'सार्थक' दृष्टिकोणसंघ शाताब्दी वर्षसम्पादकीय

“सामाजिक समरसता – सतयुग से शताब्दी वर्ष तक एक सनातन सूत्र” | जानिए कैसे श्रीराम से संघ तक चला यह समरस भारत का प्रवाह

जब समाज एक स्वर में बोलता है, तभी राष्ट्र गाता है — यही है भारत की पहचान, यही संघ का संदेश और यही ‘सार्थक’ दिशा।

✍️ लेखक : राजेश कुमरावत ‘सार्थक’


— राष्ट्र की आत्मा का स्वर

भारत केवल एक भूभाग नहीं, यह भावनाओं का महासंगीत है — जहाँ वेदों के मंत्र और लोकगीतों की धुनें एक साथ गूँजती हैं, जहाँ मंदिर की घंटी और मस्जिद की अज़ान एक ही आसमान के नीचे सामंजस्य का संदेश देती हैं।
यह विविधताओं का देश है, पर इस विविधता के भीतर जो अदृश्य सूत्र हमें जोड़ता है, वही है सामाजिक समरसता — हमारी संस्कृति की आत्मा, हमारे राष्ट्र का प्राण।

कहा गया है — “जब समाज एक स्वर में बोलता है, तभी राष्ट्र गाता है।”
सदियों से भारत ने यही स्वर साधा है —
जहाँ शबरी के बेर में प्रेम है, निषादराज गुह के हृदय में भक्ति है, और केवट के हाथों में सेवा का स्पर्श।
जहाँ महर्षि वाल्मीकि की वाणी और व्यास का ज्ञान, दोनों ही यह बताते हैं कि समाज की श्रेष्ठता जन्म से नहीं, कर्म से है।

हमारे शास्त्रों ने सिखाया — “वसुधैव कुटुम्बकम्” — सम्पूर्ण विश्व एक परिवार है।
यही विचार आगे चलकर संघ के कार्य में “समरस भारत” के रूप में प्रकट हुआ।
डॉ. हेडगेवार जी ने जिस एकात्मता की नींव रखी, बाला साहब देवरस जी ने उसे सामाजिक जीवन का सूत्र बनाया। उन्होंने कहा था —

“हम सबकी एक जाति है — भागवत के उपासक।”
और स्पष्ट कहा —
“यदि अस्पृश्यता पाप नहीं, तो फिर कुछ भी पाप नहीं।”

किसी भी राष्ट्र की शक्ति उसकी सेना या संपत्ति में नहीं, बल्कि उसकी सामाजिक एकता में होती है।
आज जब आधुनिकता के नाम पर विभाजन, उपभोक्तावाद और ‘बादशाह संस्कृति’ हमारे कुटुंब और समाज की जड़ों को कमजोर कर रहे हैं, तब भाषा, संस्कृति और परंपरा के माध्यम से समरसता का यह सूत्र फिर से जोड़ना अनिवार्य है।

आज आवश्यकता है उस सामाजिक संगीत की —
जिसमें हर जाति, हर वर्ग, हर भाषा, हर क्षेत्र, हर संस्कृति के सुर मिलकर एक ही राग गाएँ —
“भारत माता की अखंड वंदना।”


🌿 सतयुग से आरंभ हुआ समरसता का बीज

सतयुग में प्रजापति ब्रह्मा ने सृष्टि की रचना करते हुए ही मनुष्य मात्र के समान भाव को स्थापित किया —

“सर्वे भवन्तु सुखिनः, सर्वे सन्तु निरामयाः।”
यह मंत्र केवल धार्मिक प्रार्थना नहीं, बल्कि सामाजिक समरसता का प्रथम घोष था — जिसमें जाति, वर्ण, भाषा या क्षेत्र का कोई भेद नहीं था।

ऋषि-मुनियों ने युगों-युगों तक इस समरसता की लौ जलाए रखी।

  • महर्षि व्यास, जिन्होंने वेदों का संकलन किया, वे स्वयं मिश्र वर्ण के थे — यह अपने आप में सामाजिक समानता का सबसे बड़ा उदाहरण है।
  • महर्षि वाल्मीकि, जिन्होंने रामायण जैसी अमर काव्य रचना की, समाज के उस वर्ग से आए थे जिसे तत्कालीन व्यवस्था में नीचे समझा जाता था — परंतु ज्ञान और साधना ने उन्हें “आदिकवि” बना दिया।

🌸 त्रेतायुग में प्रभु श्रीराम का आदर्श

भगवान श्रीराम सामाजिक समरसता के साकार प्रतीक हैं।
उन्होंने वनवास के दौरान सबको समान दृष्टि से अपनाया —

