'सार्थक' दृष्टिकोणसम्पादकीयसार्थक दृष्टिकोण | विशेष लेख श्रृंखला

रणवीर सिंह का “बॉयकॉट” या बदलते भारत से भय? लेखक राजेश कुमरावत ‘सार्थक’ 

धुरंधर के बाद क्यों बेचैन हुआ बॉलीवुड का एक वर्ग? सनातन चेतना और वैचारिक संघर्ष पर विशेष विमर्श

लेखक : राजेश कुमरावत ‘सार्थक’

भारत केवल एक राजनीतिक राष्ट्र नहीं, बल्कि हजारों वर्षों पुरानी सांस्कृतिक चेतना का जीवंत स्वरूप है। यहाँ धर्म केवल पूजा-पद्धति नहीं, बल्कि जीवन जीने की व्यवस्था है। यही कारण है कि जब भी भारत को वैचारिक रूप से कमजोर करने का प्रयास हुआ, सबसे पहले उसकी संस्कृति, परंपराओं, संतों, मंदिरों और आध्यात्मिक प्रतीकों पर प्रहार किए गए।

वर्षों तक बॉलीवुड का एक बड़ा वर्ग इसी वैचारिक एजेंडे का माध्यम बनता दिखाई दिया। फिल्मों के माध्यम से धीरे-धीरे समाज के मन में यह स्थापित करने का प्रयास किया गया कि सनातन परंपराएँ पिछड़ी हुई हैं, साधु-संत ढोंगी हैं, मंदिर पाखंड के केंद्र हैं और धर्म केवल अंधविश्वास का प्रतीक है।

यह कोई एक-दो फिल्मों की बात नहीं थी, बल्कि एक लगातार चलने वाला नैरेटिव था।

बॉलीवुड केवल मनोरंजन का माध्यम नहीं है। यह वर्षों से समाज की सोच, युवाओं की मानसिकता और सांस्कृतिक दिशा को प्रभावित करने वाला सबसे बड़ा मंच रहा है। इसलिए जब फिल्मों का नैरेटिव बदलता है, तो उसका प्रभाव केवल बॉक्स ऑफिस तक सीमित नहीं रहता, बल्कि वह समाज की चेतना तक पहुँचता है।

इसी कारण अभिनेता Ranveer Singh और फिल्म “धुरंधर” को लेकर उठ रही चर्चाएँ केवल फिल्मी विवाद नहीं मानी जा सकतीं। यह उस वैचारिक संघर्ष का संकेत है, जिसमें एक ओर सनातन चेतना और राष्ट्रवाद के साथ खड़ा नया भारत है, तो दूसरी ओर वह पुराना वैचारिक तंत्र, जिसने वर्षों तक बॉलीवुड को अपनी सोच के अनुसार चलाने का प्रयास किया।

फिल्मों में सनातन को कैसे प्रस्तुत किया गया?

लंबे समय तक बॉलीवुड की अनेक फिल्मों में हिंदू पुजारी को लालची, पंडित को पाखंडी और साधु-संतों को ढोंगी अथवा अपराधी मानसिकता वाला दिखाना एक सामान्य प्रवृत्ति बन गई थी। मंदिरों को अंधविश्वास, षड्यंत्र और सामाजिक पिछड़ेपन के प्रतीक के रूप में प्रस्तुत किया गया, जबकि अन्य मतों के धार्मिक प्रतीकों के प्रति वही फिल्में अत्यधिक संवेदनशील दिखाई देती थीं।

कई फिल्मों में भगवान और धार्मिक आस्थाओं का उपहास “कॉमेडी” और “व्यंग्य” के नाम पर किया गया। धार्मिक प्रतीकों को हास्य का माध्यम बनाया गया और संतों की छवि को विकृत रूप में प्रस्तुत किया गया। धीरे-धीरे यह सब “क्रिएटिव फ्रीडम” और “प्रोग्रेसिव सिनेमा” के नाम पर सामान्य बनाने का प्रयास हुआ।

