पगडंडी पर जिंदगी, 78 साल बाद भी सड़क से वंचित, फाइलों में विकास: अमरकोट पंचायत की पीड़ा अब जनपद चुनाव में बनेगी मुद्दा

आगर मालवा जिले की अमरकोट पंचायत में 2.5 किमी सड़क आज तक नहीं बनी, सांसद-विधायक से लेकर कलेक्टर जनसुनवाई तक आवेदन, फिर भी समस्या जस की तस
पगडंडी पर अटका लोकतंत्र : अमरकोट की चुप्पी अब वोट से बोलेगी?

78 साल, 16 विधानसभा, दर्जनों वादे… फिर भी 2.5 किमी सड़क नहीं — अब जनपद चुनाव से पहले उबाल पर गांव
जनमत जागरण | सोयतकलां
एक्सक्लूसिव आन द स्पाट ग्राउंड रिपोर्ट
यह सिर्फ एक पंचायत की कहानी नहीं है।
यह उस लोकतंत्र की कहानी है, जो हर पांच साल में वोट मांगने तो पगडंडी पर पहुंच जाता है,
लेकिन विकास की गाड़ी कभी स्टार्ट नहीं करता।
आगर जिले की अमरकोट पंचायत — जहां आज़ादी के 78 साल बाद भी सड़क नहीं पहुंची,
अब 28 दिसंबर को होने वाले जिला–जनपद सदस्य चुनाव से पहले
एक खामोश लेकिन सख्त फैसला लेने की तैयारी में है।
चार गांव — अमरकोट, सरदारपुर, त्रिलोकपुर और धतुरिया —
ढाई हजार से अधिक आबादी,
लेकिन आज भी पगडंडियों के सहारे जिंदगी ढो रहे हैं।
यह वही पंचायत है,
जहां बरसात में मरीज रास्ते में दम तोड़ देते हैं,
जहां अधिकारी फाइलों में सड़क बनाते हैं,
और ग्रामीण कंधों पर भरोसा ढोते हैं।
📝 ग्रामीणों की सामूहिक मांग, रैली निकाली :
ग्राम पंचायत अमरकोट एवं ग्राम सरदारपुरा के जिम्मेदार पदाधिकारियों, सामाजिक प्रतिनिधियों और पटेल समुदाय के नेतृत्व में ग्रामीणों ने एक स्वर में सड़क निर्माण की मांग उठाई है। ग्राम अमरकोट से पटेल कैलाश विश्वकर्मा, रामनारायण विश्वकर्मा, मांगीलाल सोलंकी (सरपंच), अशोक तिवारी, महेश चौधरी, दानुसिंह (पूर्व सरपंच), नेमिचंद जैन, अनिल जैन, बुद्धीप्रकाश जैन, दुर्रान खां (पूर्व सरपंच), कैलाश राठौर, हरिराम राठौर, सीताराम गुर्जर, कांशीराम गुर्जर (पार्षद), प्रभुलाल गुर्जर, रामप्रसाद गुर्जर, हबीब खां (पार्षद), इकबाल खां (उप सरपंच), शंकर शर्मा, मांगीलाल मेघवाल, रामलाल मेघवाल, अमरलाल मेघवाल, रामकिशन मेहतर, गणेशलाल मेहतर सहित समस्त ग्रामवासी शामिल हैं। वहीं ग्राम सरदारपुरा से गोवर्धन सिंह पटेल, प्रह्लाद सिंह, मदन सिंह, नेनसिंह (पार्षद), कनिराम, जितेंद्र सिंह (बूथ अध्यक्ष), भाजपा गोकुल सिंह, नारायण सिंह, चंद्रसिंह, रामनारायण विश्वकर्मा, अमरलाल मेघवाल (पूर्व उपसरपंच), भंवरलाल मेघवाल एवं कन्हैयालाल (पार्षद) ने भी समर्थन व्यक्त किया। सभी ग्रामीणों ने “सड़क नहीं तो वोट नहीं” के बैनर तले एकजुट होकर रैली निकाली और स्पष्ट किया कि जब तक 2.5 किलोमीटर सड़क का ठोस निर्माण कार्य शुरू नहीं होता, तब तक उनका यह लोकतांत्रिक संघर्ष जारी रहेगा।
जहां नेटवर्क है, अस्पताल है… पर सड़क नहीं
विडंबना देखिए —
यह गांव 4G नेटवर्क से जुड़ा है,
उप-स्वास्थ्य केंद्र और आयुर्वेदिक चिकित्सालय भी है,
लेकिन जिस सड़क से डॉक्टर पहुंचे —
वह सड़क आज तक नहीं बनी।
ग्रामीणों के लिए विकास का मतलब अब भाषण नहीं,
बल्कि पगडंडी से मुक्ति है।

