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भारत जोड़ने निकले या समाज बांटने? राहुल की राजनीति का असली एजेंडा क्या है? लेखक – डॉ बालाराम परमार ‘हंसमुख’

जाति, धर्म और विदेशों में भारत की आलोचना... राहुल गांधी की राजनीति पर उठे बड़े सवाल

डॉ. बालाराम परमार ‘हसमुख’

भारतीय लोकतंत्र का सबसे बड़ा उत्सव चुनाव है और चुनाव में राजनीतिक दलों का सबसे महत्वपूर्ण हथियार उनका विचार और दृष्टि हुआ करती थी। लोकतंत्र में विचारों का संघर्ष स्वाभाविक है, किंतु चिंता तब उत्पन्न होती है जब विचार की जगह समाज को विभाजित करने वाली राजनीति प्रमुख हो जाए।

पिछले कुछ वर्षों में कांग्रेस के प्रमुख नेता एवं लोकसभा में विपक्ष के नेता राहुल गांधी की राजनीतिक शैली को देखें तो एक विशेष प्रकार का पैटर्न दिखाई देता है। हिंदू समाज के भीतर जातिगत विमर्श को तीव्र करना, अल्पसंख्यकों के बीच असुरक्षा की भावना के प्रश्न उठाना, अनुसूचित जाति और जनजाति के बीच ऐतिहासिक अन्याय की चर्चा को वर्तमान राजनीति का केंद्रीय मुद्दा बनाना—क्या यह वास्तव में सामाजिक न्याय की राजनीति है या फिर एक नए प्रकार के वोट बैंक निर्माण का प्रयास?

यह प्रश्न इसलिए भी महत्वपूर्ण है क्योंकि भारत आज 1950 का भारत नहीं है।

हल्द्वानी का ‘शुद्धिकरण’ विवाद और राजनीतिक विमर्श

उत्तराखंड के हल्द्वानी में कांग्रेस अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खड़गे की सभा के बाद उत्पन्न तथाकथित ‘शुद्धिकरण’ विवाद को भी इसी व्यापक राजनीतिक संदर्भ में देखा जाना चाहिए। कांग्रेस ने इस घटना को दलित नेता के अपमान और छुआछूत से जोड़ते हुए तीखी प्रतिक्रिया व्यक्त की। विपक्ष ने इसे सामाजिक सम्मान और दलित अस्मिता का प्रश्न बनाया।

दूसरी ओर, इस घटना को लेकर अलग-अलग तथ्य और दावे सामने आए। भाजपा पक्ष की ओर से कहा गया कि कथित अनुष्ठान किसी व्यक्ति या जाति के विरुद्ध नहीं, बल्कि मंच से जुड़े कुछ नारों और राजनीतिक गतिविधियों के विरोध में था।

ऐसे मामलों में सबसे बड़ी आवश्यकता तथ्यों की निष्पक्ष जांच की होती है। किसी भी धार्मिक अनुष्ठान अथवा सफाई गतिविधि को बिना प्रमाण सीधे जातिगत अपमान घोषित कर देना भी सामाजिक तनाव को जन्म दे सकता है।

भारत जैसे विविधतापूर्ण देश में शब्दों की राजनीति अत्यंत सावधानी से की जानी चाहिए। क्योंकि एक बड़े राष्ट्रीय नेता द्वारा दिया गया संदेश केवल राजनीतिक कार्यकर्ताओं तक सीमित नहीं रहता, बल्कि समाज की मानसिकता को प्रभावित करता है।

राहुल गांधी की राजनीति और पहचान का प्रश्न

राहुल गांधी की राजनीतिक और पारिवारिक पृष्ठभूमि पर भी अक्सर बहस होती रही है। यह स्पष्ट है कि उनके दादा फिरोज गांधी पारसी समुदाय से थे और स्वतंत्रता आंदोलन, पत्रकारिता तथा संसदीय लोकतंत्र में उनका महत्वपूर्ण योगदान रहा।