  • निषादराज गुह को मित्र बनाया,
  • केवट को आत्मीय माना,
  • शबरी के जूठे बेर प्रेम से स्वीकार किए,
  • वानरों और भालुओं के साथ मिलकर धर्मयुद्ध लड़ा।

उनके जीवन से हमें यह संदेश मिलता है कि समरसता का अर्थ है – समाज के प्रत्येक व्यक्ति को सम्मान देना, चाहे उसका वर्ण, वर्ग या परिस्थिति कुछ भी हो।
रामराज्य इसी समरस भाव का सामाजिक रूप था — जहां न्याय, समानता और करुणा ही शासन का आधार थे।


🔥 द्वापर और कलियुग में समरसता की निरंतर ज्योति

भगवान श्रीकृष्ण ने गीता में कर्म को श्रेष्ठता का आधार बताया —

  • “चातुर्वर्ण्यं मया सृष्टं गुणकर्मविभागशः।”
  • उन्होंने स्पष्ट किया कि वर्ण व्यवस्था जन्म से नहीं, कर्म और गुण से निर्धारित होती है।

महात्मा बुद्ध, महावीर स्वामी, कबीर, गुरु नानक, संत रविदास, नामदेव, तुकाराम —
इन सभी महापुरुषों ने समाज में समानता, प्रेम और परस्पर सम्मान का संदेश दिया।
इन संतों ने समाज को “मानवता के धर्म” से जोड़ने का कार्य किया।


🕉️ संघ दृष्टि से समरसता का राष्ट्रदर्शन

डॉ. हेडगेवार जी ने संघ कार्य की नींव “एकात्मता” पर रखी।
बाला साहब देवरस जी ने समाज में व्याप्त असमानता और छुआछूत के विरोध में कहा —

“यदि अस्पृश्यता पाप नहीं, तो फिर कुछ भी पाप नहीं।”
उनकी दृष्टि में हिंदू समाज का एकीकरण ही भारत के पुनर्जागरण का आधार था।
उन्होंने कहा —
“हिंदू तू ही सांप्रदायिक सद्भाव की गारंटी है।”

संघ कार्यकर्ता समाज के प्रत्येक वर्ग में जाकर यह विश्वास जगाते हैं कि हम सब भारत माता के पुत्र हैं — हमारी संस्कृति, हमारी परंपरा और हमारा भविष्य एक है।


🌾 शताब्दी वर्ष का सामाजिक यज्ञ

संघ के शताब्दी वर्ष में सामाजिक समरसता को केंद्र में रखकर पूरे देश में सामाजिक सद्भाव बैठकों का आयोजन किया जा रहा है।
इन बैठकों में विभिन्न जाति, समाज, वर्ग और समुदायों के प्रमुख एक साथ बैठकर एक ही विषय पर चिंतन कर रहे हैं —
“हम सब एक हैं, हमारा लक्ष्य एक है – भारत माता का परम वैभव।”

यही वह सूत्र है जो विभाजनकारी प्रवृत्तियों, भाषा-भेद, क्षेत्रीय अहंकार और सांस्कृतिक दुराव को समाप्त करता है।


⚔️ वर्तमान परिदृश्य और चुनौती

आज समाज को तोड़ने वाली शक्तियाँ नए-नए रूपों में सक्रिय हैं।
मीडिया, सिनेमा और सोशल मीडिया के माध्यम से ‘बादशाह संस्कृति’ यानी उपभोक्तावाद, व्यक्तिवाद और पश्चिमी जीवनशैली का प्रचार किया जा रहा है।
यह संस्कृति मनुष्य को परिवार से, परिवार को समाज से और समाज को संस्कृति से काट देती है।
ऐसे में संघ का यह आह्वान अत्यंत सार्थक है —

“समरसता, कुटुंब प्रबंधन और सामाजिक सद्भाव ही राष्ट्र के पुनरुत्थान के तीन आधार हैं।”


🌺 समापन — समरसता ही जीवन पद्धति है

समरसता कोई नारा नहीं, यह जीवन पद्धति है।
यह तब साकार होती है जब हम दूसरों में स्वयं को और स्वयं में दूसरों को देखने लगते हैं।
जैसे श्रीराम ने शबरी में मातृत्व देखा, कृष्ण ने अर्जुन में मित्रता, और संतों ने मानवता में ईश्वर —
वैसे ही हमें समाज के हर वर्ग में “एकात्मता” का भाव जगाना होगा।

यही संघ का संदेश है।
यही राष्ट्र का प्राण है।
और यही ‘सार्थक’ दिशा है — समरस भारत की।

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