आपके लेखसम-सामयिकस्पेशल रिपोर्ट
अरावली पर ‘खनन छूट’ का भ्रम क्यों फैलाया जा रहा है? सुप्रीम कोर्ट, सरकार और तथ्यों की पूरी सच्चाई

अरावली पर ‘खनन छूट’ का भ्रम क्यों फैलाया जा रहा है? सुप्रीम कोर्ट, सरकार और तथ्यों की पूरी सच्चाई
पर्यावरण, न्यायपालिका और सूचना-युद्ध के बीच अरावली की असली तस्वीर
✍️ लेखक— कैलाश चंद्र (लेखक | आरएसएस के प्रचार विभाग के क्षेत्र प्रचारक)
✍️ अरावली केवल पहाड़ियों की श्रृंखला नहीं, बल्कि उत्तर भारत की पारिस्थितिक सुरक्षा की रीढ़ है। दिल्ली-NCR की हवा, भूजल स्तर, जलवायु संतुलन और मरुस्थलीकरण पर नियंत्रण—इन सबका सीधा संबंध अरावली से है। यही कारण है कि इस क्षेत्र में खनन और निर्माण गतिविधियों पर दशकों से न्यायिक व प्रशासनिक नियंत्रण लागू हैं।
हाल के दिनों में सोशल मीडिया और कुछ यूट्यूब चैनलों पर यह दावा तेजी से फैलाया गया कि सरकार ने अरावली में खनन के लिए “ढील” दे दी है और सुप्रीम कोर्ट ने संरक्षण की परिभाषा को कमजोर कर दिया है। इस भ्रम के चलते केंद्रीय पर्यावरण मंत्री भूपेंद्र यादव को स्वयं सामने आकर स्पष्टीकरण देना पड़ा।
सवाल यह है—
क्या वाकई अरावली में खनन के द्वार खोल दिए गए हैं?
या यह एक सूचना-युद्ध के तहत गढ़ा गया मिथ्या नैरेटिव है?
इस लेख में अरावली से जुड़े भौगोलिक तथ्य, सुप्रीम कोर्ट के आदेश और सरकार की नीति को आधार बनाकर पूरे विषय की तथ्यात्मक पड़ताल की गई है।
1️⃣ अरावली क्या है और क्यों महत्वपूर्ण है?
अरावली भारत की सबसे प्राचीन पर्वत श्रृंखलाओं में से एक है, जो दिल्ली, हरियाणा, राजस्थान और गुजरात के 39 जिलों तक फैली हुई है। यह—
थार मरुस्थल के विस्तार को रोकती है
भूजल रिचार्ज में सहायक है
दिल्ली-NCR की वायु गुणवत्ता और तापमान संतुलन बनाए रखती है
पारिस्थितिक विविधता का संरक्षण करती है
इसी संवेदनशीलता के कारण अरावली क्षेत्र में खनन और बड़े निर्माण कार्य लंबे समय से प्रतिबंध और नियंत्रण के दायरे में रहे हैं।
2️⃣ सुप्रीम कोर्ट के पुराने आदेश: स्थायी और सख्त प्रतिबंध
1980 के दशक से अरावली में अवैध खनन को लेकर जनहित याचिकाएं दायर होती रहीं। इसके परिणामस्वरूप सुप्रीम कोर्ट ने कई ऐतिहासिक आदेश दिए—
🔹 2009 का अहम आदेश
हरियाणा के फरीदाबाद, गुरुग्राम और नूंह जिलों में अरावली पहाड़ियों पर पूर्ण खनन प्रतिबंध लगाया गया।
यह प्रतिबंध आज भी प्रभावी है।
🔹 बाद के निर्देश
वैज्ञानिक मैपिंग और पर्यावरण प्रभाव अध्ययन (EIA) के बिना नई खनन अनुमति नहीं
पहले सर्वे, फिर संरक्षण योजना, उसके बाद ही किसी प्रकार की अनुमति संभव
3️⃣ वर्ष 2025 का आदेश: विवाद और वास्तविकता
2025 में सुप्रीम कोर्ट ने सभी राज्यों से अरावली की एक समान वैज्ञानिक परिभाषा तय करने को कहा और केंद्र सरकार द्वारा प्रस्तुत वैज्ञानिक रिपोर्ट को स्वीकार किया।
यहीं से भ्रम फैलाया गया कि अब केवल “100 मीटर” तक ही अरावली सुरक्षित रहेगी और नीचे खनन की छूट मिल जाएगी।
❗ सच्चाई क्या है?