फिरोज गांधी के संबंध में अनेक प्रकार की भ्रांतियां भी फैलाई जाती रही हैं। उनका मूल नाम फिरोज जहांगीर घांडी था और वे पारसी समुदाय से संबंधित थे। उन्हें किसी अन्य धर्म या समुदाय से जोड़कर प्रचारित करना ऐतिहासिक रूप से उचित नहीं है।

यही वह बिंदु है जहां राहुल गांधी की राजनीतिक शैली पर एक बड़ा प्रश्न खड़ा होता है।

जब कोई राजनेता लगातार जाति और धार्मिक पहचान को राजनीति के केंद्र में रखता है तो स्वाभाविक रूप से जनता यह जानना चाहती है कि वह स्वयं पहचान की राजनीति को किस दृष्टि से देखता है।

राहुल गांधी कभी स्वयं को जनेऊधारी ब्राह्मण बताते हैं, कभी दलितों के बीच जाकर भोजन करते हैं, कभी पिछड़ों की जनगणना को राजनीति का प्रमुख मुद्दा बनाते हैं। लोकतंत्र में इन गतिविधियों पर किसी को आपत्ति नहीं होनी चाहिए, किंतु प्रश्न यह है कि क्या सामाजिक समरसता केवल प्रतीकात्मक राजनीति से स्थापित होगी?

धर्म और सामाजिक पहचान केवल चुनावी भाषणों का विषय नहीं हो सकते। इनके साथ जीवन-दृष्टि और आचरण भी जुड़ा होता है।

क्या भय की राजनीति लोकतंत्र को मजबूत करती है?

राहुल गांधी और कांग्रेस की राजनीति पर अक्सर यह आरोप लगाया जाता है कि वह अलग-अलग सामाजिक समूहों के बीच भय की भावना पैदा करती है।

मुस्लिम समाज से कहा जाता है कि उनकी संवैधानिक सुरक्षा खतरे में है। अनुसूचित जाति और जनजाति से कहा जाता है कि आरक्षण समाप्त किया जा सकता है। पिछड़े वर्गों को बताया जाता है कि सत्ता और संसाधनों पर उनका अधिकार नहीं है।

सवाल यह है कि क्या भारत की लोकतांत्रिक व्यवस्था इतनी कमजोर है कि कोई भी सरकार संविधान और सामाजिक न्याय की पूरी व्यवस्था को एक झटके में समाप्त कर देगी?

भारत का संविधान केवल किसी राजनीतिक दल की संपत्ति नहीं है। संविधान भारत की जनता की सामूहिक शक्ति है। संसद, न्यायपालिका, लोकतांत्रिक संस्थाएं और सबसे बड़ी बात—देश की जागरूक जनता इसकी संरक्षक है।

सामाजिक न्याय की लड़ाई आवश्यक है, लेकिन समाज को निरंतर भय में रखना सामाजिक न्याय नहीं है।

विदेशों में भारत की आलोचना : राजनीतिक असहमति या राष्ट्रीय छवि का प्रश्न?

राहुल गांधी विदेशों में जाकर भारत की लोकतांत्रिक व्यवस्था, संस्थाओं और राजनीतिक परिस्थितियों पर अपनी राय रखते रहे हैं। लोकतंत्र में सरकार की आलोचना करना विपक्ष का अधिकार है और कई बार उसका कर्तव्य भी।

लेकिन यहां एक महत्वपूर्ण प्रश्न है।

क्या भारत की राजनीतिक लड़ाई भारत की संसद और जनता के बीच लड़ी जानी चाहिए या विदेशी मंचों पर?

भारत में गरीबी है, सामाजिक विषमताएं हैं, जातिगत समस्याएं हैं, क्षेत्रवाद है, भाषाई विवाद हैं—इन सबको नकारा नहीं जा सकता। लेकिन इन समस्याओं का समाधान भारत की लोकतांत्रिक व्यवस्था के भीतर खोजा जाना चाहिए।

विदेशी मंच पर भारत की आलोचना करते समय राष्ट्रीय हित और राजनीतिक असहमति के बीच संतुलन आवश्यक है।

