“समाज में वैचारिक बढ़ती खाई : शिक्षा, धर्म और राजनीति के बीच एक चिंताजनक उभरती तस्वीर”(डॉ. बालाराम परमार)

समाज में वैचारिक बढ़ती खाई: एक चिंताजनक उभरती तस्वीर
✍️ डॉ. बालाराम परमार ‘हँसमुख’
भारत जैसे विविधताओं से भरे देश में "विचारों की स्वतंत्रता" हमेशा हमारी ताकत रही है, लेकिन आज यही स्वतंत्रता ‘विभाजन’ का रूप लेती दिख रही है। समाज के भीतर धीरे-धीरे पनप रही वैचारिक दूरी, रिश्तों में ठंडापन, और संवाद की कमी — यह सब मिलकर एक गहरी सामाजिक खाई बना रहे हैं। यह खाई सिर्फ विचारों की नहीं, बल्कि ‘मानवता’ की नींव को कमजोर कर रही है। शिक्षा, तकनीक और आधुनिकता के बावजूद जब मनुष्य एक-दूसरे से कटने लगे, तो सवाल उठता है — आखिर हमारी प्रगति का असली अर्थ क्या है? यही प्रश्न उठाता है यह गहन विचारपूर्ण लेख — “समाज में वैचारिक बढ़ती खाई: एक चिंताजनक उभरती तस्वीर।”
वर्तमान भारतीय समाज जो सदियों से एक साथ रह रहा है, आपसी रिश्तों की डोरी ज्यादा कमजोर होती जा रही है। इसका कारण यह देखा गया है कि इंसान गलतफहमी का शिकार होता जा रहा है और भाईचारे की गहराती खाई को पाटने के स्थान पर सवालों का जवाब खुद ही बनाने लगता है।
यह स्थिति तब है जब वर्तमान समय में आजादी के पचहत्तर साल पूरे हो गए हैं और शैक्षिक ढांचे के मामले में भारत 50 देशों में दूसरे स्थान पर है। भारतीय राष्ट्रीय सांख्यिकी आयोग की एक रिपोर्ट के अनुसार ग्रामीण क्षेत्रों की साक्षरता दर 73.5% और शहरी क्षेत्रों की साक्षरता दर 87.7% है। विकासशील भारत में भेदभाव रूपी ऐसी तस्वीर देख रहे हैं जो हमें चिंतित करती है।
रिश्तों में खटास, परिवार में विघटन, धर्म के नाम पर खाई, भाषाई विवाद, और राजनीतिक कटुता के लक्षण हमें एक ऐसे भविष्य की ओर ले जा रहे हैं जो धार्मिक, सामाजिक और क्षेत्रीय स्तर पर बिखराव का संकेत और संदेश दे रहे हैं। यदि इसी तरह के वैचारिक मतभेद बने रहते हैं तो भारत माता के लिए कष्टदायी स्थिति पैदा होने से कोई नहीं रोक सकता।
देश में विद्यमान अनेकता को देखते हुए महात्मा गांधी ने कहा था — “हमें अपने विचारों को बदलना होगा, तभी हम अपने जीवन को बदल सकते हैं।” लेकिन वर्तमान समाज में, हम देख रहे हैं कि लोग अपने विचारों को बदलने के बजाय, दूसरों पर आरोप लगाने और विवाद पैदा करने में अधिक रुचि ले रहे हैं।
‘जैसा बोओगे वैसा पाओगे’ के आलोक में एक उदाहरण लेते हैं — एक छोटा बच्चा अपने माता-पिता को देखता है कि वे छोटी-छोटी बातों पर आपस में लड़ रहे हैं। वह बच्चा क्या सीखता है? वह सीखता है कि विवाद और लड़ाई ही समस्याओं का समाधान है। और जब वह बड़ा होता है, तो वह भी इसी तरह के व्यवहार को अपनाता है।
भारत में तेरहवीं शताब्दी के बाद धार्मिक उन्माद के विघटनकारी परिणामों को देखते हुए स्वामी विवेकानंद ने देश को एकजुट करने के उद्देश्य से कहा था — “हमारे पास एक ही धर्म है, और वह है मानवता।” लेकिन वर्तमान समाज में, हम देख रहे हैं कि लोग धर्म के नाम पर कटुता पैदा कर रहे हैं। परिणामस्वरूप, एक ही गांव और मोहल्ले में रहने, एक ही कूएँ का पानी पीने वाले, एक-दूसरे के प्रति घृणा और अविश्वास करने में देर नहीं लगाते।
गांधीवादी और शांति के क्षेत्र में नोबेल पुरस्कार प्राप्त प्रख्यात मानवतावादी नेल्सन मंडेला ने जेल में रहते हुए विश्व को संदेश दिया था — “स्वतंत्रता का अर्थ है दूसरों को भी स्वतंत्रता देना।” लेकिन वर्तमान समाज में हम देख रहे हैं कि लोग अपने अधिकारों की मांग करते हैं, परंतु दूसरों के अधिकारों की अनदेखी करते हैं।
भारत में तो अक्सर देखा जा रहा है कि निन्यानवे प्रतिशत लोग संविधान की दुहाई देते हैं और संवैधानिक संस्थाओं का मखौल उड़ाते हैं। संवैधानिक संस्थाओं पर प्रश्न उठाना और उनके निर्णय को कटघरे में खड़ा करना राजनीतिक नेताओं की दिनचर्या बनती जा रही है। संवैधानिक पदों पर बैठे कर्मचारी-अधिकारी भ्रष्टाचार करते हैं, नागरिक अधिकारों का हनन करते हैं और न्याय के क्षेत्र में पद का दुरुपयोग करते हुए लिपापोती करने में शर्म नहीं करते।
इस तरह की विकृत मानसिकता और विचारों को ध्यान में रखते हुए यह समझना होगा कि समाज में धार्मिक और राजनीतिक बढ़ती दरार को रोकने के लिए सभी संवैधानिक शीर्ष संस्थाओं को गंभीरता से विचार करने की आवश्यकता है।
कलुषित विचारों को धराशायी करने के लिए हमें अपने शैक्षणिक संस्थानों में ऐसे पाठ्यक्रम सम्मिलित करने होंगे, जो मानव मूल्यों की स्थापना करें। धर्म से जुड़ी धार्मिक संस्थाओं और उनके प्रमुखों को भी गंभीरता से विचार करना होगा कि अपने धर्म में फैल रही कट्टरता को शिथिल कर, पारस्परिक सम्मान और समझदारी को बढ़ाया जाए।
हँसमुख चिंतन यही कहता है —
“हम सब मिलकर समाज में बढ़ती दरार को रोकने के लिए काम करें और एक शांतिपूर्ण, सौहार्दपूर्ण समाज का निर्माण करें। ऐसा करना हमारी भारत माता के भविष्य के लिए हितकर होगा। वरना इतिहास गवाह है — बाटोगे तो काटोगे, एक रहोगे तो नेक रहोगे, और प्रेम भाव से रहना ही सच्ची धार्मिक सहिष्णुता है।”



