आगर मालवाआस्थामध्यप्रदेशस्पेशल रिपोर्ट

आस्था के आंगन में अव्यवस्था का अतिक्रमण पिपलिया खेड़ा बालाजी धाम में श्रद्धा और स्वच्छता के बीच बढ़ती दूरी

🚩जहां भक्ति झुकती है, वहां व्यवस्था क्यों हारती है? ▪️पिपलिया खेड़ा बालाजी: आस्था विशाल, व्यवस्थाएं बेहाल

“जहां भक्ति है अपार, वहां व्यवस्था क्यों लाचार?””बालाजी धाम में श्रद्धा के साथ स्वच्छता की भी पुकार”

जनमत जागरण @ सोयतकलां निकुंज कुमरावत। मध्य प्रदेश और राजस्थान की सीमा पर स्थित प्राचीन एवं प्रसिद्ध पिपलिया खेड़ा बालाजी मंदिर लाखों श्रद्धालुओं की अटूट आस्था का केंद्र है। वर्षों से यह धाम केवल धार्मिक ही नहीं, बल्कि आध्यात्मिक ऊर्जा का भी प्रमुख केंद्र रहा है। प्रत्येक मंगलवार और शनिवार यहां हजारों श्रद्धालु दर्शन हेतु पहुंचते हैं, वहीं विशेष अवसरों और पुरुषोत्तम मास जैसे पुण्य काल में यह संख्या कई गुना बढ़ जाती है।

लेकिन विडंबना यह है कि जहां एक ओर भक्त नाक रगड़कर, सिर झुकाकर और पूर्ण श्रद्धा के साथ बालाजी महाराज के दर्शन कर रहे हैं, वहीं दूसरी ओर मंदिर परिसर और उसके आसपास फैली अव्यवस्था उनकी आस्था को आहत कर रही है।

मंदिर के उत्तरी द्वार के समीप फैली गंदगी और सड़ते हुए खाद्य अवशेषों से उठने वाली दुर्गंध अब एक गंभीर समस्या का रूप ले चुकी है। स्थिति इतनी चिंताजनक है कि वहां से गुजरने वाले राहगीरों और श्रद्धालुओं को मुंह पर कपड़ा रखकर निकलना पड़ता है। भोजन प्रसादी ग्रहण करने वाले श्रद्धालु भी असहनीय दुर्गंध से परेशान दिखाई देते हैं। दृश्य कुछ ऐसा प्रतीत होता है मानो कोरोना काल का मास्क फिर से लौट आया हो, फर्क सिर्फ इतना है कि इस बार कारण संक्रमण नहीं, बल्कि अव्यवस्था है।स्था

जिम्मेदार कौन, जब आस्था ही हो रही उपेक्षित?

नीय नागरिकों, पुजारियों और कथा-वाचकों का कहना है कि जब वे मंदिर परिसर में ध्यान, पूजा या कथा के लिए बैठते हैं, तब हवा के साथ आने वाली बदबू साधना में व्यवधान उत्पन्न करती है। श्रद्धालुओं की एक ही पीड़ा है—जहां मन को शांति मिलने आती है, वहीं वातावरण बेचैनी का कारण बन रहा है।

दरअसल, प्रतिदिन यहां होने वाले भंडारों और भोजन प्रसादी के बाद बचने वाले पत्तल, दोने, गिलास तथा अन्य कचरे के उचित निस्तारण की कोई प्रभावी व्यवस्था दिखाई नहीं देती। श्रद्धालु विवश होकर मंदिर के आसपास अथवा समीपवर्ती खेतों में कचरा डाल देते हैं। मंदिर परिसर में पर्याप्त कचरा पात्रों का अभाव है और न ही कचरे को नियमित रूप से अन्यत्र ले जाने की कोई ठोस व्यवस्था दिखाई देती है।

स्थानीय लोगों का आरोप है कि इस समस्या से प्रशासन और जिम्मेदार अधिकारियों को कई बार अवगत कराया गया, किंतु अब तक कोई स्थायी समाधान नहीं निकल पाया है। जबकि यह मंदिर धार्मिक न्यास एवं धर्मस्व विभाग के अधीन संचालित होता है और प्रशासनिक स्तर पर इसकी निगरानी की जिम्मेदारी भी निर्धारित है।

सबसे बड़ा प्रश्न यह है कि जब लाखों लोगों की आस्था का केंद्र स्वच्छता और मूलभूत व्यवस्थाओं के लिए संघर्ष कर रहा हो, तब जिम्मेदार तंत्र की जवाबदेही कहां है? क्या केवल धार्मिक आयोजन और भीड़ प्रबंधन ही पर्याप्त हैं, या फिर श्रद्धालुओं को स्वच्छ एवं सम्मानजनक वातावरण उपलब्ध कराना भी उतना ही आवश्यक है?

पिपलिया खेड़ा बालाजी केवल एक मंदिर नहीं, बल्कि लाखों लोगों की श्रद्धा, विश्वास और आध्यात्मिक भावनाओं का प्रतीक है। ऐसे में आवश्यकता इस बात की है कि संबंधित विभाग, स्थानीय प्रशासन और समाज के जिम्मेदार लोग मिलकर इस समस्या का स्थायी समाधान निकालें। क्योंकि आस्था का सम्मान केवल दीप जलाने से नहीं, बल्कि उसके परिसर को स्वच्छ और व्यवस्थित रखने से भी होता है।

यदि समय रहते इस ओर ध्यान नहीं दिया गया, तो यह समस्या केवल स्वच्छता का विषय नहीं रहेगी, बल्कि श्रद्धालुओं की भावनाओं और धार्मिक गरिमा से जुड़ा गंभीर प्रश्न बन जाएगी।

अधिकारी बोले— व्यवस्था का कराया जाएगा निरीक्षण

जब इस संबंध में पिपलिया खेड़ा बालाजी धाम की व्यवस्थाओं और परिसर के बाहर फैली गंदगी को लेकर सोयत कलां तहसीलदार राजेश श्रीमाल से चर्चा की गई तो उन्होंने कहा कि, “मैं स्वयं मौके पर जाकर व्यवस्थाओं का निरीक्षण करूंगा और जो भी कमियां हैं, उन्हें दूर कराने के लिए आवश्यक कार्रवाई की जाएगी। श्रद्धालुओं को किसी प्रकार की असुविधा न हो, इसके लिए व्यवस्था को बेहतर बनाया जाएगा।”

इस आश्वासन के बाद अब श्रद्धालुओं और स्थानीय नागरिकों की निगाहें प्रशासनिक कार्रवाई पर टिकी हैं। लोगों का कहना है कि यदि समय रहते सफाई व्यवस्था, कचरा निस्तारण और परिसर प्रबंधन को लेकर ठोस कदम उठाए जाते हैं तो यह प्रसिद्ध धार्मिक स्थल अपनी गरिमा और पवित्रता को और अधिक सुदृढ़ कर सकेगा।

Related Articles

error: Content is protected !!