श्री हनुमंत कथा:पिता नहीं, पराए के लिए रोए राम?हनुमान कथा में उजागर हुआ पंच परिवर्तन का मर्मसेवा, कर्तव्य और समरसता—यही समाज की दिशा

श्री हनुमंत कथा के चतुर्थ दिवस पर पं. राधेश्याम दुबे ने हनुमान चरित्र से मन के दस मुख और बिखरते समाज के समाधान का शास्त्रोंक्त मार्ग बताया।
जनमत जागरण @ सोयतकलां: नगर परिषद प्रांगण स्थित महादेव मंदिर के समीप श्री हनुमंत कथा संकल्प समिति द्वारा आयोजित श्री हनुमंत कथा के चतुर्थ दिवस पर कथा व्यास पंडित राधेश्याम जी दुबे ने हनुमान चरित्र के माध्यम से भक्ति और सेवा के साथ-साथ मानव मन के संघर्ष, उसकी विकृतियों और ईश्वर प्राप्ति में आने वाली बाधाओं का गहन शास्त्रोंक्त विवेचन किया।
पं. दुबे ने कहा कि आध्यात्मिक जगत अलग है, क्योंकि वही जीव को ईश्वर से जोड़ता है। ईश्वर हमारे लिए कठिन नहीं हैं, कठिन इसलिए प्रतीत होते हैं क्योंकि हमारी सोच नकारात्मक हो गई है। ईश्वर से न मिलने की पहली बाधा हमारा शरीर नहीं, बल्कि विष से भरा हुआ हमारा मन है।
उन्होंने रामचरितमानस की चौपाई—
“नर समान कहहु देह नहीं, बड़े भाग मानस तन पावा”
के माध्यम से समझाया कि मानव शरीर दुर्लभ है, पर मन यदि विकृत हो जाए तो वही मोक्ष की राह में सबसे बड़ा विघ्न बन जाता है।

🚩मन के दस मुख और आध्यात्मिक संग्राम
कथावाचक ने अत्यंत प्रभावशाली रूप में कहा कि मन दस मुख वाला रावण है, जो साधक को निरंतर विचलित करता है।
उन्होंने मन के दस मुखों का वर्णन करते हुए कहा—
मन शिकारी है, विकारी है, भिखारी है, मदारी है,
मन दोधारी है, विषारी है, अपकारी है, दुविधारी है।
यही दस मुख भगवान की प्राप्ति में बाधा बनते हैं।
उन्होंने भजन की पंक्तियों—
“मनवा रे हे मनवा, जीवन है संग्राम”
के माध्यम से बताया कि हम प्रतिदिन जो चर्चाएं करते हैं, वे वास्तव में मन की ही चर्चाएं होती हैं।
भजन बनता नहीं, बनाना पड़ता है
पं. दुबे ने स्पष्ट किया कि भजन कोई बाहर से मिलने वाली वस्तु नहीं है।
🚩भजन बनता नहीं, भजन बनाना पड़ता है।
गोपियों का प्रत्येक कर्म भजन बन गया, और हनुमान जी स्वयं को गोपी भाव में मानते हैं।
उन्होंने कहा कि राम का काज ही भजन है—
“तुम्हरो मंत्र विभीषण माना”
हनुमान जी का कार्य ही मंत्र देना है, मार्ग दिखाना है।
हनुमान जी ने माता सीता की खोज की—अर्थात शांति की खोज की। जैसे-जैसे हम अपने कर्मों को साधना बनाते हैं, वैसे-वैसे जीवन स्वयं भजन में परिवर्तित होने लगता है।
🚩विज्ञान, प्राण और राम नाम
कथा में विज्ञान और अध्यात्म के अद्भुत समन्वय को रखते हुए पं. दुबे ने कहा—
हम सांस ले रहे हैं, यह जान की बदौलत है।
दर्द हो रहा है, यह विज्ञान की बदौलत है।
पर विज्ञान का अस्तित्व भी श्रीराम की सत्ता से ही है।
हनुमान जी केवल ज्ञानी ही नहीं, विज्ञानी भी हैं।
मन दोधारी तलवार की तरह है—एक ओर विष, दूसरी ओर अमृत। 🚩हनुमान चरित्र में मन का संग्राम और ईश्वर प्राप्ति का शास्त्रोंक्त मार्ग
