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“सुसनेर नगर परिषद के आंकड़े चौंकाते हैं! 16 हजार मतदाता, लेकिन 24,622 समग्र ID – ये लापरवाही नहीं, ‘डिजिटल लूट’ का मॉडल है”– ‘सत्यापन’ की जगह ‘समझौते’ ने व्यवस्था को बनाया मज़ाक

सिस्टम की ‘समग्र विफलता’: जब मृतकों और फर्जी पहचान वालों को भी मिल रहा है राशन और पेंशन!

“काग़ज़ों की कश्ती में तैरती ज़िम्मेदारियाँ, और ज़मीन पर बही सरकारी धन की धार — कौन है इस गड़बड़ी का असली गुनहगार?”

जिस शासन-प्रशासन का उद्देश्य है कि “पात्र को सम्मान और अपात्र को निष्कासन” मिले, उसी सिस्टम में आज ऐसी दरारें दिखाई दे रही हैं, जहाँ मृतकों की आत्माएँ भी सरकारी राशन की कतार में खड़ी मिल रही हैं! शादीशुदा बेटियाँ वर्षों पहले विदा हो चुकी हैं, पर ‘पोर्टल’ पर अब भी अपनी मायके की पहचान से बंधी हुई हैं। और तो और, जिनकी मृत्यु को दशक बीत गए — उनका नाम अब भी सरकारी रिकॉर्ड में जीवित है, और लाभ लेने वाले परिजनों की आँखों में कोई लज्जा नहीं।

यह न केवल ‘सिस्टम फेल’ की एक जीवंत तस्वीर है, बल्कि यह सवाल भी खड़ा करती है कि क्या सरकारी योजनाएँ वाकई जरूरतमंदों तक पहुँच रही हैं, या यह महज एक कागज़ी तमाशा बनकर रह गई हैं?


❖ सुसनेर नगर परिषद क्षेत्र में समग्र सत्यापन से उजागर हुई ‘हक़ीक़त’

INVESTIGATIONS REPORT

जनमत जागरण @ सुसनेर। सुसनेर नगर परिषद क्षेत्र में जब 8 अप्रैल 2025 से समग्र आईडी की ई-केवाईसी प्रक्रिया शुरू हुई, तो जैसे-जैसे डेटा सामने आता गया, वैसे-वैसे सिस्टम की पोल खुलती गई। यहाँ मतदाताओं की संख्या जहां मात्र 16,000 के करीब है, वहीं 24,622 समग्र आईडी दर्ज थीं! यह आंकड़ा ही स्वयं में इस गड़बड़ी की गवाही देता है।

🔹 4 मई 2025 तक 1,422 फर्जी समग्र आईडी हटाई जा चुकी हैं — यानी ये ऐसे नाम हैं जिन पर वर्षों से राशन और पेंशन का लाभ उठाया जा रहा था।
🔹 अभी तक केवल 15,572 समग्र आईडी की ईकेवाईसी पूरी हुई है, जबकि 7,608 शेष हैं।

वार्ड क्रमांक 9 में एक व्यक्ति के नाम 5 समग्र आईडी, नरबदिया नाला क्षेत्र में एक व्यक्ति की 15 समग्र आईडी तक पाई गईं। ये तकनीकी लापरवाही है या जानबूझकर की गई धोखाधड़ी — यह अभी जांच का विषय है।


❖ मृतक भी ‘समग्र लाभार्थी’!

ई-केवाईसी के दौरान यह चौंकाने वाला तथ्य भी सामने आया कि 543 मृत व्यक्तियों के नाम अब भी पोर्टल पर दर्ज हैं और उनके नाम पर राशन व पेंशन का लाभ अब भी लिया जा रहा है। इनमें से कई व्यक्तियों की मृत्यु को 5 से 10 वर्ष तक हो चुके हैं, लेकिन परिजनों ने उनका मृत्यु प्रमाण पत्र तक जारी नहीं करवाया।

नगर परिषद के सामने अब यह समस्या खड़ी है कि बिना मृत्यु प्रमाणपत्र के ये नाम समग्र पोर्टल से कैसे हटाए जाएं?

📍 वार्ड क्रमांक 1 में – 56 मृतकों के नाम,
📍 वार्ड 14 में – 45 नाम,
📍 वार्ड 15 में – 30 नाम अब भी सिस्टम में जीवित दिख रहे हैं!

कागज़ों की दुनिया और ज़मीनी हकीकत का टकराव!

