श्री हनुमंत कथा में बड़ा संदेश : 25 दिसंबर पर उठा बड़ा सांस्कृतिक सवाल , सनातन संस्कृति बचाने का आह्वान –श्री दुबे ने समरसता, कुटुंब प्रबोधन पर दिया दिशा-बोध

विचार शुद्ध होंगे तभी संस्कृति बचेगी, 25 दिसंबर को विधर्मी उत्सव नहीं मनाने का आह्वान
हनुमंत कथा में पं. राधेश्याम जी दुबे का स्पष्ट संदेश – परिवार, समरसता और आत्म-अनुशासन ही सनातन की शक्ति
जनमत जागरण @ सोयतकलां
“विचार यदि पवित्र हैं तो वही विचार संसार का निर्माण करते हैं, और यदि दूषित हों तो वही विचार समाज को भ्रम की ओर ले जाते हैं”—इस मूल मंत्र के साथ श्री हनुमंत कथा के माध्यम से पं. राधेश्याम जी दुबे ने नगरवासियों को सनातन संस्कृति, सामाजिक समरसता और कुटुंब प्रबोधन की गहन शिक्षा दी।
नगर में नगर परिषद के पीछे निजी विद्यालय प्रांगण में श्री हनुमंत कथा संकल्प समिति द्वारा आयोजित 21 दिसंबर से प्रारंभ हुई श्री हनुमंत कथा के प्रथम एवं द्वितीय दिवस अवसर पर पं. दुबे ने 25 दिसंबर को लेकर स्पष्ट विचार रखते हुए कहा कि हिंदू समाज के पास वर्ष के 365 दिनों में असंख्य पर्व, परंपराएं और उत्सव हैं, ऐसे में दुसरे धर्म के उत्सवों का अनुकरण करना हमारी सांस्कृतिक चेतना को कमजोर करता है। इसे रोकना और अपनी संस्कृति को बचाना आज का सबसे बड़ा दायित्व है।
हनुमान चरित्र: घर, परिवार और समाज का विज्ञान

कथावाचक ने हनुमान जी के चरित्र को केवल भक्ति तक सीमित न रखते हुए उसे घर-परिवार, बुजुर्ग सम्मान और सामाजिक संतुलन का विज्ञान बताया। उन्होंने कहा कि उम्र बढ़ने के साथ बुजुर्गों का ध्यान रखना, बड़ों का दिल न दुखाना और परिवार को संभालकर रखना ही वास्तविक धर्म है।
निषादराज और प्रभु श्रीराम के प्रसंग का उल्लेख करते हुए उन्होंने कहा—
“जो राम का हो गया, उसे नीचे नहीं बैठाया जाता। प्रभु राम ने निषादराज को अपने पास बिठाकर यह सिद्ध किया कि समरसता ही रामत्व है।”
अष्टधा प्रकृति, पंचतत्व और अंतःशक्ति का जागरण

कथा के दौरान पं. दुबे ने अष्टधा प्रकृति और पंचतत्व पर विस्तृत चर्चा करते हुए बताया कि मनुष्य शरीर केवल देह नहीं, बल्कि शक्तिकेंद्रों का मंदिर है। उन्होंने कहा कि कलियुग में न मंत्र, न यंत्र, न तंत्र—यदि कुछ प्रभावी है तो वह हनुमान कृपा और आंतरिक चक्रों का जागरण है।
उन्होंने स्पष्ट किया कि हमारे भीतर आठ चक्र हैं, जो जागृत होने पर मनुष्य को आत्मबल, विवेक और सेवा की शक्ति प्रदान करते हैं।
जटायु से आत्मा का संबंध और आत्म-अनुशासन
प्रभु श्रीराम द्वारा जटायु को तारने के प्रसंग से यह संदेश दिया गया कि जीवन की पूर्व स्थितियां नहीं, बल्कि अंतिम चेतना और समर्पण ही मोक्ष का द्वार खोलती हैं।
“जिसने मान लिया कि राम हमारे हैं और हम राम के हैं, वह तार दिया गया।”
हनुमान जी को शंकर सुमन और केसरी नंदन बताते हुए उन्होंने कहा कि जीवन में तीन रत्न आवश्यक हैं—प्रताप, जग-बंधन और सेवा। चौथा रत्न है आत्म-अनुशासन, जिसके बिना मनुष्य अकेला और दिशाहीन हो जाता है।
घर में अयोध्या बनाओ, राम स्वयं आएंगे

पं. दुबे ने कहा कि यदि मन को शुद्ध कर लिया जाए तो घर स्वयं अयोध्या बन जाता है।
“सबसे पहले घर में गणपति का पूजन करें, फिर द्वार पर प्रतीक्षा कर रहे हनुमान जी का स्मरण करें—तभी जीवन का हर प्रयास प्रभु का प्रसाद बन जाता है।”
हनुमान भक्ति से सेवा और कर्तव्य
कथा का सार बताते हुए उन्होंने कहा कि हनुमान जी की शक्ति का वास्तविक रूप सेवा है। भक्ति का अर्थ पलायन नहीं, बल्कि कर्तव्य पालन है। समाज में रहते हुए निष्ठा, अनुशासन और मानवता के साथ जीवन जीना ही हनुमानत्व है।
- 21 दिसंबर से 25 दिसंबर तक चली इस श्री हनुमंत कथा रूपी यज्ञ में बड़ी संख्या में नगरवासियों ने भाग लेकर आध्यात्मिक, सामाजिक और सांस्कृतिक चेतना का लाभ लिया। कथावाचक ने सभी से आग्रह किया कि इस यज्ञ में मिली सीख को जीवन में उतारें और सनातन संस्कृति के संरक्षण में सहभागी बनें।
25 दिसंबर और सांस्कृतिक आत्मबोध: उत्सव से पहले विचार आवश्यक हैं
सार्थक दृष्टिकोण : हनुमंत कथा के दौरान पं. राधेश्याम जी दुबे ने 25 दिसंबर को लेकर कोई विरोध नहीं, बल्कि आत्मचिंतन का प्रश्न समाज के सामने रखा। उन्होंने कहा कि जब हिंदू समाज के पास वर्ष के 365 दिनों में असंख्य पर्व, परंपराएं और सांस्कृतिक उत्सव हैं, तब ऐसी तिथियों को उत्सव रूप में अपनाना क्यों आवश्यक हो जाता है, जिनका न तो हमारे शास्त्रों में उल्लेख है और न ही जो हमारी संस्कृति को स्वीकार करती हैं। कथा में यह स्पष्ट किया गया कि संस्कृति केवल उत्सव मनाने से नहीं, बल्कि विचारों की शुद्धता से जीवित रहती है। यदि हमारे विचार ही यह तय न कर पाएं कि हमें किस परंपरा को आगे बढ़ाना है, तो आने वाली पीढ़ियां केवल अनुकरण करेंगी, चेतना नहीं। हनुमान जी के चरित्र के माध्यम से यह संदेश दिया गया कि जैसे वे राम से जुड़े रहकर सेवा और कर्तव्य का आदर्श बने, वैसे ही समाज को भी अपनी जड़ों से जुड़कर आत्मसम्मान के साथ सांस्कृतिक निर्णय लेने होंगे। यह आग्रह किसी समुदाय के विरोध का नहीं, बल्कि सनातन आत्मबोध को बचाने और कुटुंब व समाज को वैचारिक रूप से सुदृढ़ करने का है।



