सम-सामयिकसम्पादकीय

विश्व साइकिल दिवस विशेष : एआई के युग में साइकिल वाला पत्रकार ✍️लेखक – राजेश कुमरावत ‘सार्थक’

43 वर्षों से साइकिल पर सवार एक पत्रकार की कहानी, जो बताती है कि तकनीक बदल सकती है, लेकिन निष्ठा नहीं

43 साल, तीन साइकिल और एक अटूट संकल्प बजरंगलाल दांगी की असाधारण पत्रकारिता यात्रा

समसामयिक लेखक – राजेश कुमरावत ‘सार्थक’ 

विश्व साइकिल दिवस पर जब दुनिया साइकिल को पर्यावरण संरक्षण, स्वास्थ्य और सतत विकास के प्रतीक के रूप में याद कर रही है, तब मध्यप्रदेश के आगर मालवा जिले के एक छोटे से गांव खेरिया में रहने वाले 65 वर्षीय बजरंगलाल दांगी साइकिल को एक अलग अर्थ प्रदान करते हैं। उनके लिए साइकिल केवल दो पहियों का वाहन नहीं, बल्कि कर्म, अनुशासन, आत्मसम्मान और पत्रकारिता के प्रति आजीवन समर्पण का माध्यम है।

आज सूचना क्रांति का युग है। कृत्रिम बुद्धिमत्ता, डिजिटल मीडिया, मोबाइल एप्लीकेशन और सोशल मीडिया ने समाचारों की दुनिया को पूरी तरह बदल दिया है। खबरें अब सेकंडों में लाखों लोगों तक पहुंच जाती हैं। लेकिन इस तकनीकी क्रांति के बीच एक ऐसा व्यक्ति भी है, जो पिछले 43 वर्षों से हर सुबह सूरज निकलने से पहले उठता है, अपनी साइकिल तैयार करता है और समाचारों को पाठकों तक पहुंचाने के लिए निकल पड़ता है।

यह कहानी केवल एक अखबार वितरक या एक ग्रामीण पत्रकार की नहीं है। यह उस पीढ़ी की कहानी है जिसने कर्तव्य को सुविधा से ऊपर रखा, जिसने श्रम को सम्मान माना और जिसने पत्रकारिता को समाज सेवा का माध्यम समझा।

15 मई 1983 से शुरू हुआ सफर

बजरंगलाल दांगी का साइकिल और पत्रकारिता से जुड़ा सफर 15 मई 1983 को शुरू हुआ था। तब देश में न मोबाइल थे, न इंटरनेट और न ही चौबीस घंटे चलने वाले समाचार चैनल। ग्रामीण क्षेत्रों में समाचार पत्र ही सूचना का सबसे विश्वसनीय माध्यम हुआ करते थे।

उस समय शुरू हुआ उनका सफर आज भी जारी है। इन 43 वर्षों में उन्होंने केवल तीन साइकिलें बदली हैं, लेकिन अपनी कार्यशैली नहीं बदली। आज भी वे उसी समर्पण और अनुशासन के साथ काम करते हैं, जैसा चार दशक पहले करते थे।

ग्राम खेरिया के निवासी बजरंगलाल दांगी एक शिक्षित किसान हैं। उन्होंने बी.कॉम. की शिक्षा प्राप्त की है। शिक्षा पूरी करने के बाद उन्होंने खेती और पत्रकारिता दोनों क्षेत्रों में सक्रिय भूमिका निभाई। वर्ष 1992 में उन्होंने भोपाल स्थित माखनलाल चतुर्वेदी पत्रकारिता विश्वविद्यालय से एक माह का पत्रकारिता प्रशिक्षण भी प्राप्त किया। उस समय पत्रकारिता प्रशिक्षण के अवसर सीमित थे और पूरे प्रदेश से चुनिंदा प्रतिभागियों का चयन किया जाता था।

यह प्रशिक्षण उनके पत्रकारिता जीवन में एक महत्वपूर्ण पड़ाव सिद्ध हुआ। लेकिन उनकी वास्तविक पाठशाला गांव, समाज और जनजीवन ही रहा।

नई दुनिया से अटूट रिश्ता

पत्रकारिता की दुनिया में संस्थान बदलना सामान्य बात है। परिस्थितियां बदलती हैं, अवसर बदलते हैं और लोग भी बदल जाते हैं। लेकिन बजरंगलाल दांगी की सबसे बड़ी विशेषताओं में से एक उनकी संस्थागत निष्ठा है।

