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'सार्थक' दृष्टिकोणविश्लेषणात्मक ग्राउंड रिपोर्टसम्पादकीय

“रूस में भीतर तक घुसी साजिश: भारत की आँखें खोलने को काफी है! देश के भीतर के दुश्मनों पर करारा विश्लेषण– राजेश कुमरावत ‘सार्थक’

एक समसामयिक विश्लेषण, जो इतिहास को भविष्य में दोहराने से रोकने का प्रयास है। राष्ट्रभक्तों के लिए चेतावनी, गद्दारों के लिए चुनौती!


✍️ संपादक की कलम से

4500 किलोमीटर अंदर तक फैली गद्दारी – रूस के भीतर के ‘अपने’ और भारत के लिए चेतावनी

“देश हमेशा दुश्मनों से नहीं हारते… कभी-कभी अपनों के मौन से भी उजड़ जाते हैं।
बारूद अगर बाहर हो, तो दीवारें बच जाती हैं…
लेकिन जब बारूद भीतर छुपा हो, तो राष्ट्र की आत्मा झुलस जाती है।”

जब रूस के चार एयरबेस पर मौत बरसी,
तो सवाल यह नहीं था कि यूक्रेन ने हमला कैसे किया,
सवाल यह था कि रूस में बैठे ‘कौन’ उसका रास्ता बना रहे थे?
4500 किलोमीटर भीतर घुसकर जब ट्रकों में ड्रोन लाए गए,
तो युद्ध केवल सीमा पर नहीं लड़ा गया—
वो युद्ध रूस की आत्मा पर किया गया।

“बदलते समय में युद्ध अब सिर्फ़ सीमा पर नहीं लड़े जाते,
कुछ युद्ध तो ट्रकों में छुपाकर, एयरबेस के गेट पर भी लड़े जाते हैं।”

और हाँ, यह सिर्फ़ रूस की कहानी नहीं है…
यह हमारे भारत का आइना भी है।
जब देश के भीतर बैठा कोई व्यक्ति—
किसी वोट, किसी मजहब, किसी एजेंडे के नाम पर
अपने ही राष्ट्र को कमजोर करने लगे,
तो उसे क्या कहेंगे? विचारक या विश्वासघाती?

“जो देश अपनी मिट्टी में गद्दारों के बीज उगने देता है,
वहां सीमा की सुरक्षा भी बेमानी हो जाती है।”


रूस के भीतर की गहराई तक गई ये साजिश

1 जून 2025 को रूस के लिए इतिहास की सबसे काली तारीखों में से एक बन गया।
यूक्रेन द्वारा किया गया यह ड्रोन हमला सामान्य सैन्य रणनीति का हिस्सा नहीं था, बल्कि यह रूस के भीतर बैठे देशविरोधी तत्वों की मिलीभगत से रचा गया षड्यंत्र था।

यह हमला ‘सीधा’ नहीं था — यह ‘भीतर’ से था।

  • 117 एफपीवी (First Person View) ड्रोन, जो रिमोट ऑपरेटर द्वारा नियंत्रित किए जाते हैं,
  • ट्रकों में भरकर रूस के संवेदनशील एयरबेस के पास तक ले जाए गए,
  • और वहां खड़े रहकर उन्हीं ट्रकों से सीधे हमले को अंजाम दिया गया
  • 41 रूसी लड़ाकू विमानों को तबाह कर दिया गया,
  • 60000 करोड़ से अधिक का अनुमानित नुकसान

यह सिर्फ तकनीक की जीत नहीं थी –

यह विश्वासघात की भूमिका से मिली सफलता थी।

सवाल ये नहीं कि ड्रोन कैसे आए,
सवाल यह है कि रूस में ‘उनके’ ट्रक एयरबेस तक कैसे पहुंचे?
सवाल यह है कि कौन थे वे लोग, जो रूस में रहकर रूस की हत्या में साझेदार बने?


भारत के लिए यह क्यों ज़रूरी है?

रूस की यह पीड़ा हमें भारत में बैठकर भी सुनाई देनी चाहिए,
क्योंकि यहां भी बहुतों की आत्मा राष्ट्र की नहीं,
राजनीति की चौपाल पर गिरवी रख दी गई है।

आज जब भारत आतंक के विरुद्ध “ऑपरेशन सिंदूर” चला रहा है,
तो भीतर से आवाज़ आती है – “हम सवाल पूछेंगे!”
क्या देश को जख्मी करने वालों से पहले सवाल करने वालों की सूची बननी चाहिए?

“जिस देश में युद्ध के समय भी विपक्ष सत्ताधारी नहीं, देश को गिराने में जुट जाए –
वहां चिंता सीमा की नहीं, सोच की होनी चाहिए।”


जब भीतर का युद्ध बाहर से बड़ा हो जाए…

जो कुछ रूस के साथ हुआ,
वही हमारे लिए एक संदेश छोड़ गया है —
यदि देश के भीतर ही ‘द्रोह’ के बीज फलते रहें,
तो फिर सीमा पर लगे तोप-टैंक भी बेकार हैं।

“आग अगर बाहर हो तो पानी बचा सकता है,
लेकिन अगर आग भीतर सुलगने लगे,
तो फिर राख भी गवाही नहीं दे पाती।”


✒️ लेखक परिचय:

राजेश कुमरावत ‘सार्थक’
वरिष्ठ पत्रकार, विचारक, शिक्षक एवं समसामयिक विश्लेषक
संपादक – जनमत जागरण न्यूज़ पोर्टल

35 वर्षों से राष्ट्रचेतना, वैकल्पिक मीडिया और जनजागरण के कार्य में समर्पित।
आपका उद्देश्य है – “पत्रकारिता, जो केवल सूचना नहीं, राष्ट्र की आत्मा को जगाए।”
संपर्क: sarthakeditor@janmatjagran.in


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📢 डिस्क्लेमर:

इस लेख में व्यक्त विचार लेखक के व्यक्तिगत हैं, जो सार्वजनिक विमर्श, चेतना और देशहित में प्रस्तुत किए गए हैं। यह किसी राजनीतिक दल या वैचारिक समूह को लक्ष्य करके नहीं, बल्कि राष्ट्र की आत्मा के प्रहरी के रूप में जन चेतना का कार्य है।


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