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“MP में 10 साल से नियमों की हत्या: मप्र में डिग्रीधारी बेरोजगार, अपात्र बेच रहे खाद! जानिए कैसे 8000 सहकारी समितियों और मार्कफेड विक्रय केंद्र बने ‘व्यवस्थागत भ्रष्टाचार’ के अड्डे!”

खाद वितरण में घोटाले की गंध: न नियम की जानकारी, न जवाबदेही; फिर भी चल रहा है करोड़ों का व्यापार! तो समझ लीजिए – ये सिर्फ लापरवाही नहीं, बल्कि सुनियोजित ‘न्याय का अपहरण’ है!”

क्या कृषि विभाग और सहकारी संस्थाओं की मिलीभगत से दबाया जा रहा है रोजगार का बड़ा अवसर?

जब नियमों की किताबें धूल खा रही हों और जवाबदेही की ज़मीन पर मिलीभगत की घास उग आई हो, तब ऐसे ही जन्म लेती हैं वो व्यवस्थाएँ जो किसानों की पीठ पर बंदूक रखकर ‘खाद’ के नाम पर घोटालों की फसल काटती हैं।

मध्यप्रदेश में बीते एक दशक से सहकारी समितियाँ और मार्कफेड जिस निर्लज्जता से भारत सरकार के असाधारण राजपत्र में दर्ज नियमों की अवहेलना करते हुए उर्वरक व्यापार कर रही हैं, वह न केवल कानून की आत्मा का अपमान है, बल्कि हजारों योग्य बेरोजगार युवाओं के भविष्य से भी क्रूर मज़ाक है। यह कोई साधारण अनदेखी नहीं, बल्कि सुनियोजित ‘संस्थागत भ्रष्टाचार’ की परतों को उजागर करने वाला मामला है, जिसमें कृषि विभाग, जिला सहकारी बैंक और मार्कफेड की त्रिस्तरीय सांठगांठ ने नियमों को नीलाम कर रखा है — और उसकी बोली लग रही है किसानों की ज़रूरतों के नाम पर।

10 साल से नियमों की अनदेखी: मिलीभगत या मजबूरी?

जनमत जागरण@ भोपाल/उज्जैन : जब नियम कागज़ों पर कैद रह जाएँ और नीयतें सौदों में उलझ जाएँ, तब ऐसे ही जन्म लेती हैं व्यवस्थाएँ, जो किसान के भरोसे को व्यापार की मंडी में नीलाम कर देती हैं। मध्यप्रदेश में सहकारी सोसायटियाँ एवं मार्कफेड बीते दस वर्षों से उर्वरक व्यापार के क्षेत्र में वही खेल खेल रही हैं – जिसमें नियम, नैतिकता और राष्ट्रनीति तीनों की हत्या हो रही है।

भारत सरकार द्वारा 10 अक्टूबर 2015 को गजट क्रमांक SO 2776 (E) तथा 30 जुलाई 2018 को SO 3720 (E) के माध्यम से यह स्पष्ट निर्देश दिए गए थे कि उर्वरक के विक्रय स्थल पर नियोजित व्यक्ति बीएससी (बायोलॉजी/केमिस्ट्री) अथवा मान्यता प्राप्त प्रशिक्षण प्राप्त व्यक्ति होना चाहिए। यही नहीं, समिति और मार्कफेड में ऐसे पात्र व्यक्तियों की नियुक्ति भी अनिवार्य मानी गई थी।

परंतु जमीनी हकीकत यह है कि प्रदेश की लगभग सभी 8000 सहकारी समितियों और मार्कफेड विक्रय केन्द्रों में अब तक ऐसे किसी भी व्यक्ति की नियुक्ति नहीं की गई है।

