“समाज ने किया तपस्या का अभिनंदन : साधना से सम्मान तक की उजली यात्रा” योगाचार्य श्रीवास्तव को ‘आगर रत्न’”

योग शिक्षा के अग्रदूत योगाचार्य हरीश कुमार श्रीवास्तव “आगर रत्न” सम्मान से अलंकृत
“प्रेरक आरंभ”
“**“कुछ व्यक्तित्व अपनी उपलब्धियों से नहीं, बल्कि अपने मौन तप और निरंतर कर्म से सम्मान के अधिकारी बनते हैं।योगाचार्य हरीश कुमार श्रीवास्तव भी ऐसा ही एक दीपक हैं—जो स्वयं जलकर वर्षों से समाज को स्वास्थ्य, अनुशासन और संस्कार की ज्योति प्रदान करते आए हैं।जब समाज ऐसे दीपकों को पहचानता है, तब सम्मान मात्र औपचारिकता नहीं रहता—वह एक उत्सव, एक प्रेरणा बन जाता है। इस सम्मान-उत्सव की अनुभूति और प्रेरक क्षण अब पाठकों के लिए प्रस्तुत हैं।”**

जनमत जागरण @ आगर मालवा।
स्थानीय सामाजिक–सांस्कृतिक परंपराओं को सशक्त करने और योग शिक्षा को जन–साधारण तक पहुँचाने में तीन दशकों से विशिष्ट भूमिका निभा रहे योगाचार्य हरीश कुमार श्रीवास्तव को दिनांक 9 नवंबर 2025 को श्रीमती गोपीबाई जयकिशनजी माहेश्वरी परमार्थ ट्रस्ट द्वारा आयोजित भव्य समारोह में “आगर रत्न” सम्मान प्रदान किया गया।
इस गरिमामय आयोजन में जिले के प्रमुख जनप्रतिनिधियों और प्रबुद्ध समाजजनों की विशिष्ट उपस्थिति रही, जिनमें भाजपा जिला अध्यक्ष श्री ओमप्रकाश मालवीय, नगर पालिका अध्यक्ष श्री निलेश पटेल, एस.डी.एम. श्री मिलिंद ढोके, शासकीय नेहरू महाविद्यालय के पूर्व प्राचार्य श्री नंदकिशोर मालानी, तथा समाजसेवी श्री अभय जैन मुख्य रूप से उपस्थित थे। सभी अतिथियों ने योगाचार्य श्रीवास्तव की वर्षों की साधना, शिक्षा-सेवा और योग को सामाजिक परिवर्तन के उपकरण के रूप में स्थापित करने के उनके योगदान की सराहना की और उन्हें जिले की अमूल्य धरोहर बताया।

इसके पश्चात 12 नवंबर 2025 को विवेकानंद कॉलोनी के प्रबुद्ध नागरिकों ने विशेष कार्यक्रम आयोजित कर पुनः उनका सम्मान किया, जिससे यह सिद्ध हुआ कि समाज योगाचार्य श्रीवास्तव को केवल एक प्रशिक्षक के रूप में नहीं, बल्कि स्वास्थ्य, संस्कार और योग-चेतना के वाहक के रूप में देखता है।
“व्यक्तित्व और कार्य—दोनों का सार”
योगाचार्य श्रीवास्तव ने योग शिक्षा, योगासन प्रशिक्षण, विद्यालयों के लिए योग पाठ्यक्रम निर्माण, एवं राज्य–राष्ट्रीय प्रतियोगिताओं में निर्णायक के रूप में अपना महत्त्वपूर्ण योगदान दिया है। भारतीय भाषाओं, योग, राजनीति, आयुर्वेद एवं संस्कृति के बहुआयामी अध्ययन के आधार पर उन्होंने योग को स्वास्थ्य ही नहीं बल्कि चरित्र–निर्माण के विज्ञान के रूप में स्थापित किया है।

🟦 सार्थक– चिंतन
योगाचार्य हरीश कुमार श्रीवास्तव का सम्मान केवल व्यक्तिगत उपलब्धि नहीं, बल्कि उस भारतीय चिंतन का सम्मान है जो योग को “व्यायाम” नहीं, बल्कि जीवन का संतुलन, अनुशासन और आत्म–शुद्धि मानता है।
आगर मालवा जैसे छोटे जिले से निकलकर योग शिक्षा को राष्ट्रीय स्तर तक प्रभावी ढंग से पहुँचाना स्वयं में एक यात्रा है—और इस यात्रा का यह सम्मानित पड़ाव समाज को यह संदेश देता है कि साधना कभी व्यर्थ नहीं जाती; समय आने पर वही साधना समाज का आभार बनकर लौटती है।



