श्री हनुमान चरित्र में कुटुंब, कर्तव्य और संस्कृति का समाधान, दुबे जी ने श्री हनुमंत कथा में दिखाया पंच परिवर्तन का मार्ग

श्री हनुमंत कथा के तृतीय दिवस पर हनुमान चरित्र के माध्यम से ‘पंच परिवर्तन’ का शास्त्रोंक्त संदेश
जनमत जागरण @सोयतकलां
नगर परिषद प्रांगण स्थित महादेव मंदिर के समीप श्री हनुमंत कथा संकल्प समिति द्वारा आयोजित श्री हनुमंत कथा के तृतीय दिवस पर कथा व्यास पंडित राधेश्याम जी दुबे ने हनुमान चरित्र के माध्यम से न केवल भक्ति और सेवा का भाव जगाया, बल्कि राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ द्वारा प्रतिपादित ‘पंच परिवर्तन’ को भी जीवन व्यवहार से जोड़ते हुए समाज को दिशा दी।
तृतीय दिवस की कथा के यजमान कमलेश शर्मा द्वारा विधिवत पोथी पूजन के पश्चात कथा प्रवाह प्रारंभ हुआ।
कथा— आत्मा को परमात्मा से जोड़ने के साथ समाज को भी जोड़ती है
पं. दुबे ने कहा कि कथा केवल धार्मिक अनुष्ठान नहीं, बल्कि व्यक्ति, परिवार और राष्ट्र को जोड़ने की प्रक्रिया है। आज व्यक्ति “मैं” और “मेरा” में उलझकर कुटुंब और समाज से कटता जा रहा है। हनुमान चरित्र इस विघटन का समाधान प्रस्तुत करता है।
हनुमान चरित्र में संघ के पंच परिवर्तन
1️⃣ कुटुंब प्रबोधन — सेवा से परिवार का विस्तार
कथावाचक ने कहा कि हनुमान जी ने सेवा के बल पर श्रीराम के पूरे कुटुंब को अपना बना लिया।
उन्होंने स्पष्ट किया—
“किसी को अपना बनाना अवगुण है, प्रभु का हो जाना गुण है।”
आज परिवार टूट रहे हैं क्योंकि स्वार्थ बढ़ रहा है। हनुमान जी सिखाते हैं कि सेवा, त्याग और अपनत्व से ही कुटुंब सुरक्षित रहता है। यही कुटुंब प्रबोधन है।
उन्होंने प्रश्नात्मक शैली में श्रोताओं को झकझोरा। —क्या कभी आपने बुद्धिमान को गणपति समझा?क्या कभी सेवा करने वाले को हनुमान समझा?

