संघ शताब्दी वर्ष: राष्ट्र भाव केवल सीमाओं में नहीं, संस्कृति में बसता है -संघ चालक बलराज जी भट्ट | सुसनेर व सोयतकलां में पंच परिवर्तन पर चर्चा

“हम अलग कैसे, जब भाव एक है?”👉 सामाजिक सद्भावना बैठक में उठी आत्मा को झकझोर देने वाली बात!
सुसनेर/सोयतकलां (जनमत जागरण संवाददाता)
सामाजिक एकता, समरसता और भारतीय सांस्कृतिक भाव के संवर्धन की दिशा में एक प्रेरक पहल के रूप में 9 नवम्बर 2025 को सुसनेर और सोयतकलां—दोनों स्थानों पर सामाजिक सद्भावना बैठकें सम्पन्न हुईं।
सुसनेर में यह बैठक दीक्षित फार्म हाउस में आयोजित की गई, जबकि सोयतकलां में प्रेम शंकर गार्डन में समाज प्रमुखों का व्यापक संगम हुआ। दोनों स्थानों पर कुल मिलाकर 75 समाज प्रमुखों की उपस्थिति रही, जिनमें 40 समाजों का सक्रिय नेतृत्व विशेष रूप से उल्लेखनीय रहा।

दोनों सभाओं में मुख्य वक्ता श्री बलराज भट्ट जी, माननीय संघ चालक, उज्जैन विभाग, रहे, जिन्होंने अपने उद्बोधन में राष्ट्र की अवधारणा, भारतीय संस्कृति की एकात्म भावना और सामाजिक समरसता के पंच परिवर्तन जैसे विषयों पर गहन मंथन प्रस्तुत किया।
राष्ट्र की अवधारणा – भारत की सांस्कृतिक आत्मा
श्री भट्ट जी ने कहा कि —
“पश्चिम की अवधारणा ‘स्टेट’ तक सीमित है, वहीं भारत की अवधारणा ‘राष्ट्र’ की है, जो संस्कृति और भाव से जुड़ी है। रूस जैसे देशों का विघटन इसलिए हुआ क्योंकि वहाँ राष्ट्र की आत्मा नहीं थी; जबकि भारत में राष्ट्र की आत्मा हमारी संस्कृति में बसती है।”
उन्होंने बताया कि उत्तर से दक्षिण और पूरब से पश्चिम तक भारत की एकता संस्कृति में रची-बसी है।
“मातृभूमि केवल भूमि नहीं, माता है — उसका सुख मेरा सुख, उसका दुख मेरा दुख — यही राष्ट्रभाव की जड़ है।”
भारतीय संस्कृति का साझा आधार

मुख्य वक्ता ने कहा कि सभी समाजों के मूल ग्रंथ, देवता और आराध्य एक ही हैं —
“महाभारत, गीता, वेद, पुराण — सभी समाजों के जीवन में समान रूप से प्रतिष्ठित हैं। ब्रह्मा, विष्णु, महेश — इनकी आराधना सब करते हैं। बारह ज्योतिर्लिंग और चार धाम सभी समाजों की आस्था के केंद्र हैं। यही हमारी एकात्म संस्कृति का प्रमाण है।”
उन्होंने बताया कि भारत में जितने भी पंथ हैं, सभी भारतीय संस्कृति से जन्मे हैं। हर धर्म और समाज में समान भाव दिखाई देता है —
‘परोपकाराय पुण्याय’ और ‘सर्वे भवन्तु सुखिनः’ जैसे विचार हर आस्था में रचे-बसे हैं।
“हमारी सनातन संस्कृति का आधार समभाव है — जिसमें भेद नहीं, केवल एकत्व का भाव है।”

समान भाव, समान संस्कार
भट्ट जी ने समाज के साझा संस्कारों के उदाहरण देते हुए कहा —
“बिल्ली का रास्ता काटना, छींक आना या बच्चों को नजर से बचाने के लिए काजल लगाना — ये परंपराएँ हर समाज में हैं। इसका अर्थ है कि हमारे रीति-रिवाज अलग नहीं, भाव एक हैं।”
उन्होंने कहा कि भारत में भाषा, वेशभूषा, भोजन, रहन-सहन विविध हो सकता है, पर संस्कृति का कैलेंडर और भावना सबकी एक है।

पंच परिवर्तन का आह्वान
संघ द्वारा समाज में ‘पंच परिवर्तन’ की अवधारणा प्रस्तुत की गई —
- सामाजिक समरसता – सभी समाज एक-दूसरे के महापुरुषों की जयंती मनाएं।
- कुटुंब प्रबोधन – सप्ताह में एक दिन परिवार के साथ भोजन कर संवाद बढ़ाएं।
- पर्यावरण संरक्षण – सिंगल यूज़ प्लास्टिक का त्याग करें, ऊर्जा की बचत करें।
- स्वदेशी जीवन शैली – स्वदेशी उत्पादों और व्यवहार को अपनाएं।
- नागरिक कर्तव्य पालन – समाज और राष्ट्र के प्रति अपने उत्तरदायित्व निभाएं।
उन्होंने आह्वान किया कि महाराणा प्रताप, शिवाजी महाराज, गुरु नानक देव जी जैसे महापुरुषों की जयंती सभी समाज मिलकर मनाएं और सहभोज की परंपरा को जीवित रखें।
वर्तमान समय की चुनौती — सामाजिक विघटन से सावधान रहें
भट्ट जी ने चेताया कि —
“आज सोशल मीडिया के माध्यम से समाज को तोड़ने की साजिशें चल रही हैं। फेसबुक और व्हाट्सएप पर फैलाए जा रहे भ्रामक संदेशों से समाज में वैमनस्य बढ़ाया जा रहा है। ऐसे समय में हमें सजग और सक्रिय रहना आवश्यक है।”
उन्होंने सभी समाजबंधुओं से आग्रह किया कि अपने-अपने समाज में सामाजिक समरसता, कुटुंब प्रबोधन और पर्यावरण संरक्षण जैसे विषयों पर चर्चा करें और उन्हें जीवन का अंग बनाएं।
यह दोनों बैठकें केवल संवाद का माध्यम नहीं रहीं, बल्कि राष्ट्रभाव, सामाजिक एकता और सांस्कृतिक समरसता की दिशा में सुसनेर व सोयतकलां से उठे सार्थक कदम के रूप में इतिहास में अंकित हो गईं।