कथावाचक ने मार्मिक प्रसंग रखते हुए कहा कि दशरथ जी के देहावसान पर राम नहीं रोए, लेकिन जटायु के बलिदान पर प्रभु राम रो पड़े।
कब, कैसे और किस सेवा से प्रभु प्रसन्न हो जाएं—यह कोई नहीं जानता।
राम ने सेतु बांधा, क्योंकि राम का स्वभाव जोड़ने का है।
आज जब दुनिया सनातन को तोड़ने में लगी है, तब राम और हनुमान का चरित्र जोड़ने की प्रेरणा देता है।
🚩हनुमान जी के पाँच कार्य
पं.दुबे ने कहा कि हनुमान जी पाँच महान कार्य करते हैं।
मंत्र देना
सेतुबंधन
विभीषण को मार्ग दिखाना
साधु-संतों की रक्षा
असुर प्रवृत्तियों का नाश
“साधु संत के तुम रखवाले, असुर निकंदन राम दुलारे”
ऐसे कार्य करने वालों पर हनुमान जी की विशेष कृपा होती है।
🚩हनुमान चरित्र में मन का संग्राम और ईश्वर प्राप्ति का शास्त्रोंक्त मार्ग
कथा के क्रम में माता अहिल्या के प्रसंग का उल्लेख करते हुए कहा गया कि
दुनिया में सबसे बड़ा काम मारना नहीं, तारना है।
राम ने सबसे पहले अहिल्या को तारा—जो छल, अपमान और पीड़ा की शिकार हुई थीं।
यह प्रसंग नारी सम्मान, करुणा और धर्म के मर्म को प्रकट करता है।
🚩सनातन संस्कृति का लक्ष्यकथा के अंत में पं. दुबे ने सनातन संस्कृति के उद्देश्य को स्पष्ट करते हुए कहा—“सर्वे भवन्तु सुखिनः, सर्वे सन्तु निरामयाः”यही सनातन का विस्तार है, यही हनुमान चरित्र का संदेश है।
🚩चतुर्थ दिवस की श्री हनुमंत कथा में हनुमान जी शक्ति के नहीं, साधना के प्रतीक के रूप में सामने आए।यह कथा मनुष्य को अपने मन के दस मुख पहचानने, कर्म को भजन बनाने और जोड़ने वाली संस्कृति को अपनाने की प्रेरणा देती है।
🚩 समाज को दिशा देने वाला महत्वपूर्ण प्रसंग
कथावाचक ने दशरथ–जटायु प्रसंग के माध्यम से यह संदेश दिया कि ईश्वर संबंधों से नहीं, कर्तव्य और करुणा से प्रसन्न होते हैं।
पिता के देहावसान पर राम का अश्रुपात न करना वैराग्य और मर्यादा का प्रतीक है, जबकि जटायु के बलिदान पर उनका रो पड़ना यह दर्शाता है कि प्रभु के लिए रक्त संबंध नहीं, धर्म संबंध अधिक मूल्यवान है।
यह प्रसंग समाज को सिखाता है कि—
जो धर्म के लिए खड़ा होता है, वही प्रभु के सबसे निकट होता है
सेवा, त्याग और सत्य के पक्ष में दिया गया बलिदान कभी छोटा नहीं होता
समाज में सम्मान पद, जाति या रिश्ते से नहीं, कर्तव्य निर्वाह से मिलता है
राम का जटायु के लिए रोना इस बात का प्रमाण है कि ईश्वर सबसे अधिक उस व्यक्ति को अपनाते हैं जो पराए के लिए खड़ा हो जाए।
आज के समाज में, जहाँ स्वार्थ, रिश्तों की राजनीति और दिखावटी संवेदना बढ़ रही है, यह प्रसंग हमें सिखाता है कि सच्ची मानवता वही है जो संकट में किसी के साथ खड़ी हो।
इस कथा से समाज को यह दिशा मिलती है कि—
धर्म का अर्थ पूजा नहीं, पीड़ित के पक्ष में खड़ा होना है।
और यही संदेश हनुमान चरित्र के माध्यम से भी पुष्ट होता है—
सेवा ही सबसे बड़ी साधना है, और त्याग ही सबसे बड़ा संबंध।
विशेष रिपोर्ट : राजेश कुमरावत ‘सार्थक’
स्थान : महादेव मंदिर, नगर परिषद प्रांगण
आयोजन : श्री हनुमंत कथा संकल्प समिति