भारत आज वैश्विक राजनीति में एक महत्वपूर्ण शक्ति के रूप में उभर रहा है। ऐसे समय में यदि कोई भारतीय नेता विदेशों में जाकर देश की लोकतांत्रिक संस्थाओं पर गंभीर प्रश्न खड़े करता है, तो यह स्वाभाविक रूप से बहस का विषय बनता है।

राजनीतिक आलोचना और राष्ट्र की छवि को कमजोर करने वाले विमर्श के बीच एक महीन रेखा होती है। राष्ट्रीय नेताओं को उस रेखा का ध्यान रखना चाहिए।

राहुल गांधी को पारसी समुदाय के प्रश्न भी उठाने चाहिए

राहुल गांधी के पारिवारिक इतिहास का संबंध पारसी समुदाय से है। इसलिए यह अपेक्षा स्वाभाविक है कि वे पारसी समाज के सामने खड़ी चुनौतियों पर भी राष्ट्रीय स्तर पर अपनी आवाज बुलंद करें।

पारसी समुदाय भारत की सबसे छोटी लेकिन सबसे महत्वपूर्ण सांस्कृतिक और सामाजिक समुदायों में से एक है। संख्या के स्तर पर यह समुदाय निरंतर सिकुड़ रहा है।

भारत के विकास में पारसी समाज का योगदान असाधारण रहा है।

जमशेदजी टाटा ने भारतीय औद्योगिक विकास की मजबूत नींव रखी। होमी जहांगीर भाभा ने भारत के परमाणु कार्यक्रम को दिशा दी। फील्ड मार्शल सैम मानेकशॉ भारतीय सेना के गौरव बने। अनेक उद्योगपतियों, वैज्ञानिकों, शिक्षाविदों और सामाजिक कार्यकर्ताओं ने भारत निर्माण में योगदान दिया।

यह समुदाय संख्या में छोटा जरूर है, लेकिन राष्ट्र निर्माण में उसका योगदान विशाल है।

आज आवश्यकता है कि भारत सरकार और समाज पारसी समुदाय की जनसंख्या में हो रही कमी और सांस्कृतिक संरक्षण के प्रश्नों पर गंभीरता से विचार करे।

राहुल गांधी और प्रियंका गांधी वाड्रा यदि सामाजिक न्याय और अल्पसंख्यक अधिकारों की राजनीति करते हैं, तो पारसी समुदाय की चुनौतियों पर भी उनकी आवाज मुखर होनी चाहिए।

ईरान और धार्मिक अल्पसंख्यकों का प्रश्न

विश्व के विभिन्न देशों में धार्मिक अल्पसंख्यकों की स्थिति चिंता का विषय रही है। ईरान में पारसी समुदाय की ऐतिहासिक स्थिति और वर्तमान चुनौतियों पर भी अंतरराष्ट्रीय मानवाधिकार विमर्श होना चाहिए।

इसी प्रकार भारत को भी यह सिद्धांत अपनाना चाहिए कि दुनिया के किसी भी हिस्से में धार्मिक आधार पर अत्याचार हो, उसका विरोध होना चाहिए—चाहे पीड़ित हिंदू हों, पारसी हों, ईसाई हों, बौद्ध हों, यहूदी हों या मुसलमान।

मानवाधिकारों का कोई चयनात्मक धर्म नहीं हो सकता।

भारत बदल चुका है, दलित समाज भी बदल रहा है

राहुल गांधी सहित देश के सभी राजनीतिक दलों को यह समझना होगा कि भारत का दलित समाज आज केवल सहानुभूति का पात्र नहीं है।

आज दलित समाज से राष्ट्रपति हुए हैं। देश के विभिन्न राज्यों में दलित मुख्यमंत्री रहे हैं। दलित समाज से आईएएस, आईपीएस, वैज्ञानिक, डॉक्टर, इंजीनियर, उद्योगपति और सफल उद्यमी निकल रहे हैं।

डॉ. भीमराव अंबेडकर ने जिस संविधान के निर्माण में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई, उसी संविधान ने भारत के वंचित वर्गों को अवसर और अधिकार की नई शक्ति प्रदान की।

आज अनुसूचित जाति और जनजाति के लिए शिक्षा, छात्रवृत्ति, उद्यमिता, आवास, स्वास्थ्य और रोजगार से संबंधित अनेक योजनाएं संचालित हो रही हैं।

