श्री सूर्यवंशी कुमरावत तंबोली समाज : “भानपुरा में सैकड़ों वर्षों पुरानी परंपरा: शरद पूर्णिमा पर केशुबावजी महाराज का भव्य विवाह महोत्सव”

📰 भानपुरा में शरद पूर्णिमा पर केशुबावजी महाराज का विवाह महोत्सव

श्रेणी: विशेष / धार्मिक-सांस्कृतिक रिपोर्ट
“शरद पूर्णिमा की रात भानपुरा में आराध्य देव केशुबावजी महाराज का भव्य विवाह महोत्सव संपन्न, समाज और संस्थाओं ने पुष्प वर्षा कर स्वागत किया।
युवा-युवतियों, बालक-बालिकाओं ने ढोल-ढमाके, नृत्य और झांकियों से नगर को उत्सवमयी रंगों से भर दिया।”

जनमत जागरण @ भानपुरा (मंदसौर) : भानपुरा नगर में शरद पूर्णिमा के अवसर पर मंगलवार को श्री सूर्यवंशी कुमरावत तंबोली समाज ने अपने आराध्य देव केशुबावजी महाराज के विवाह महोत्सव की भव्य शोभायात्रा आयोजित की। नगर के प्रमुख मार्गों से होते हुए यह शोभायात्रा ढोल-ढमाकों, बैंड-बाजों और आतिशबाजी के साथ निकाली गई। पुरुष वर्ग ने सफ़ेद कुर्ता-पजामा और साफ़े, महिलाएँ लाल चुनरी में सज-धज कर भाग लिया। युवा और बालक-बालिकाओं ने नृत्य, ढोल और लेजिम प्रदर्शन से पूरे नगर को उत्सवमयी रंग में रंग दिया।

सार्थक दृष्टिकोण से यह महोत्सव केवल धार्मिक उत्सव नहीं है, बल्कि प्राचीन सनातन संस्कृति और समाज के ऐतिहासिक भावों का प्रतीक है। केशुबावजी महाराज को पान की खेती की रक्षा करने वाला देव माना जाता है। पान की खेती अत्यंत नाजुक होती है; इसके संरचना हल्की और संवेदनशील होती है। केशुबावजी महाराज का समाज द्वारा हर साल शरद पूर्णिमा पर विवाह महोत्सव संपन्न कर इसे नियंत्रित और सुरक्षित रखने का भाव प्रकट किया जाता है।

यह आयोजन समाज के लिए ऐतिहासिक, सांस्कृतिक और कृषि-संवेदनशील दृष्टिकोण से अत्यंत महत्वपूर्ण है। यह परंपरा न केवल भानपुरा, बल्कि पूरे भारतवर्ष में धूमधाम से मनाई जाती है, जिसमें हर पंचायत वाइज समाजजन सम्मिलित होते हैं। समाज और संस्कृति का यह अद्भुत संगम, पान की खेती की रक्षा और सनातन विश्वासों के संदेश का प्रतीक है।
यह उत्सव केवल भानपुरा तक सीमित नहीं है। मालवा क्षेत्र के कुकडेश्वर, देवास में नागदा और पड़दा, तथा राजस्थान के निकटस्थ क्षेत्रों दुधालिया, झालावाड़ में भी यह महोत्सव धूमधाम से संपन्न होता है।कुल मिलाकर, जहाँ-जहाँ पान की खेती होती है, वहाँ समाजजन और विभिन्न संस्थाएँ इस महोत्सव को मनाकर कृषि संरक्षण और परंपरा की चेतना को जीवित रखते हैं।
💚 बालक-बालिकाओं और युवा सहभागिता

युवा और बालक-बालिकाओं ने नृत्य, ढोल, ढफली और लेज़िम, डांडियों का मनमोहक प्रदर्शन किया।
शोभायात्रा में भगवान श्री रामजी का बैवाणजी, अन्य झांकियां और अश्वसवार शामिल थे।
नगर के विभिन्न समाजों और संस्थाओं ने पुष्प वर्षा कर और पेयजल, फल-बिस्किट वितरित कर शोभायात्रा का स्वागत किया।
💚 सांस्कृतिक और धार्मिक महत्त्व