PK में हिंदू आस्थाओं और पूजा-पद्धतियों पर तीखे व्यंग्य किए गए। OMG – Oh My God! में धार्मिक व्यवस्थाओं पर कटाक्ष किया गया। वहीं Haider और कुछ अन्य फिल्मों में सेना तथा राष्ट्रवादी दृष्टिकोण को संदेह की दृष्टि से प्रस्तुत करने के प्रयास भी दिखाई दिए।

यहाँ प्रश्न यह नहीं कि फिल्मों में प्रश्न क्यों पूछे गए। प्रश्न यह है कि प्रश्न हमेशा सनातन परंपराओं, हिंदू प्रतीकों और भारतीय सांस्कृतिक मूल्यों पर ही क्यों खड़े किए गए? क्या तथाकथित सेक्युलरिज्म का अर्थ केवल हिंदू आस्थाओं की आलोचना तक सीमित रह गया था?

धुरंधर के बाद क्यों बढ़ी बेचैनी?

“धुरंधर” के आने के बाद बॉलीवुड के एक विशेष वर्ग की बेचैनी स्पष्ट दिखाई देने लगी। कारण केवल फिल्म नहीं, बल्कि वह संदेश है जो इस प्रकार की फिल्में समाज तक पहुँचा रही हैं।

वर्षों तक फिल्मों में राष्ट्रवाद को कट्टरता, हिंदू प्रतीकों को अंधविश्वास और सनातन परंपराओं को पिछड़ेपन के रूप में प्रस्तुत किया गया। परंतु अब पहली बार बड़े स्तर पर ऐसी फिल्में सामने आ रही हैं, जिनमें भारत, भारतीय सेना, सनातन संस्कृति और राष्ट्रीय स्वाभिमान को सकारात्मक रूप में दिखाया जा रहा है।

“धुरंधर” को लेकर चर्चा केवल उसकी कहानी की नहीं रही, बल्कि यह कहा जाने लगा कि यह फिल्म उस बॉलीवुड मानसिकता को चुनौती देती है, जो वर्षों तक भारत विरोधी या सनातन विरोधी नैरेटिव को “प्रगतिशीलता” के नाम पर स्थापित करती रही।

यही कारण है कि “धुरंधर” के बाद अचानक रणवीर सिंह और उससे जुड़े लोगों को लेकर सोशल मीडिया से लेकर इंडस्ट्री तक अलग प्रकार की चर्चाएँ शुरू हो गईं।

रणवीर सिंह क्यों निशाने पर?

चर्चाओं के अनुसार अभिनेता रणवीर सिंह नागपुर स्थित राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ मुख्यालय गए, डॉ. हेडगेवार को श्रद्धांजलि अर्पित की और संघ प्रमुख Mohan Bhagwat से मुलाकात की। इसके बाद सोशल मीडिया और फिल्मी गलियारों में उनके प्रति दृष्टिकोण अचानक बदलता दिखाई देने लगा।

रणवीर सिंह मंदिरों में दर्शन करते हुए दिखाई दिए, माथे पर त्रिपुंड लगाए, भारतीय संस्कृति और सनातन प्रतीकों के साथ जुड़ते दिखाई दिए। यही वह क्षण था जब बॉलीवुड का तथाकथित “लिबरल” वर्ग असहज हो उठा।

प्रश्न यह है कि यदि कोई कलाकार अपनी संस्कृति, अपने धर्म और अपनी परंपराओं के प्रति सम्मान व्यक्त करता है, तो इसमें समस्या क्या है?

क्या बॉलीवुड का वैचारिक एकाधिकार टूट रहा है?

लंबे समय तक बॉलीवुड में एक ऐसा वातावरण बनाया गया, जहाँ सनातन संस्कृति का मजाक उड़ाना “क्रिएटिव फ्रीडम” कहलाता था। फिल्मों में पंडितों को पाखंडी, साधुओं को ढोंगी और मंदिरों को अंधविश्वास का केंद्र दिखाना सामान्य बात बन गई थी।

परंतु अब परिस्थितियाँ बदल रही हैं।

The Kashmir Files, Gadar 2, The Kerala Story जैसी फिल्मों ने यह सिद्ध कर दिया कि भारत का दर्शक अब अपनी संस्कृति, अपने इतिहास और अपने राष्ट्रगौरव को सम्मान देने वाले सिनेमा को स्वीकार कर रहा है।

“धुरंधर” को भी इसी बदलते वैचारिक दौर का प्रतीक माना जा रहा है।

“भारत माता की जय” से असहजता क्यों?