100 मीटर नियम पहाड़ी की चोटी से नहीं, बल्कि उसके बेस स्ट्रक्चर से लागू होता है।
यदि पहाड़ी की चट्टान जमीन के भीतर 20 मीटर तक फैली है, तो संरक्षण की गणना वहीं से होगी।
➡️ यानी पूरी चट्टान, ढलान और संरचना संरक्षित मानी जाएगी।
➡️ खनन की छूट नहीं, बल्कि वैज्ञानिक स्पष्टता आई है।
4️⃣ संरक्षित क्षेत्र कितना है?
सरकारी आंकड़ों के अनुसार—
अरावली क्षेत्र: 1.44 से 1.47 लाख वर्ग किलोमीटर
इसमें से लगभग 90% क्षेत्र संरक्षित श्रेणी में आता है
केवल 0.2% से 2% क्षेत्र ही सैद्धांतिक रूप से संभावित है
वह भी तभी जब—
विस्तृत माइनिंग प्लान हो
पर्यावरणीय मंजूरी मिले
ICFRE जैसी उच्च स्तरीय संस्थाओं की अनुमति प्राप्त हो
➡️ व्यावहारिक रूप से खनन लगभग नगण्य रह जाता है।
5️⃣ दिल्ली और NCR: ज़ीरो टॉलरेंस नीति
दिल्ली की पूरी अरावली में खनन पूर्ण प्रतिबंधित है
भविष्य में भी किसी प्रकार की माइनिंग अनुमति नहीं
NCR में जहां संदेह है, वहां भूमि को अरावली ही माना जाएगा
जब तक वैज्ञानिक सर्वे विपरीत प्रमाण न दे
➡️ यह नीति संरक्षण को और अधिक कठोर बनाती है।
6️⃣ क्या हर साल नई रोक लगती है?
यह एक आम भ्रांति है।
वास्तविकता यह है कि—
सुप्रीम कोर्ट के आदेश दीर्घकालिक होते हैं
हर साल नई रोक नहीं, बल्कि पुराने आदेश लागू रहते हैं
केवल कानूनी रूप से स्वीकृत पुरानी खदानें ही सख्त नियंत्रण में चल सकती हैं
राज्य-वार विवरण के लिए केवल आधिकारिक नोटिफिकेशन और माइनिंग मैप ही मान्य दस्तावेज होते हैं।
7️⃣ संरक्षण और ‘ग्रीन अरावली’ पहल
सरकार द्वारा “ग्रीन अरावली” अभियान चलाया जा रहा है—
39 जिलों में DFO स्तर की बैठकें
स्थानीय प्रजातियों की नर्सरी
वनीकरण और जल संरक्षण परियोजनाएं
20 से अधिक रिज़र्व फॉरेस्ट, राष्ट्रीय उद्यान और संरक्षित क्षेत्र यथावत सुरक्षित
🔎 सूचना-युद्ध और मिथ्या फ्रेमिंग
आज सूचना स्वयं एक युद्ध का हथियार बन चुकी है।
अरावली को लेकर फैलाई गई भ्रांतियां Framing by Omission, भावनात्मक उकसावे और आधी-अधूरी जानकारी का उदाहरण हैं।
कुछ यूट्यूबरों और सोशल मीडिया इन्फ्लुएंसर्स ने 100 मीटर नियम को तोड़-मरोड़कर यह नैरेटिव गढ़ा कि बड़े पैमाने पर खनन की छूट मिल गई है, जबकि तथ्य इसके विपरीत हैं।
➡️ सत्य यह है कि सुप्रीम कोर्ट और सरकार दोनों का रुख संरक्षण-उन्मुख और सख्त है।
अरावली संरक्षण पर “ढील” की खबरें भ्रामक हैं।
नई वैज्ञानिक परिभाषा से संरक्षण कमजोर नहीं, बल्कि अधिक स्पष्ट और मजबूत हुआ है।
दिल्ली-NCR सहित अरावली की अधिकांश भूमि पर खनन पूर्ण प्रतिबंधित है और भविष्य में भी रहेगा।
अरावली केवल पर्यावरण का विषय नहीं, बल्कि भारत की पारिस्थितिक सुरक्षा और सामूहिक उत्तरदायित्व का प्रश्न है।
📧 Kailashchander74@gmail.com



