीं, यह भारत की चेतना पर गहरा प्रहार है।

इतिहास हमें सिखाता है –
“अगर इस बार भारत मूक रहा, तो आने वाली पीढ़ियां कहेंगी –
हमारे पास अर्जुन जैसा प्रधान था, फिर भी हम अभिमन्यु की तरह मारे गए…”

और यह भी सत्य है –
“इतिहास सड़ी हुई लाशें नहीं, विजय के ध्वज गिनता है।
जो रावण का वध नहीं कर सकता, वो मेरा राम नहीं हो सकता।”

महाभारत में भी अर्जुन के धनुष पर प्रत्यंचा तभी चढ़ती है, जब अभिमन्यु चक्रव्यूह में घिरकर मारा जाता है।

तो क्या आज का भारत अभिमन्यु बन गया है, और हम अर्जुन होते हुए भी मौन हैं?


आपका क्या मत है?
क्या अब निर्णायक कार्यवाही होनी चाहिए?
नीचे कमेंट कर अपनी राय दें –
“जनमत ही जनशक्ति है, और आज यही जनमत जागरण की पुकार है।”


अब भारत को क्या करना चाहिए? – निर्णायक कार्रवाई के 5 स्पष्ट कदम

  1. घरेलू आतंकी नेटवर्क पर सीधा और समन्वित प्रहार
  2. POK में लक्षित स्ट्राइक – स्पष्ट संदेश के साथ
  3. अंतरराष्ट्रीय मंचों पर पाकिस्तान की आतंक-समर्थक छवि को उजागर करना
  4. आर्थिक और कूटनीतिक बहिष्कार – हर आतंक समर्थक राष्ट्र को चेतावनी
  5. राष्ट्रीय जन-जागरण अभियान – हर मंच पर राष्ट्र की सुरक्षा को सर्वोच्च प्राथमिकता बनाना

जनता की भावनाएं क्या कहती हैं?

  • “अब प्रतिशोध प्रतीकात्मक नहीं, परिणामात्मक होना चाहिए।”
  • “हमारी सेना सक्षम है, बस राजनीतिक इच्छाशक्ति चाहिए।”
  • “26 घरों में उजड़ा संसार… क्या यह हमारी चुप्पी से शांत होगा?”

अंतरराष्ट्रीय सन्दर्भ: इज़राइल से सीखिए : इतना छोटा-सा देश इज़राइल, पर जब उसकी अस्मिता पर हमला होता है – वह गाजा को श्मशान बना देता है।
भारत आज विश्व की चौथी सबसे बड़ी सैन्य शक्ति है – क्या हम अपने ही नागरिकों की रक्षा में इतने असहाय हैं?

अंत में – यह याचना नहीं, उद्घोष है

“अब बस बहुत हो गया… अब शांति नहीं, शक्ति बोलनी चाहिए।
क्योंकि जो अपने बच्चों की रक्षा नहीं कर सकता, वह कोई भी धर्म या राष्ट्र कहलाने योग्य नहीं।”


यह लेख जनमत जागरण न्यूज़ पोर्टल के संपादक राजेश कुमरावत ‘सार्थक’ द्वारा लिखित है। यह लेख राष्ट्र की आत्मा, आम जनमानस की पीड़ा और भारत की सुरक्षा संबंधी जन अपेक्षाओं को रेखांकित करता है। इसमें प्रयुक्त विचार भारत की ऐतिहासिक चेतना, आध्यात्मिक मूल्यों, और समसामयिक परिदृश्य से प्रेरित हैं। यह किसी धर्म, वर्ग या दल को लक्ष्य करने का प्रयास नहीं, बल्कि जनभावना की अभिव्यक्ति है।

सार्थक चिंतन:

“राष्ट्र की आत्मा को जब चुनौती मिले, तब कलम भी तलवार हो जाती है।और जब जनता की पीड़ा शब्द बन जाए, तो वह विवेक का युद्ध बनती है – यही सार्थक पत्रकारिता का धर्म है।”

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