हाल ही में अभिनेता Arjun Rampal द्वारा “भारत माता की जय” कहे जाने पर कुछ तथाकथित सेक्युलर बुद्धिजीवियों ने आपत्ति जताई। प्रश्न यह है कि क्या अब अपने देश के प्रति प्रेम व्यक्त करना भी कट्टरता माना जाएगा?

जिस भारत माता के लिए लाखों क्रांतिकारियों ने अपने प्राण न्योछावर कर दिए, उसी भारत माता का जयघोष यदि किसी को “खतरनाक” लगता है, तो यह केवल वैचारिक असहिष्णुता का उदाहरण है।

भारत माता की जय किसी राजनीतिक दल का नारा नहीं, बल्कि इस राष्ट्र की सांस्कृतिक चेतना का उद्घोष है।

समाज को प्रभावित करने का माध्यम बना सिनेमा

यह समझना आवश्यक है कि सिनेमा केवल मनोरंजन नहीं होता। यह समाज की सोच को प्रभावित करने वाला सबसे शक्तिशाली माध्यम है। वर्षों तक फिल्मों के माध्यम से भारतीय संस्कृति और सनातन परंपराओं को कमजोर करने की कोशिशें होती रहीं।

भारतीय परिवार व्यवस्था को पिछड़ा दिखाना, पश्चिमी जीवनशैली को आधुनिकता का प्रतीक बनाना, धार्मिक आस्थाओं को अंधविश्वास बताना और राष्ट्रवाद को उग्रता से जोड़ना — यह सब एक वैचारिक प्रक्रिया का हिस्सा माना गया।

हालाँकि किसी भी प्रकार की विदेशी फंडिंग या सुनियोजित षड्यंत्र के दावों के लिए प्रमाण आवश्यक होते हैं, परंतु यह तथ्य स्पष्ट है कि लंबे समय तक फिल्मों में एकतरफा वैचारिक झुकाव दिखाई देता रहा।

अब जब वही सिनेमा भारत, सनातन और राष्ट्रवाद की बात करने लगा है, तो पुराने वैचारिक समूहों की बेचैनी स्वाभाविक रूप से सामने आ रही है।

युवाओं के लिए सबसे बड़ा संदेश

आज भारत का युवा जाग रहा है। वह समझ रहा है कि आधुनिकता का अर्थ अपनी संस्कृति से घृणा करना नहीं होता। मंदिर जाना पिछड़ापन नहीं, अपनी जड़ों से जुड़ाव है। राष्ट्रवाद कट्टरता नहीं, बल्कि अपने देश के प्रति स्वाभाविक सम्मान है।

यदि कोई कलाकार भारत माता की जय बोलता है, सनातन संस्कृति का सम्मान करता है या राष्ट्रवादी विचारों के साथ खड़ा होता है, तो यह उसका अधिकार है — और यही नए भारत की पहचान भी बनती जा रही है।

“धुरंधर” जैसी फिल्मों और रणवीर सिंह जैसे कलाकारों के इर्द-गिर्द उठ रहे विवाद इसी बात का संकेत हैं कि भारत का सांस्कृतिक नैरेटिव बदल रहा है।

और यही परिवर्तन उन लोगों को सबसे अधिक असहज कर रहा है, जिन्होंने वर्षों तक यह मान लिया था कि भारत अपनी जड़ों से कट चुका है।

परंतु अब भारत लौट रहा है — अपनी संस्कृति की ओर, अपने राष्ट्रगौरव की ओर, और अपनी सनातन चेतना की ओर।

Related Articles

error: Content is protected !!