👉 नगर परिषद कहती है, “बिना मृत्यु प्रमाण पत्र के नाम नहीं हटाए जा सकते।”
👉 अधिकारी कहते हैं, “हमने सूची भेज दी, अब हमारी ज़िम्मेदारी नहीं।”
👉 परिजन जिम्मेदारी नहीं निभाते, और सिस्टम आंखें मूंदे बैठा है!

“यह तकनीकी खामी है या जानबूझकर गढ़ी गई योजना – यह जांच का विषय है,”
— ओ.पी. नागर, सीएमओ, नगर परिषद, सुसनेर


अब सवाल यह नहीं कि गड़बड़ी कहां हुई — सवाल यह है कि…

क्या अब भी हम इस पूरे खेल को ‘लापरवाही’ कहकर टाल सकते हैं?

क्या मृत व्यक्तियों के नाम से राशन और पेंशन पाने वाले लोग गरीबों का हिस्सा खा रहे हैं?

क्या सरकार की ई-केवायसी समयसीमा (30 जून) के बाद यह धोखाधड़ी रुक पाएगी?

और सबसे जरूरी — इन 543 मृतकों और हजारों अपात्र नामों के लाभार्थियों को कब चिन्हित कर दंडित किया जाएगा?


📌 यह सिर्फ एक नगर की कहानी नहीं… यह पूरे सिस्टम की वो तस्वीर है, जो ‘सत्यापन’ की बजाय ‘समझौते’ से चलती है।

अब जब सच्चाई सामने है, तो केवल सर्वेक्षण और रिपोर्टों से आगे बढ़कर क्या कोई सख्त कार्यवाही भी होगी, या यह खेल हर नई योजना के साथ और गहराता जाएगा?


✍️ ज़रा याद कीजिए! 20 मार्च 2025 को जनमत जागरण ने आगर जिले की सभी निकायों व पंचायतो की इस गड़बड़ी की समग्र तस्वीर पेश करते हुए जो समाचार प्रकाशित किया था, उसका शीर्षक ही अपने आप में प्रशासन को आईना दिखाने वाला था — “मृतकों के नाम पर राशन, शादीशुदाओं की सूची में गड़बड़ी! कब जागेगा प्रशासन?” उस समय लगा था कि शायद यह खबर झकझोरेगी, आंखें खुलेंगी, और जिम्मेदार तंत्र हरकत में आएगा। अधिकारियों ने भी तत्परता दिखाते हुए बयानबाज़ी की — कुछ ने जाँच बैठाने की बात कही, तो कुछ ने ‘कठोर कार्रवाई’ का रटा-रटाया वाक्य दोहरा दिया। लेकिन अब, 5 जून 2025 तक, न जांच का अता-पता है, न कार्रवाई की कोई आहट। लगता है ‘घोषणा वीरों’ की सूची में कुछ और नाम जुड़ गए हैं और लापरवाही का पर्व अब भी पूरे उल्लास से जारी है।

❖ अब सवाल यह है:

🔸 क्या सिर्फ लापरवाही कह कर इस फर्जीवाड़े से पल्ला झाड़ा पल्ला झाड़ा जा सकता है?
🔸 क्या सिस्टम में बैठे लोगों की मिलीभगत इसमें शामिल नहीं?
🔸 या फिर यह भी सिर्फ एक और ‘प्रक्रियात्मक ढकोसला’ बनकर रह जाएगी?


👉 जब तक कागज़ों में ज़िंदा मृतकों का राशन कट नहीं होता और सिस्टम में बैठे जिम्मेदार जवाबदेह नहीं बनते, तब तक ‘गरीबों के लिए चलाई जा रही योजनाएं’ सिर्फ बिचौलियों और लापरवाह सिस्टम का खिलौना बनी रहेंगी।

अब समय है— सिर्फ बयान नहीं, एक्शन का!

आपको यह रिपोर्ट कैसी लगी? क्या आपके क्षेत्र में भी ऐसी लापरवाही देखने को मिल रही है? अपनी राय नीचे कमेंट करें और इस खबर को ज्यादा से ज्यादा शेयर करें, ताकि प्रशासन की नींद खुले!

जनमत जागरण आगे भी इसी तरह जनहित से जुड़ी खबरों और घोटालों को उजागर करता रहेगा। सच के इस सफर में बने रहिए हमारे साथ!

👉 “नीचे की यह रिपोर्ट 20 मार्च को जनमत जागरण द्वारा प्रकाशित जिलेव्यापी खुलासे की प्रथम किस्त है – इस लिंक को क्लिक करें और पढ़ें विस्तृत यह रिपोर्ट

“मृतकों के नाम पर राशन, शादीशुदाओं की सूची में गड़बड़ी! कब जागेगा प्रशासन?” प्रशासन की लापरवाही से करोड़ों का नुकसान

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