वादों का इतिहास लंबा, सड़क का सफर शून्य
2023 में ग्रामीणों ने नई सरकार से उम्मीद की थी।
2025 में भी वही उम्मीद, वही निराशा।
हर चुनाव में वही दृश्य —
▪️ अधिकारी आते हैं
▪️ आश्वासन देते हैं
▪️ और जाते-जाते कहते हैं —
“देखते हैं… प्रस्ताव भेजिए…”
अधिकारीयों के टालमटोल बयान कहते हैं —
“मुझे नहीं पता सड़क किस विभाग की है ”
सिर्फ बयान नहीं,
बल्कि प्रशासनिक संवेदनहीनता का प्रमाण है।
जब गांव के लोग कई बार प्रस्ताव भेज चुके हैं,
तो फिर सवाल उठता है —
फाइलें घूम रही हैं या जिम्मेदारी?
सांसद–विधायक से लेकर कलेक्टर तक गुहार, फिर भी समाधान नहीं
ग्रामीणों का कहना है कि सड़क निर्माण की समस्या को लेकर
▪️ सांसद रोडमल जी नागर,
▪️ पूर्व विधायक राणा विक्रम सिंह,
▪️ तथा कलेक्टर जनसुनवाई, जिला आगर–मालवा
के समक्ष आवेदन और ज्ञापनों के माध्यम से कई बार अवगत कराया गया,
लेकिन इतने स्तरों पर बात पहुंचने के बावजूद
जमीनी हकीकत आज भी जस की तस बनी हुई है।
ग्रामीणों में इसी बात को लेकर सबसे अधिक पीड़ा और आक्रोश है
कि जब जनप्रतिनिधियों और प्रशासनिक मंचों तक आवाज पहुंच चुकी है,
तो फिर सड़क क्यों नहीं?
‘यह हमारे अधिकार क्षेत्र में नहीं’ — जिम्मेदारी किसकी?
इस बीच जनपद अध्यक्ष प्रतिनिधि राजपाल सिंह सिसौदिया का कहना है कि
“उक्त सड़क निर्माण कार्य जनपद पंचायत के अंतर्गत नहीं आता।”
यह बयान एक नई बहस को जन्म देता है —
अगर सड़क जनपद पंचायत के अंतर्गत नहीं आती,
तो फिर जिम्मेदार विभाग कौन है?
और 78 वर्षों से वह विभाग क्या कर रहा है?
ग्रामीणों का कहना है कि
यही विभागीय भ्रम और टालमटोल
उनकी समस्या को सबसे ज्यादा लंबा खींच रहा है।
लॉलीपॉप की राजनीति और भरोसे की हार
पिछले चुनावों में जब ग्रामीणों ने
मतदान बहिष्कार की बात कही थी,
तो प्रशासन दौड़ पड़ा था।
गाड़ी आई, आश्वासन उतरा,
लेकिन विकास की चाबी आज तक नहीं घूमी।
ग्रामीणों का साफ कहना है —
“लॉलीपॉप तो मिला, पर सड़क नहीं।”
इतिहास भी रो रहा है, भविष्य भी

अमरकोट सिर्फ एक गांव नहीं —
यहां पुरातात्विक किला,
दिगंबर जैन तीर्थ नेमिधाम,
और समृद्ध ऐतिहासिक विरासत है।
कभी इसे हेरिटेज होटल बनाने की बात हुई,
पर वादों की उम्र
अधिकारी के कार्यकाल से आगे नहीं बढ़ी।
आज किला भी पूछ रहा है —
“क्या विकास सिर्फ भाषणों के लिए होता है?”

जर्जर पुल, टूटता भरोसा और पलायन
गांव का एकमात्र पुल
हर बरसात में चेतावनी देता है।
ग्रामीण कहते हैं —
“जब पुल गिरेगा, तब शायद फाइल खुलेगी।”
इसी बदहाली ने
कई परिवारों को गांव छोड़ने पर मजबूर कर दिया।

न सड़क,
न रोजगार,
न भरोसा —
तो लोग पलायन ही चुनेंगे।
अब सवाल सीधा है, और फैसला भी
28 दिसंबर को जनपद चुनाव हैं।
गांवों में चर्चा है —
“वोट देंगे या सवाल?”
अब अमरकोट पूछ रहा है —
▪️ क्या विकास सिर्फ चुनावी मौसम की फसल है?
▪️ क्या 2.5 किमी सड़क किसी विभाग की जिम्मेदारी नहीं?
▪️ क्या वोट डालना मजबूरी है, अधिकार नहीं?
अगर इस बार भी आवाज अनसुनी रही,
तो यह सिर्फ चुनाव बहिष्कार नहीं होगा,
यह प्रशासनिक असफलता पर जनादेश होगा।
पगडंडी पर खड़ा अमरकोट अब इंतजार नहीं करेगा

यह खबर चेतावनी है —
और मौका भी।
क्योंकि
जब गांव चुप होता है, तो सहता है,
और जब गांव बोलता है —
तो इतिहास बदलता है।



