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पंच परिवर्तन : शताब्दी महायज्ञ में संघ का संकल्प और समाज का उत्तरदायित्व और विश्व मंच पर भारत की पुकार”

“स्वबोध से समरसता तक : संघ के पांच सूत्र, राष्ट्र की नई दिशा”

परिवार, समाज और पर्यावरण—हर स्तर पर परिवर्तन लाकर भारत को आत्मनिर्भर और सशक्त बनाना है

शताब्दी महायज्ञ में जनमत जागरण की ओर से अर्पित एक साहित्यिक आहुति

जब किसी राष्ट्र की आत्मा जागती है तो इतिहास करवट लेता है। जब किसी संस्कृति का स्वाभिमान पुनर्जीवित होता है तो भविष्य की दिशा बदल जाती है। और जब किसी समाज का संगठन सौ वर्षों की तपस्या के बाद एक महायज्ञ का दीप प्रज्वलित करता है, तो वह केवल अपने लिए नहीं, बल्कि समस्त मानवता के लिए उजाला फैलाता है।

राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ का शताब्दी वर्ष केवल संगठन की यात्रा का पर्व नहीं, यह भारत की आत्मा के पुनर्जागरण का क्षण है। यह शताब्दी एक ऐसा साहित्यिक यज्ञ है, जिसमें विचारों की आहुति देकर हम न केवल अतीत का स्मरण कर रहे हैं, बल्कि भविष्य के भारत की रूपरेखा भी रच रहे हैं।

इसी यज्ञ की अग्नि में संघ ने जो पाँच आहुति रूपी सूत्र डाले हैं, उन्हें ‘पंच परिवर्तन’ कहा गया है। ये पाँच सूत्र केवल घोषणाएँ नहीं हैं, बल्कि भारतीय जीवन-दर्शन के पाँच स्तंभ हैं, जिन पर खड़ा होकर राष्ट्र 2047 तक विश्वगुरु के अपने लक्ष्य की ओर अग्रसर हो सकता है।


1. स्व बोध – आत्मा की पहचान, राष्ट्र की पहचान

स्व बोध केवल आत्मचेतना नहीं, बल्कि आत्मस्वीकृति भी है।
स्वामी विवेकानंद ने कहा था – “हमारी सबसे बड़ी आवश्यकता आत्मविश्वास है।” यही आत्मविश्वास जब संस्कृति और राष्ट्र से जुड़ता है, तब “स्व बोध” जन्म लेता है।

स्व बोध का अर्थ है—
👉 अपनी भाषा को हीन न मानना,
👉 अपनी संस्कृति को पिछड़ा न समझना,
👉 अपनी परंपरा को बोझ नहीं, धरोहर मानना।

संघ इस बिंदु के माध्यम से हमें याद दिलाता है कि यदि हम स्वयं को भूलेंगे तो दुनिया हमें कभी याद नहीं रखेगी। और यदि हम स्वयं को जानेंगे, तो पूरी दुनिया हमें पहचानने पर विवश होगी।


2. पर्यावरण – प्रकृति ही राष्ट्र की धड़कन

भारत ने सदियों से प्रकृति को देवता माना है। यहाँ तुलसी का पौधा आँगन में देवत्व पाता है, पीपल के वृक्ष के नीचे आध्यात्मिक चेतना का संचार होता है और गंगा की धारा माँ कहलाती है।

पर्यावरण संरक्षण केवल ‘अभियान’ नहीं, यह हमारे जीवन की अनिवार्यता है।
👉 जल बचाना केवल पानी की रक्षा नहीं, बल्कि आने वाली पीढ़ियों को जीवन देने का संकल्प है।
👉 प्लास्टिक का त्याग केवल प्रदूषण घटाना नहीं, बल्कि पृथ्वी को साँस लेने का अवसर देना है।
👉 वृक्षारोपण केवल हरियाली नहीं, बल्कि धरती को पुनः उसका आभूषण लौटाना है।