सरकारी विभागों की चुप्पी: RTI का मौन उत्तर

मध्यप्रदेश कृषि आदान विक्रेता संघ के प्रदेश सचिव एवं सर्वहिताय कृषि व्यापारी सेवा समिति, उज्जैन के अध्यक्ष श्री संजय कुमार रघुवंशी ने बताया कि उन्होंने 5 फरवरी 2025 को प्रदेश के सभी 52 जिलों में आरटीआई दायर कर यह जानकारी मांगी कि क्या इन नियमों के तहत नियुक्तियां हुई हैं? लेकिन अधिकतर जिलों से कोई उत्तर नहीं दिया गया।

कुछ जिलों में कृषि विभाग से अनौपचारिक बातचीत में अधिकारियों ने यह तक स्वीकार किया कि –
“यदि हमने यह जानकारी आधिकारिक रूप से दे दी, तो हमारी नौकरी चली जाएगी, क्योंकि हम पिछले 10 सालों से यह अवैध व्यापार करवा रहे हैं।”

निजी व्यापारियों पर सख्ती, समितियों को छूट?

गजट के इन्हीं प्रावधानों के अनुसार बीते वर्षों में निजी व्यापारियों को खाद बिक्री हेतु लाइसेंस तभी जारी किए गए जब वे योग्यता एवं प्रशिक्षण की शर्तों को पूर्ण करते थे। विरोधाभास यह है कि सहकारी समितियों पर वही नियम लागू नहीं किए गए, जबकि वे भी उर्वरकों के रिटेलर के रूप में काम कर रही हैं।

इससे दोहरी मार पड़ी — एक ओर योग्य बेरोजगार युवाओं को रोजगार से वंचित किया गया, दूसरी ओर सहकारी समितियों को नियमों से अवैध छूट देकर संस्थागत असमानता को बढ़ावा मिला।

अधिकारियों के गोलमोल जवाब: जिम्मेदारी से बचने की होड़

जब जनमत जागरण ने इस मामले में ज़मीनी पड़ताल करते हुए जिला विपणन अधिकारी, जिला सहकारी बैंक, शाखा प्रबंधक और प्राथमिक सहकारी समिति प्रबंधकों से सीधा संवाद किया, तो स्थिति चौंकाने वाली थी:

  • कोई भी अधिकारी स्पष्ट रूप से यह नहीं बता पाया कि केंद्र सरकार के गजट का अनुपालन क्यों नहीं हुआ।
  • कुछ अधिकारियों ने अनौपचारिक रूप से यह कहा कि “ये तो ऊपर से जैसा आदेश आता है, हम वैसे ही करते हैं“।
  • एक वरिष्ठ प्रबंधक ने कहा, “ये सब अभी तक चलता आया है, अब आप ही बताइए कि इतने सालों बाद कोई क्या बदलेगा?

सार्वजनिक डोमेन में उपलब्ध हैं प्रमाण

इस विषय के सभी प्रमुख प्रमाण — भारत सरकार के गजट नोटिफिकेशन, और 27 मई 2017 को कृषि संचालनालय, भोपाल से सभी उपसंचालकों को भेजा गया पत्र — सार्वजनिक डोमेन में पहले से उपलब्ध हैं, फिर भी इनका क्रियान्वयन नहीं किया गया।


अब आगे क्या?

यह खबर केवल एक उजागर करने वाली रिपोर्ट नहीं, बल्कि एक न्यायिक और प्रशासकीय कार्रवाई की माँग भी है। जनमत जागरण इस विषय पर अगली कड़ी में लाएगा:

  • प्रमुख जिलों के RTI जवाबों की समीक्षा
  • विभिन्न संगठनों, नेताओं और विशेषज्ञों की राय
  • संभावित जनहित याचिका की पृष्ठभूमि
  • किसानों और बेरोजगार युवाओं की प्रतिक्रिया

20% किसानों के नाम पर हो रहा 75% खाद का खेल!”– जानिए अगली रिपोर्ट में कैसे किसान हित की आड़ में हो रहा किसानों से ही विश्वासघात।

(जारी… अगली कड़ी में पढ़िए – ’10 वर्षों की चुप्पी, अब किसके जिम्मे जवाबदारी?’)

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