दशकों से उनका जुड़ाव नई दुनिया समाचार पत्र से बना हुआ है। यह संबंध केवल व्यावसायिक नहीं, बल्कि भावनात्मक भी है। नई दुनिया के साथ जुड़कर उन्होंने समाचारों को घर-घर पहुंचाया, पाठकों का विश्वास अर्जित किया और पत्रकारिता के उन मूल्यों को जिया, जिन पर कभी भारतीय पत्रकारिता की पहचान टिकी थी।

आज क्षेत्र में यदि कोई व्यक्ति साइकिल और समाचार पत्र के साथ दिखाई देता है तो लोगों के मन में सहज ही एक नाम उभरता है—बजरंगलाल दांगी। धीरे-धीरे साइकिल और नई दुनिया दोनों ही उनकी पहचान बन गए।

हर सुबह शुरू होती है एक नई यात्रा

65 वर्ष की आयु में भी उनका दैनिक अनुशासन युवा पीढ़ी के लिए प्रेरणा है।

प्रतिदिन सुबह लगभग पांच बजे उनका दिन शुरू होता है। इसके बाद वे समाचार पत्रों की व्यवस्था करते हैं और साइकिल से अपने निर्धारित मार्ग पर निकल पड़ते हैं। मौसम कैसा भी हो, उनकी दिनचर्या नहीं बदलती।

आज के समय में जब कुछ किलोमीटर की दूरी तय करने के लिए भी लोग मोटरसाइकिल या कार का उपयोग करते हैं, तब बजरंगलाल दांगी आज भी साइकिल को अपना साथी बनाए हुए हैं। उल्लेखनीय बात यह है कि उन्हें आज भी मोटरसाइकिल चलाना नहीं आता।

लेकिन शायद यही उनकी सबसे बड़ी ताकत है। उन्होंने कभी सुविधा को अपनी आवश्यकता नहीं बनाया। उनके लिए काम महत्वपूर्ण रहा, साधन नहीं।

कंठल नदी और संघर्ष के वे दिन

बजरंगलाल दांगी की कहानी को समझना हो तो केवल उनकी साइकिल को नहीं, उनके रास्ते को भी समझना होगा।

ग्राम खेरिया और सोयतकलां के बीच कंठल नदी बहती है। आज इस नदी पर पुल मौजूद है और आवागमन अपेक्षाकृत आसान है। लेकिन लगभग दो दशक पहले तक स्थिति बिल्कुल अलग थी।

वर्षा ऋतु में कंठल नदी कई बार विकराल रूप धारण कर लेती थी। तेज बहाव, उफनता पानी और कीचड़ भरे रास्ते लोगों की आवाजाही को प्रभावित कर देते थे। ऐसे समय में नदी पार करना जोखिम भरा कार्य माना जाता था।

लेकिन समाचार पत्र समय पर पाठकों तक पहुंचे, यह उनका संकल्प था। हाथ में छाता, शरीर पर रेनकोट और साथ में साइकिल लेकर वे निकल पड़ते थे। कई बार उन्हें जान जोखिम में डालकर नदी पार करनी पड़ती थी। बरसात, आंधी और खराब मौसम भी उनके दायित्व के रास्ते में बाधा नहीं बन सके।

आज जब पुल बन चुका है तो नई पीढ़ी शायद उस संघर्ष की कल्पना भी न कर सके। लेकिन उन दिनों की यादें बताती हैं कि समाचारों को पाठकों तक पहुंचाने के पीछे कितना श्रम, साहस और प्रतिबद्धता छिपी होती थी।

पत्रकारिता, लेकिन बिना आडंबर के

समकालीन समय में पत्रकारिता को लेकर समाज में अनेक प्रकार की चर्चाएं होती रहती हैं। ऐसे दौर में बजरंगलाल दांगी का व्यक्तित्व पत्रकारिता के उस सरल और मूल्यनिष्ठ स्वरूप का प्रतिनिधित्व करता है, जिसमें सेवा सर्वोपरि होती है।

उन्होंने कभी पत्रकारिता को प्रभाव प्रदर्शन का माध्यम नहीं बनाया। न कभी किसी को धमकाने का प्रयास किया और न ही किसी प्रकार के अनुचित दबाव का सहारा लिया। उनके लिए पत्रकारिता का अर्थ हमेशा समाज और संस्कृति के प्रति जिम्मेदारी रहा।