संघ का यह परिवर्तन हमें स्मरण कराता है कि जो राष्ट्र अपनी नदियों और वनों को बचा लेगा, वही भविष्य में मानवता को भी बचा पाएगा।


3. सामाजिक समरसता – बंधुत्व का सूत्र

समाज तभी शक्तिशाली होता है जब उसमें बिखराव नहीं, बल्कि बंधुत्व हो।
जाति, पंथ, वर्ग और प्रांत की दीवारें जब टूटती हैं, तभी राष्ट्र का विराट स्वरूप उभरता है।

सामाजिक समरसता का व्यावहारिक रूप यही है कि—
👉 मंदिर सबके लिए समान हों,
👉 श्मशान सबके लिए समान हों,
👉 जलस्रोत सबके लिए समान हों।

यह केवल नारा नहीं, बल्कि भारत की उस अखंड चेतना का प्रतिबिंब है जिसमें “सर्वे जनाः सुखिनो भवन्तु” का आशीर्वाद बहता है।


4. कुटुंब प्रबोधन – राष्ट्र निर्माण की पहली पाठशाला

परिवार केवल रक्त-संबंध नहीं, संस्कार-संबंध भी है। परिवार में संवाद टूटा तो समाज में भी टूटन बढ़ेगी। परिवार में समरसता आई तो समाज भी सौहार्द्र से भरेगा।

कुटुंब प्रबोधन का सार यही है कि—
👉 घर की चौखट पर संवाद जीवित हो,
👉 पीढ़ियों के बीच सम्मान बना रहे,
👉 माँ का संस्कार, पिता का अनुशासन, बहन का स्नेह और भाई का सहयोग एक ही सूत्र में बँधें।

संघ का यह परिवर्तन कहता है कि यदि घर में मंगल संवाद होगा, तो समाज में भी मंगल वातावरण स्वतः बनेगा।


5. नागरिक कर्तव्य – राष्ट्र ही परिवार

भारत के संविधान ने हमें अधिकार दिए हैं, पर अधिकार तभी जीवंत हैं जब कर्तव्य निभाए जाएँ।
👉 मतदान करना,
👉 कर चुकाना,
👉 समाज सेवा में भाग लेना,
👉 नियमों का पालन करना—

ये सब राष्ट्र की नींव मजबूत करते हैं। नागरिक कर्तव्य का बोध ही एक साधारण प्रजा को ‘राष्ट्र निर्माता’ में बदल देता है।


समापन – शताब्दी यज्ञ की अग्नि में हमारी आहुति

संघ के ये पाँच परिवर्तन केवल संघ के कार्यक्रम नहीं हैं, यह राष्ट्र के लिए जीवन-संहिता हैं।

आज जब शताब्दी वर्ष के इस महायज्ञ में संघ ने अपनी तपस्या का पुष्प अर्पित किया है, तो हमें भी आत्ममंथन करना होगा—
👉 क्या हमने अपने स्व का बोध किया?
👉 क्या हमने पर्यावरण के प्रति अपना दायित्व निभाया?
👉 क्या हमने समाज में समरसता फैलाई?
👉 क्या हमने परिवार को संवाद से जोड़ा?
👉 क्या हमने नागरिक कर्तव्यों का पालन किया?

यदि उत्तर ‘हाँ’ है तो यही हमारी ओर से इस यज्ञ की आहुति होगी। और यदि उत्तर ‘नहीं’ है, तो यही हमारे लिए आत्मचिंतन का अवसर है।

राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ का यह शताब्दी पर्व हमें यही याद दिलाता है कि संघ ने हमें केवल संगठन नहीं, बल्कि जीवन-दर्शन दिया है। अब यह हमारा दायित्व है कि हम इस दर्शन को कर्म में उतारें, और भारत को वह स्थान दिलाएँ जिसकी ओर पूरी दुनिया आशाभरी दृष्टि से देख रही है।


✍️ राजेश कुमरावत ‘सार्थक’
संपादक – जनमत जागरण (शताब्दी महायज्ञ में जनमत जागरण की ओर से अर्पित एक साहित्यिक आहुति)

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