शोभायात्रा का समापन पुरानी नागर माता मंदिर तीर्थधाम परिसर में महा आरती के साथ हुआ।
समाज के सभी गणमान्य जन और नगरवासियों ने सामूहिक भोज का आयोजन किया।
इस भव्य आयोजन में 🌿 पान के प्रतीक को विशेष महत्व दिया गया, क्योंकि केशुबावजी महाराज को पान की खेती की रक्षा करने वाला देव माना जाता है।

✒️ सार्थक दृष्टिकोण – संपादक की कलम से
शरद पूर्णिमा की रात जब भानपुरा नगर के प्रमुख मार्गों से भव्य शोभायात्रा निकली, तो यह केवल एक धार्मिक उत्सव नहीं था, बल्कि सदियों पुरानी परंपरा और समाज की चेतना का प्रतीक बनकर सामने आया। केशुबावजी महाराज का विवाह महोत्सव हमें यह याद दिलाता है कि संस्कार, श्रद्धा और समाज के ऐतिहासिक मूल्य आज भी जीवंत हैं।
समाज के युवा और बालक-बालिकाओं के ढोल, ढमाके, नृत्य और झांकियों ने नगर को उत्सवमयी रंगों से भर दिया। पुरुष वर्ग के सफ़ेद कुर्ता-पजामे और महिलाओं की लाल चुनरी इस उत्सव की सौंदर्य और भक्ति की छवि को और भी जीवंत बनाती है। नगर के विभिन्न समाजों और संस्थाओं द्वारा पुष्प वर्षा और स्वागत इस बात का परिचायक है कि जब समाज एकत्र होता है, तो उसकी शक्ति केवल भौतिक नहीं, बल्कि सांस्कृतिक और आध्यात्मिक होती है।
परंतु इस उत्सव का अर्थ केवल भव्य आयोजन में नहीं है। केशुबावजी महाराज को पान की खेती के संरक्षक के रूप में पूजा जाता है। पान की खेती अत्यंत नाजुक होती है; इसकी संरचना हल्की और संवेदनशील होती है। बरबुरिया, चक्रवर्ती तूफान यदि आता है तो फसल को भारी नुकसान पहुँचाता है। हजारों वर्षों से समाज ने इस प्राकृतिक संवेदनशीलता और कृषि सुरक्षा को ध्यान में रखकर अपने आराध्य देव केशुबावजी महाराज के विवाह उत्सव का आयोजन किया। यही सांस्कृतिक विज्ञान और परंपरा का अनुपम संगम है – श्रद्धा के माध्यम से प्रकृति और कृषि की रक्षा।
इस प्रकार यह पर्व हमें यह संदेश देता है कि सांस्कृतिक उत्सव केवल भव्यता और आनंद के लिए नहीं होते, बल्कि समाज की रक्षा, प्राकृतिक संवेदनशीलता की समझ और आने वाली पीढ़ियों के लिए चेतना जगाने के लिए आयोजित किए जाते हैं। शरद पूर्णिमा का यह महोत्सव हमें याद दिलाता है कि जब समाज अपने देव, परंपरा और प्राकृतिक संसाधनों का सम्मान करता है, तो वह अपने अस्तित्व और भविष्य दोनों की रक्षा करता है।
समाज, संस्कृति और कृषि – तीनों के इस दिव्य संगम में भानपुरा के कुमरावत तंबोली समाज ने एक मिसाल कायम की है। यही भाव, यही दृष्टिकोण, यही सार्थक चिंतन हमें सनातन परंपरा और आधुनिक सामाजिक जिम्मेदारी दोनों की सीख देता है। 🍃 ✍️ — राजेश कुमरावत ‘सार्थक’



