“8.68 करोड़ की लागत से बना सिविल अस्पताल भवन अधर में, जर्जर बिल्डिंग में अब भी इलाज”- ✍️पढ़ें”अच्छी रिपोर्ट, सच्ची रिपोर्ट” – अब बोलेगा जनमत का ज़मीर!”

नया भवन बनकर तैयार, लेकिन मरीज अब भी पुराने ढांचे में बेहाल!
कागज़ों में चढ़ा विकास, ज़मीन पर बिखरा सिस्टम – स्वास्थ्य विभाग की नासमझी से जर्जर भवन में चल रहा अस्पताल
✍️ जब सिस्टम खुद बीमार हो जाए, तो अस्पताल भी इलाज का इंतज़ार करता है। सुसनेर में करोड़ों की लागत से सिविल अस्पताल का नया भवन तो बन गया, लेकिन जिम्मेदारों की कलम अब भी नींद में है। जमीन का रिकॉर्ड फाइलों में गुम है, अफसरों की जवाबदेही फोन की घंटियों के नीचे दब गई है, और जनप्रतिनिधि आंखों पर विकास की पट्टी बांधे बैठे हैं। ऐसे में मरीजों का इलाज नहीं, उनकी उम्मीदें ऑपरेशन टेबल पर हैं — जहां चीरा भी नहीं लग रहा और मरहम भी नहीं रखा जा रहा। पढ़िए जनमत जागरण सुसनेर के हमारे रिपोर्टर दीपक जैन की यह पोल खोलती रिपोर्ट।
जनमत जागरण @ सुसनेर। जब शासन ने 8 करोड़ 68 लाख की राशि स्वीकृत कर एक अत्याधुनिक सिविल अस्पताल का निर्माण शुरू करवाया था, तब उम्मीद थी कि क्षेत्र की जनता को बेहतर स्वास्थ्य सुविधाएं शीघ्र मिलेंगी। पर आज हालात यह हैं कि भवन तैयार हो चुका है, पर मरीज अब भी अंग्रेजों के जमाने की जर्जर इमारत में इलाज करवाने को मजबूर हैं। कारण है – प्रशासनिक तंत्र की सुस्ती, जनप्रतिनिधियों की खामोशी और विभागीय तालमेल की भारी कमी।
शहर के शासकीय अस्पताल के पास पुराने स्कूल भवन की जगह भव्य सिविल अस्पताल भवन बनकर खड़ा तो है, लेकिन वह अब तक स्वास्थ्य विभाग को हैंडओवर नहीं हो पाया है। दिलचस्प बात यह है कि जिस जमीन पर यह करोड़ों का भवन बना है, वह शिक्षा विभाग के नाम है, और स्वास्थ्य विभाग के पास इसका कोई रिकॉर्ड नहीं! ऐसे में भवन कानूनी पेच में उलझकर अधर में लटक गया है।
भवन निर्माण अगस्त 2022 में शुरू हुआ था और इसे सितंबर 2023 तक पूर्ण होना था, लेकिन ठेकेदार की कछुआ चाल और अधिकारियों की चुप्पी ने इसे डेढ़ साल से भी ज्यादा देर करवा दी। अब जब भवन बन गया है, तब भी उसका उपयोग शुरू नहीं हो पाया है।

जर्जर भवन में जबरन इलाज – ये है जमीनी हकीकत
आज भी मरीजों का इलाज उसी पुराने डिस्मेंटल हो चुके भवन में किया जा रहा है, जहां ना जगह है, ना सुविधाएं। कहीं स्ट्रेचर अटका है तो कहीं मरीजों की कतारें गैलरी तक पहुंच रही हैं। अस्पताल स्टाफ भी परेशान है, लेकिन वे भी सिस्टम के इस ढीले रवैये के आगे बेबस हैं।
अधिकारियों ने फोन उठाना भी जरूरी नहीं समझा
इस मसले पर जब जिम्मेदारों से बात करने का प्रयास किया गया, तो कुछ ने चुप्पी साध ली और कुछ ने फोन उठाना भी मुनासिब नहीं समझा। एसडीएम सर्वेश यादव ने इतना जरूर कहा कि – “अस्पताल की जमीन स्वास्थ्य विभाग के नाम नहीं है, और उनके पास कोई रिकॉर्ड भी नहीं है। ऐसे में वरिष्ठ अधिकारियों से चर्चा करनी होगी।”
क्या वाकई जनता का स्वास्थ्य कोई मुद्दा नहीं रहा?
यह सवाल अब गूंजने लगा है कि जब भवन बन चुका है, सुविधाएं तय हैं, डॉक्टरों की नियुक्ति की संभावना है, तो फिर जनता इस सुविधा से वंचित क्यों है? क्या करोड़ों रुपए सिर्फ कागज़ी विकास दिखाने के लिए खर्च हुए? या फिर जनता की जिंदगी अब किसी की प्राथमिकता ही नहीं रही?

नए भवन में मिलेंगी ये सुविधाएं (जो अब भी सिर्फ कागजों में हैं)
- 50 बेड का भर्ती वार्ड
- ऑपरेशन थिएटर
- ईसीजी, सोनोग्राफी, डिजिटल एक्सरे
- ब्लड यूनिट, पैथोलॉजी लैब
- विशेषज्ञ डॉक्टर – अस्थि रोग, नेत्र, दंत, स्त्री एवं शिशु रोग
- रेफरल के लिए एंबुलेंस सेवा
सार्थक चिंतन – सिविल अस्पताल का नया भवन सुसनेर में विकास की नई लकीर खींच सकता था, लेकिन यह लकीर अभी अधूरी है। जब तक प्रशासन, विभाग और जनप्रतिनिधि एकजुट होकर इसे हल नहीं करेंगे, तब तक क्षेत्र की जनता केवल निर्माण देखकर संतोष करती रहेगी – और इलाज उसी पुराने भवन में करवाने को मजबूर रहेगी, जो खुद ‘इलाज’ मांगता है।



