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सुसनेर में त्याग की पराकाष्ठा या तप का शिखर? मुनि मौन सागर जी की मौन साधना बनी आत्मा का आलोक | जब जीवन मौन हुआ, आत्मा ने कहा — “अब मैं जा रहा हूँ…” | पढ़िए यह प्रेरक संदेश

🕉️ मौन सागर की महान साधना : जब त्याग बन जाए जीवन का उत्सव

✍️– सार्थक चिंतन

त्याग, समर्पण और आत्मशुद्धि का वह क्षण जब व्यक्ति शरीर से नहीं, संस्कारों और कषायों से भी मुक्त होने की साधना में लीन हो जाए — वही है संलेखना का क्षण
आज जब संसार की गति भोग, प्रतिस्पर्धा और प्रदर्शन की ओर है, उसी युग में सुसनेर में विराजमान मुनि मौन सागर जी अपनी शांत, गंभीर और समाधिमय उपस्थिति से यह संदेश दे रहे हैं कि —

“जीवन का चरम सौंदर्य त्याग में है, न कि उपभोग में।”

यह साधना केवल मुनि की नहीं, बल्कि समूचे समाज के आत्ममंथन की यात्रा है।


सुसनेर में चल रही मुनि मौन सागर जी की यम संलेखना व्रत की साधना का आज 16वां दिन

“सूर्यास्त तक मत रुको, चीजें तुम्हें त्यागने लगे उससे पहले तुम उन्हें त्याग दो।” – मुनि मौन सागर जी

सुसनेर। नगर के तीर्थ क्षेत्र त्रिमूर्ति दिगम्बर जैन मंदिर में समाधिस्थ मुनि भूतबलि सागर जी के 73 वर्षीय शिष्य मुनि श्री मौन सागर जी की यम संलेखना की साधना निरंतर जारी है। 24 अक्टूबर 2025 से प्रारंभ हुई इस साधना का आज 16वां दिन है।

चातुर्मास समापन के बाद 26 अक्टूबर रविवार को मुनि श्री मौन सागर जी ने अपने सभी दायित्व अनुज मुनि श्री मुनि सागर जी को सौंपकर स्वयं यम संलेखना व्रत धारण किया।
अब वे अन्न-जल सबका त्याग कर, मौन के साथ आत्मचिंतन और समता में स्थित हैं।

देश के विभिन्न राज्यों — राजस्थान, महाराष्ट्र, कर्नाटक और मध्यप्रदेश सहित — से दर्शनार्थी सुसनेर पहुंच रहे हैं, इस अद्वितीय तप-साधना के दर्शन हेतु।


मौन सागर जी के अंतिम शब्द

“अब मैं सब कुछ त्याग कर स्वयं में अंतर्ध्यान हो रहा हूं।”

यह वाक्य केवल एक वाक्य नहीं, बल्कि जीवन दर्शन का शिखर है।
यह उस साधक की घोषणा है जिसने “प” अक्षर से शुरू होने वाली हर परत—प्रतिष्ठा, प्रतिस्पर्धा, प्रदर्शन, परिग्रह, प्रोजेक्ट, पैसा और पाप—को जीवन से विसर्जित कर दिया।


जैन संतों का आशीर्वाद

दिगम्बर जैन परंपरा के आचार्य श्री समय सागर जी, मुनि निष्पक्ष सागर जी, मुनि प्रनुत सागर जी सहित अन्य संतों ने अपने आशीर्वाद संदेश भेजे हैं।
मुनि विवर्धन सागर जी ससंघ सुसनेर पधारे हैं।


देवेंद्र कुमार से मुनि मौन सागर बनने तक

कर्नाटक के बेलगाम के निकट छोटे से गाँव बस्तवाड़ा में 1952 में जन्मे देवेंद्र कुमार ने 1988 में भूतबलि सागर जी के संघ के साथ विहार किया और फिर घर नहीं लौटे।
1994 में ऐलक दीक्षा और 1996 की अक्षय तृतीया को उन्होंने मुनि दीक्षा धारण की — और देवेंद्र बने मौन सागर

जीवनभर मौन साधना में लीन रहे इस संत ने कभी संवाद नहीं किया, केवल साधना की।
उन्होंने भोग नहीं, योग चुना; संग्रह नहीं, संलेखना चुनी।


सुसनेर से सिद्धमार्ग तक का मार्ग

देश के सात राज्यों में पदविहार करने वाले मुनि मौन सागर जी ने 2006 में पहली बार मध्यप्रदेश की धरती पर विहार किया।
2023 और 2025 के चातुर्मास सुसनेर में रहे।
26 अक्टूबर को उन्होंने यम संलेखना व्रत धारण कर सिद्धों के शाश्वत लोक की यात्रा आरंभ की।


संलेखना क्या है?

संलेखना (संथारा) का अर्थ है—शरीर के प्रति मोह का पूर्ण विसर्जन।
जब साधक शरीर से नहीं, आत्मा से जीना प्रारंभ करता है।
यम संलेखना वह स्थिति है जब साधक स्वेच्छा से आहार-विहार का त्याग कर, शरीर से भी ममत्व समाप्त कर देता है और समता में स्थित होकर शरीर का विसर्जन करता है।


सुसनेर की भूमि — साधना की साक्षी

इस पावन भूमि पर पूर्व में मुनि समता सागर जी, मुनि मार्दव सागर जी, पूर्वाचार्य दर्शन सागर जी, आर्यिका पार्श्वमति एवं क्षुल्लिका मनोमती माताजी समाधि साधना कर चुके हैं।
अब मुनि मौन सागर जी उसी मोक्षमार्ग की यात्रा पर हैं।


🕊️ संवाददाता : दीपक जैन, सुसनेर

(जनमत जागरण संवाददाता सुसनेर से)


✍️ सार्थक दृष्टिकोण

मौन सागर जी का जीवन हमें यह सिखाता है कि मौन भी प्रवचन होता है, जब जीवन स्वयं संदेश बन जाए।
आज का युग जहाँ ‘भाषणों’ से भरा है, वहाँ मौन साधना यह बताती है कि

“वाणी से नहीं, जीवन से प्रभाव पड़ता है।”

त्याग का यह शिखर केवल जैन परंपरा का गौरव नहीं, बल्कि मानवता के लिए प्रेरणा है।
जीवन की संध्या में नहीं, जीवन के मध्य में ही त्याग का अभ्यास करें, ताकि अंत में हमें त्यागना न पड़े — हम स्वयं त्याग बन जाएँ।

– राजेश कुमरावत ‘सार्थक’ संपादक जनमत जागरण


🔹 सार्थक दृष्टिकोण से जुड़ा चिंतन:


त्याग और तप के इस युग में हमें यह भी देखना होगा कि दुनिया में धर्म और सार्वजनिक जीवन के स्वरूप कैसे बदल रहे हैं। जब मुनि मौन सागर जी मौन होकर भी संदेश दे रहे हैं, तब दुनिया के एक कोने में धर्म का शोर बढ़ता जा रहा है। जानिए यह विरोधाभास क्या कहता है —


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