क्षेत्र में आयोजित धार्मिक कार्यक्रम, सामाजिक आयोजन, सांस्कृतिक गतिविधियां और लोकजीवन से जुड़े विषय उनकी खबरों का प्रमुख हिस्सा रहे हैं। उन्होंने हमेशा समाज को जोड़ने वाली पत्रकारिता को प्राथमिकता दी।

उनकी खबरों में सनसनी नहीं, संवेदनाएं दिखाई देती हैं। विवाद नहीं, सामाजिक सरोकार दिखाई देते हैं।

सादगी की शक्ति

बजरंगलाल दांगी का जीवन इस बात का प्रमाण है कि व्यक्ति की पहचान उसके साधनों से नहीं, उसके चरित्र से बनती है।

आज जब भौतिक सुविधाओं को सफलता का पैमाना माना जाने लगा है, तब उनका जीवन एक अलग संदेश देता है। उन्होंने आधुनिकता को स्वीकार किया, लेकिन सादगी को नहीं छोड़ा। उन्होंने समय के साथ कदम मिलाए, लेकिन अपने मूल्यों से समझौता नहीं किया।

चार दशक से अधिक समय तक लगातार साइकिल चलाना केवल शारीरिक क्षमता का प्रश्न नहीं है। यह मानसिक अनुशासन, दृढ़ इच्छाशक्ति और जीवन के प्रति सकारात्मक दृष्टिकोण का परिणाम भी है।

इसी कारण 65 वर्ष की आयु में भी वे पूर्णतः स्वस्थ, सक्रिय और ऊर्जावान हैं।

बदलते समय के बीच एक स्थिर प्रतीक

समय ने बहुत कुछ बदल दिया है। गांवों की तस्वीर बदली है, संचार के साधन बदले हैं, पत्रकारिता की कार्यप्रणाली बदली है और पाठकों की आदतें भी बदली हैं।

लेकिन कुछ मूल्य ऐसे होते हैं जो समय के साथ और अधिक प्रासंगिक हो जाते हैं। ईमानदारी, अनुशासन, निष्ठा और श्रम ऐसे ही मूल्य हैं।

बजरंगलाल दांगी इन्हीं मूल्यों के जीवंत प्रतीक हैं।

उनका जीवन हमें यह सिखाता है कि तकनीक मनुष्य का स्थान नहीं ले सकती। मशीनें सूचना पहुंचा सकती हैं, लेकिन कर्तव्यनिष्ठा नहीं पैदा कर सकतीं। कृत्रिम बुद्धिमत्ता काम को आसान बना सकती है, लेकिन समर्पण का विकल्प नहीं बन सकती।

विश्व साइकिल दिवस पर एक प्रेरक संदेश

विश्व साइकिल दिवस केवल साइकिल के महत्व को याद करने का अवसर नहीं है। यह उन लोगों को सम्मान देने का भी अवसर है जिन्होंने अपने जीवन से साइकिल को एक विचार और एक मूल्य में बदल दिया।

बजरंगलाल दांगी का जीवन हमें बताता है कि सफलता बड़े संसाधनों से नहीं, बल्कि बड़े संकल्पों से प्राप्त होती है। उन्होंने बिना शोर किए, बिना प्रचार किए और बिना किसी विशेष अपेक्षा के अपने दायित्व का निर्वहन किया।

43 वर्षों की उनकी यात्रा केवल एक व्यक्ति की उपलब्धि नहीं, बल्कि श्रम, सादगी और मूल्यनिष्ठ पत्रकारिता की उपलब्धि है।

जब दुनिया कृत्रिम बुद्धिमत्ता के भविष्य की चर्चा कर रही है, तब खेरिया गांव का यह साइकिल सवार पत्रकार हमें याद दिलाता है कि किसी भी समाज की वास्तविक शक्ति उसकी तकनीक नहीं, बल्कि उसके कर्मयोगी नागरिक होते हैं। लेखक – वरिष्ठ पत्रकार, समसामयिक विश्लेषक एवं जनसरोकार आधारित पत्रकारिता के सक्रिय हस्ताक्षर।

बजरंगलाल दांगी ऐसे ही एक कर्मयोगी हैं—जो हर सुबह साइकिल के पैडल के साथ यह संदेश भी आगे बढ़ाते हैं कि समय चाहे कितना भी बदल जाए, निष्ठा का कोई विकल्प नहीं होता।

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