कफ सिरप से बच्चों की मौत: सुसनेर में प्रशासन सक्रिय — “प्रदेशभर में मेडिकल जांच, पर असली दोषी अब भी आज़ाद!”

🔸✍️ प्रदेश में जहरीले कफ सिरप से बच्चों की मौतों के बाद प्रशासन हरकत में आ गया है। केंद्र से लेकर राज्यों तक दवा कंपनियों की जवाबदेही तय करने की मांग तेज हो गई है। वहीं, ज़मीन पर स्वास्थ्य व्यवस्था की सच्चाई यह है कि हादसे के बाद ही “सिस्टम” जागता है — और कुछ दिन बाद फिर वही ढर्रा, वही लापरवाही।
“खाद विभाग की जांच तेज, स्वास्थ्य विभाग अब भी नींद में?”
कहने को दवा, देखने में ज़हर — जानिए सुसनेर की जांच की परतें

जनमत जागरण @ सुसनेर से हमारे संवाददाता दीपक जैन की ग्राउंड रिपोर्ट
कफ सिरप से प्रदेश में बच्चों की मौतें रिपोर्ट होने के बाद जिला कलेक्टर प्रीति यादव के निर्देश पर आगर जिले में अलग-अलग दल गठित किए गए हैं। मंगलवार को एसडीएम सर्वेश यादव के मार्गदर्शन में प्रशासन की संयुक्त टीम ने नगरीय क्षेत्र के 4 मेडिकल स्टोर्स (शिफा मेडिकल स्टोर्स, बालाजी मेडिकल, न्यू राज मेडिकल व जैन मेडिकल) और 2 खाद्य संस्थानों (इमली चौराहा स्थित कालवा बालाजी रेस्टोरेंट व हाथी दरवाजा स्थित माही बीकानेर मिष्ठान भंडार) का निरीक्षण कर पंचनामा तैयार किया और खाद्य संबंधी सैंपल एकत्रित कर जांच के लिए भेज दिए गए। तहसीलदार रामेश्वर दांगी, प्रभारी बीएमओ डॉ. बृजभूषण पाटीदार व जिला खाद्य अधिकारी भेरूसिंह जामोद ने क्षेत्रीय दुकानदारों व मेडिकल संचालकों को निर्देश भी दिए। (स्थानीय निरीक्षण व ब्योरा — जनमत जागरण/स्थानीय टीम रिपोर्ट)
🔸प्रदेश परिदृश्य
राज्यभर में कफ सिरप पर प्रतिबंध के आदेश जारी हैं। अन्य जिलों में भी प्रशासनिक दल मेडिकल स्टोर्स की तलाशी ले रहे हैं। लेकिन सवाल यह है कि —
क्या जांच केवल “औपचारिकता” भर है या वास्तव में बच्चों की जान की कीमत पर चल रहे भ्रष्ट दवा कारोबार की जड़ तक पहुंचने की हिम्मत प्रशासन करेगा?
🔸तंत्र की विफलता
सरकारी अस्पतालों में इलाज से जनता का भरोसा लगातार टूट रहा है। महंगी दवाओं के नाम पर सस्ती और घटिया क्वालिटी की दवाएं खरीदी जाती हैं।
दवा कंपनियों और आपूर्तिकर्ताओं के गठजोड़ में गुणवत्ता निरीक्षण अक्सर फाइलों में दफन रह जाता है।
जब कोई बड़ी दुर्घटना होती है — तभी स्वास्थ्य विभाग नींद से जागता है, प्रेस नोट जारी करता है, और कुछ दिन बाद फिर सब सामान्य हो जाता है…
पर जनविश्वास लौटता नहीं, बल्कि और खोखला होता जाता है।
🔸संक्षिप्त सार्थक सुझाव
1️⃣ सैंपल रिपोर्ट सार्वजनिक की जाए।
2️⃣ दोषी कंपनियों के लाइसेंस तत्काल निलंबित हों।
3️⃣ सरकारी दवा खरीद की स्वतंत्र ऑडिट अनिवार्य हो।
4️⃣ गरीब परिवारों के बच्चों को मुफ्त सुरक्षित उपचार मिले।
5️⃣ सार्वजनिक अस्पतालों में गुणवत्ता नियंत्रण की जवाबदेही तय हो।

🟩 सार्थक दृष्टिकोण
स्वास्थ्य विभाग के कमरों में फाइलें मोटी होती जा रही हैं और जनता के शरीर कमजोर।
कहने को योजनाएँ, मिशन, बायोमेट्रिक, टेंडर और जागरूकता अभियान हैं —
पर असल में बीमारी का वायरस “भ्रष्टाचार” है, जिसकी कोई एंटीबायोटिक सरकार ने आज तक नहीं बनाई।
हर बार मौत के बाद जांच, हर जांच के बाद चुप्पी — यही हमारी चिकित्सा प्रणाली का स्थायी इलाज बन गया है।
जब तक अस्पतालों की दीवारों से दलाली का धुआं नहीं हटेगा,
तब तक हर दवा की शीशी में मौत की बूंदें घुलती रहेंगी।
यह घटना केवल कुछ बच्चों की नहीं, बल्कि पूरे समाज की चेतना की परीक्षा है।
अगर इस बार भी “कफ सिरप” के बहाने फाइलें ठंडी पड़ गईं —
तो अगली मौत किसी और घर की नहीं, शायद हमारी सोच की होगी।
— सार्थक दृष्टिकोण
(राजेश कुमरावत ‘सार्थक’ – संपादक, जनमत जागरण)