हनुमान चरित्र में विद्या, विनय और विवेक तीनों का समन्वय है—“विद्या ददाति विनयं, विनयाद् याति पात्रताम्।”
2️⃣ सामाजिक समरसता — विभीषण से गले लगना
लंका प्रसंग के माध्यम से पं. दुबे ने समरसता का संदेश देते हुए कहा कि
विभीषण रावण का भाई होते हुए भी धर्म के पक्ष में खड़ा हुआ।
हनुमान जी ने जाति, कुल, पक्ष नहीं देखा— धर्म देखा।
आज समाज जाति, वर्ग और मत में बंट रहा है, जबकि हनुमान चरित्र सिखाता है—
सेवा करने वाला ही सच्चा अपना होता है।
3️⃣ पर्यावरण संरक्षण — सिंदूर से विज्ञान तक
हनुमान जी को सिंदूर अर्पण करने की परंपरा को वैज्ञानिक बताते हुए पं. दुबे ने कहा कि हमारे प्रतीक और परंपराएं प्रकृति-सम्मत विज्ञान पर आधारित हैं।
उन्होंने चिंता जताई कि आधुनिकता के नाम पर भारतीय पर्यावरणीय दृष्टि को नष्ट किया जा रहा है।
हनुमान जी का वानर स्वरूप, वन-जीवन, पर्वत और प्रकृति से जुड़ाव पर्यावरण संरक्षण का सांस्कृतिक संदेश देता है।
4️⃣ नागरिक कर्तव्य — रामकाज सर्वोपरि
“विद्या दान गुणी अति चातुर, राम काज करिबे को आतुर।”
पं. दुबे ने कहा कि हनुमान जी का जीवन नागरिक कर्तव्य का आदर्श है।
उन्होंने व्यक्तिगत सुख-दुख से ऊपर उठकर रामकाज अर्थात राष्ट्रधर्म को सर्वोच्च माना।
आज अधिकारों की बात अधिक होती है, कर्तव्यों की नहीं।
हनुमान चरित्र सिखाता है—
पहले कर्तव्य, फिर अधिकार।
5️⃣ स्वदेशी और सांस्कृतिक चेतना
कथावाचक ने कहा कि आज नया खोजने के नाम पर अपनी भाषा, भेष, भजन और भारतीय विज्ञान को छोड़ा जा रहा है।
हनुमान जी की भक्ति, शक्ति और तपस्या स्वदेशी संस्कृति का प्रतीक है।
उन्होंने स्पष्ट शब्दों में कहा—
“जो भजन बचाए, वही हनुमान है।”
तीन गुण और आत्मचिंतन का संदेश
कथा में सत्त्व, रज और तम गुणों की व्याख्या करते हुए कहा गया कि—
दूसरों के दोष देखने वाला अवगुणी
प्रतिदिन अपने मन का दर्शन करने वाला गुणी
मनुष्य का मन दर्पण है, और आंखों के रास्ते दोष भीतर प्रवेश करते हैं।
मानवता का मर्म
पं. दुबे ने कहा—
जो बांटकर खाए वही इंसान
जो पराया दर्द अपनाए वही इंसान
जो केवल काम निकलवाए, वह अवगुण है
हनुमान चरित्र मनुष्य को गुलामी नहीं, सेवा सिखाता है।
समाज के लिए हनुमान चरित्र—आज की आवश्यकता
पूरी कथा में हनुमान जी को भक्ति, सेवा, विद्या, विनय, समरसता और राष्ट्रबोध का सजीव प्रतीक बताया गया।
कथावाचक ने कहा कि यदि समाज को टूटने से बचाना है, तो हनुमान चरित्र को जीवन में उतारना ही होगा।

आज की कथा का सार
जब भक्ति केवल उच्चारण न रहकर आचरण बन जाए,
जब सेवा साधना का रूप ले ले
और जब विद्या मनुष्य को अहंकार नहीं, विनय सिखाने लगे—
तभी हनुमान चरित्र जीवंत होता है।
आज की श्री हनुमंत कथा केवल पौराणिक स्मृति नहीं,
बल्कि आधुनिक समय के बिखरते कुटुंब, टूटती सामाजिक समरसता और विस्मृत होते नागरिक कर्तव्यों के लिए दिव्य मार्गदर्शन बनकर उभरी।
पं. राधेश्याम जी दुबे के कथन में हनुमान जी शक्ति के नहीं, सेवा के शिखर के रूप में प्रकट हुए—
ऐसे सेवक, जिन्होंने प्रेम के बल पर पूरा कुटुंब अपना बना लिया,
और कर्तव्य के माध्यम से राष्ट्रधर्म का आदर्श गढ़ दिया।
यह कथा सिखाती है कि परम गुरु वह नहीं जो उपदेश दे,
परम गुरु वह है जो जीवन जीना सिखा दे।
हनुमान चरित्र में विद्या विनय बनती है,
तेज प्रताप प्रेम से बंधता है
और भक्ति समाज को जोड़ने का साधन बन जाती है।
आज की कथा का सार यही है—
जो अपने मन का दर्शन करे वही गुणी है,
जो पराया दर्द अपनाए वही इंसान है,
और जो भजन, संस्कृति और सेवा को बचाए
वही सच्चा हनुमान है।
क्रेडिट रिपोर्ट : राजेश कुमरावत ‘सार्थक’ विशेष : श्री हनुमंत कथा – तृतीय दिवस



