सुसनेर सिविल अस्पताल में बड़ा खुलासा: डेंटल यूनिट चार साल से ठप: डॉक्टर मौजूद, मशीनें मौजूद… पर सिस्टम ‘गायब’

🟧 सुसनेर सिविल अस्पताल की विफल व्यवस्था पर जनमत जागरण की विशेष रिपोर्ट
करोड़ों की इमारत, करोड़ों के उपकरण… पर ‘रूई-गॉज़’ तक नहीं!**
जनमत जागरण @ आगर–मालवा
सुसनेर का सिविल अस्पताल आज ऐसा प्रतीत होता है मानो स्वास्थ्य व्यवस्था ने खुद पर ही एक बड़ा तंज कस दिया हो।
9 करोड़ की इमारत, चमकते उपकरण और दो-दो दंत चिकित्सक—सब कुछ वैभव जैसा, पर इलाज के लिए जरूरी सामग्री नदारद।
करोड़ों की सजावट है, पर उपचार की बुनियाद ही गायब; जिम्मेदारी प्रशासन और जनप्रतिनिधियों दोनों की धुंध में खो गई है।
और अंत में यह पूरा दृश्य उसी पुरानी कहावत को जीवित कर देता है—
“नंगा नहाए क्या, और निचोड़े क्या!”

🟩 हकीकत : शानदार अस्पताल… पर काम रोकने वाला कारण—“सामग्री उपलब्ध नहीं”
सुसनेर का यह सिविल अस्पताल प्रदेश की स्वास्थ्य नीतियों और स्थानीय नेतृत्व दोनों पर गहरा प्रश्नचिह्न लगा रहा है।
कागज़ों में यह डेंटल यूनिट पूरी तरह “अपग्रेडेड” है—
- शानदार भवन
- आधुनिक मशीनें
- दो BDS डॉक्टर
- पूरी यूनिट स्वीकृत
लेकिन ज़मीनी सच्चाई है—डेंटल सामग्री उपलब्ध ही नहीं कराई गई।
सरकार ने इमारत खड़ी कर दी, मशीनें लगा दीं, डॉक्टर तैनात कर दिए—
पर उन मशीनों को चलाने और डॉक्टरों को इलाज करने लायक मूलभूत सामग्री ही नहीं भेजी।
नतीजा—
मरीज आते हैं…
डॉक्टर मौजूद हैं…
मशीनें बंद पड़ी हैं…
और इलाज सिर्फ “दवाई लिखकर दर्द कम करने” तक सीमित है।
🟥 जनमत जागरण ने पूछा—“इलाज क्यों ठप?”
जिला स्वास्थ्य अधिकारी का जवाब—“सामग्री नहीं आई”**
जनमत जागरण ने जब जिला स्वास्थ्य अधिकारी डॉ. दिनेश देहलवार से सवाल किया:
“दो डेंटिस्ट, मशीनें, उपकरण—सब है…
फिर इलाज क्यों नहीं हो रहा?”
तो उन्होंने स्पष्ट कहा—
“हाँ, सामग्री की कमी है। भोपाल से सप्लाई नहीं आई है।
जैसे ही आएगी, हम भेज देंगे।”
यानी जिम्मेदारी स्वीकार—
पर समाधान “आएगा–तब भेजेंगे” की सरकारी शैली में फंसा हुआ।
🟥 अस्पताल की डेंटिस्ट डॉ. सीमा पाटीदार का बयान—सच्चाई का सबसे कड़वा हिस्सा
“इलाज तो कर देंगे, लेकिन हमारे पास सामग्री ही नहीं है…
फिलहाल दवाई लिख देते हैं, इससे थोड़ा आराम मिल जाएगा।”
यह बयान बताता है कि करोड़ों की व्यवस्था होने के बावजूद
दंत चिकित्सा सिर्फ ‘दर्द कम करने की सलाह’ तक सीमित रह गई है।
🟦 चार साल से डेंटल यूनिट बदहाली में—डॉक्टर आते हैं, टिक नहीं पाते
डेंटल यूनिट चार साल पहले स्वीकृत हुई।
तब से—
- दो BDS डॉक्टर आए
- संसाधन न मिलने पर चले गए
- अब दो डॉक्टर फिर तैनात
- लेकिन सामग्री के अभाव में “औपचारिकता” ही कर पा रहे हैं
चार साल से यह यूनिट ठीक से संचालित ही नहीं हो सकी।
🟨 नई बिल्डिंग में ‘हाई वोल्टेज’ का संकट—मशीनें शो-पीस बन गईं
9 करोड़ की नई बिल्डिंग में तीन प्रमुख समस्याएँ—
- हाई वोल्टेज
- एक्स-रे मशीन काम नहीं करती
- डेंटल एक्स-रे बंद
- महंगी मशीनें शो-पीस की तरह रखी हैं
अस्पताल के तकनीकी संसाधन ही असुरक्षित हैं।
🟪 बजट—“नाम मात्र”, जरूरत—“सबसे महंगा”
स्वास्थ्य विभाग के सूत्रों के अनुसार—
- डेंटल यूनिट का बजट बेहद कम
- जबकि डेंटल सामग्री सबसे महंगी
- बजट आया तो है, पर विभाग को आवंटित नहीं हुआ
परिणाम—
यूनिट ठप, और मरीज परेशान।
🟥 सवाल जनता का… जवाब किसके पास?
- डॉक्टर, उपकरण, मशीनें—सब होने के बाद भी सामग्री आपूर्ति क्यों नहीं?
- जिन डॉक्टरों को इलाज नहीं करने दिया जा रहा, उन्हें तैनात क्यों किया गया?
- क्या यह करोड़ों रुपये की सार्वजनिक बर्बादी नहीं?
- क्या स्वास्थ्य विभाग केवल “बिल्डिंग बना देना” ही अपनी उपलब्धि मानता है?
🟩 निष्कर्ष : यह कमी नहीं—पूरे स्वास्थ्य तंत्र की ‘प्रबंधन विफलता’ है
सुसनेर सिविल अस्पताल का यह संकट
यह बताता है कि—
इमारतें बनाई जा सकती हैं, मशीनें खरीदी जा सकती हैं,
लेकिन ज़िम्मेदारी और प्रबंधन खरीदा नहीं जा सकता।
और इसलिए—
पूरा अस्पताल आज उसी कहावत की तस्वीर बन बैठा है—



