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डोंगरगांव में फोरलेन विवाद: ग्रामीणों ने उठाई बायपास की मांग, बोले – ‘जनजीवन बचे तभी विकास सार्थक होगा’


गडकरी जी, क्या यही है ‘स्मार्ट’ विकास? 🖋️ जनमत जागरण की विशेष ग्राउंड रिपोर्ट | ‘विकास या विनाश?’ श्रृंखला की पहली कड़ी

डोंगरगांव की पुकार: “सड़कें बने, पर जनजीवन न उजड़े!”

सार्थक दृष्टिकोण से विशेष रिपोर्ट

एक तरफ सरकार ‘गांव से शहर तक’ कनेक्टिविटी बढ़ाने का सपना बुन रही है, वहीं दूसरी तरफ डोंगरगांव जैसे गांवों में ये कनेक्टिविटी किसी त्रासदी की दस्तक बनती जा रही है।

सड़कें जीवन को जोड़ती हैं, लेकिन जब वे लोगों के जीवन पर ही चढ़ जाएँ, तो क्या उसे विकास कहा जाएगा?

उज्जैन से झालावाड़ को जोड़ने वाली NHAI 552G फोरलेन परियोजना का एक खंड ग्राम डोंगरगांव के लिए विकास की सौगात नहीं, बल्कि विनाश की आहट बनकर आया है। जहां हर अन्य गाँवों में हाईवे को गाँव से बायपास कर आगे बढ़ाया जा रहा है, वहीं डोंगरगांव में यही फोरलेन सीधा गांव के मध्य से निकालने का प्रयास हो रहा है।

जनता चीख रही है, शासन चुप है। बस्तियाँ कांप रही हैं, जनप्रतिनिधि व्यस्त हैं।

गांव के बीच से गुजरने वाली यह सड़क, वहाँ के घर, मंदिर, विद्यालय, दुकानें, आंगन, खेल मैदान, पेड़-पौधे और पीढ़ियों की स्मृतियाँ सबको रौंदने जा रही है। बुज़ुर्गों की साँसे, बच्चों के सपने और माताओं के रास्ते – सब अधिग्रहण की जद में हैं।


“डोंगरगांव ही क्यों? क्या यहाँ के आँसू गिनती में नहीं आते?”

ग्रामीणों ने पूछा है – जब तनोडिया से सालियाखेड़ी तक अन्य स्थानों पर फोरलेन को बाईपास कर निकाला जा रहा है, तब डोंगरगांव में ही गांव को चीरते हुए क्यों लाया जा रहा है?

क्या इसलिए कि यहाँ जनसंख्या कम है? या इसलिए कि यहाँ के आँसू अब तक कैमरे की लेंस में नहीं दिखे?

ग्रामीण ललिता बाई चौधरी, पूनमचंद गुप्ता, दीपक गुप्ता राकेश राठौर, गिरीश शर्मा ,गायत्री बाई रेखा राठौर , बेगम मंसूरी समेत सैकड़ों लोग SDM सर्वेश यादव, कलेक्टर राघवेंद्र सिंह, NHAI प्रोजेक्ट डायरेक्टर एमके पूर्णिया और सांसदों को ज्ञापन सौंप चुके हैं, लेकिन अब तक कोई संतोषजनक आश्वासन नहीं मिला

गडकरी जी, क्या यही है ‘स्मार्ट’ विकास?

माननीय केंद्रीय सड़क परिवहन मंत्री नितिन जी गडकरी वर्षों से प्राकृतिक, टिकाऊ और मानव-केंद्रित विकास के पक्षधर रहे हैं। उनकी नीति हमेशा रही है –”सड़कें जीवन आसान बनाएं, न कि जीवन को ही कुचल दें!”तो क्या डोंगरगांव में बायपास बनाकर विकास और जनजीवन – दोनों को सुरक्षित रखना, आज भी असंभव है?


“धरना, भूख हड़ताल तक जाएंगे, पर गांव नहीं उजड़ने देंगे!”

अगर फोर लाइन को प्रशासन द्वारा बाईपास होकर नहीं निकाला गया तो हम सभी पीड़ित परिवार के लोग अपने बच्चों को लेकर रोड पर बैठकर धरना प्रदर्शन करेंगे और जरूरत पड़ी तो भूख हड़ताल पर भी बैठेंगे जिसकी समस्त जवाबदारी शासन प्रशासन की रहेगी इस अवसर पर मुकेश गुप्ता भंवर सिंह जोधाणा शालिग्राम मोदी पराग कुमार गुप्ता रंजीत राठौर राजेश जाट अशोक बैरागी राजेश मालाकार भवानी शंकर मालाकार सहित बड़ी संख्या में महिलाएं पुरुष मौजूद रहे।

ग्रामीणों ने स्पष्ट चेतावनी दी है –

“यदि हमारी मांग पर ध्यान नहीं दिया गया तो हम बच्चे-बूढ़ों समेत सड़क पर बैठेंगे, प्रदर्शन करेंगे और ज़रूरत पड़ी तो भूख हड़ताल पर भी जाएंगे। इसकी ज़िम्मेदारी शासन-प्रशासन की होगी।”

इस जनचेतना की बैठक डोंगरगांव बस स्टैंड के समीप आयोजित हुई, जहाँ पीड़ितों ने प्रेस के सामने अपनी व्यथा रखी और मीडिया से गुहार लगाई कि –

“आप ही चौथा स्तंभ हो, हमारी बात शासन तक पहुँचाओ।”


कलेक्टर का जवाब:

“डोंगरगांववासियों द्वारा दिए गए आवेदन को NHAI को भेजा गया है।”
राघवेंद्र सिंह, कलेक्टर, आगर मालवा


गाँव अब ‘पुराने नक्शों’ में नहीं समाता

आज का गाँव 10-20 साल पहले वाले गांव जैसा नहीं रहा। जनसंख्या बढ़ी है, बसाहट विस्तारित हुई है, लोगों के रोजगार अब मुख्य मार्गों से जुड़े हैं। ऐसे में पुराने नक्शों की लकीरों पर अगर नए फोरलेन खींचे जाएंगे, तो वह सड़क नहीं, तबाही का खाका बन जाएंगे।

सार्थक समापन

👉 यह सिर्फ एक गाँव की मांग नहीं है, यह उस लोकतंत्र की परीक्षा है जो अपने नागरिकों की पीड़ा पर आँखें मूंदे बैठा है।
👉 डोंगरगांव में बायपास निकालना केवल एक तकनीकी फैसला नहीं, एक नैतिक उत्तरदायित्व है।
👉 गडकरी जी ने हमेशा सस्टेनेबल और मानवोचित विकास की वकालत की है, तो क्या अब भी समय नहीं है कि इस सड़क को गाँव से नहीं, गांव के जीवन के बाहर निकाला जाए?


“विकास का रास्ता दिलों को जोड़ता है, घरों को उजाड़ता नहीं!”
“डोंगरगांव बचेगा, तभी विकास सच्चा कहलाएगा!”

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