मुद्रा योजना, स्टैंड-अप इंडिया, छात्रवृत्ति योजनाएं, आवास योजनाएं और स्वास्थ्य सुरक्षा कार्यक्रमों ने आर्थिक रूप से कमजोर वर्गों तक पहुंच बनाने का प्रयास किया है।

इसका अर्थ यह नहीं कि सामाजिक भेदभाव पूरी तरह समाप्त हो गया है। ऐसा दावा वास्तविकता से दूर होगा।

लेकिन यह भी उतना ही गलत है कि भारत के दलित समाज को लगातार केवल पीड़ित और असहाय बताकर राजनीतिक लाभ उठाया जाए।

दलित समाज को सहानुभूति नहीं, सम्मान चाहिए। उसे भय नहीं, अवसर चाहिए। उसे राजनीतिक प्रयोगशाला नहीं, विकास में साझेदारी चाहिए।

जातिगत जनगणना या जातिविहीन समाज?

आज विपक्ष जातिगत जनगणना को प्रमुख राजनीतिक मुद्दा बना रहा है। यह एक वैधानिक और नीतिगत बहस का विषय हो सकता है। सरकारें आंकड़ों के आधार पर योजनाएं बना सकती हैं।

लेकिन इसके साथ एक बड़ा दार्शनिक प्रश्न भी जुड़ा है।

क्या भारत का लक्ष्य जातियों की संख्या और राजनीतिक शक्ति को स्थायी रूप से मजबूत करना है, या धीरे-धीरे एक ऐसे समाज की दिशा में बढ़ना है जहां व्यक्ति की पहचान उसकी जाति से अधिक उसके कर्म और क्षमता से हो?

यदि हर चुनाव में ब्राह्मण, ठाकुर, ओबीसी, दलित, आदिवासी और अन्य जातियों की अलग-अलग राजनीतिक गणना होगी तो सामाजिक समरसता कैसे विकसित होगी?

राजनीति को समाज की कमजोरियों को कम करना चाहिए, उन्हें स्थायी राजनीतिक हथियार नहीं बनाना चाहिए।

कांग्रेस को अपने भीतर भी झांकना होगा

राहुल गांधी और कांग्रेस यदि देश में जातिगत प्रतिनिधित्व का प्रश्न उठाते हैं तो उन्हें अपनी पार्टी के भीतर भी इस विषय पर आत्ममंथन करना चाहिए।

क्या कांग्रेस में निर्णय लेने की वास्तविक शक्ति का व्यापक विकेंद्रीकरण हुआ है?

क्या पार्टी के सभी वर्गों को वास्तविक नेतृत्व का अवसर मिलता है?

क्या पार्टी अध्यक्ष और संगठनात्मक संरचना के बावजूद अंतिम राजनीतिक निर्णयों में एक परिवार की भूमिका अत्यधिक प्रभावशाली नहीं दिखाई देती?

लोकतंत्र का सबसे बड़ा सिद्धांत यही है कि जो प्रश्न आप दूसरे से पूछते हैं, पहले उसका उत्तर स्वयं देने की तैयारी रखें।

भारत जोड़ो यात्रा का वास्तविक अर्थ

राहुल गांधी ने भारत जोड़ो यात्रा निकाली। यह लोकतांत्रिक राजनीति का एक महत्वपूर्ण प्रयोग था और इसे व्यापक जनसंपर्क अभियान के रूप में देखा जा सकता है।

लेकिन भारत केवल पैदल चलने से नहीं जुड़ता।

भारत दिलों से जुड़ता है।

भारत तब जुड़ेगा जब हिंदू को ब्राह्मण, ठाकुर, वैश्य और दलित में बांटने की राजनीति कम होगी।

भारत तब जुड़ेगा जब मुसलमानों को हर समय भय के वातावरण में रखने वाली राजनीति समाप्त होगी।

भारत तब जुड़ेगा जब अनुसूचित जाति और जनजाति के युवाओं को केवल अतीत की पीड़ा नहीं, भविष्य की संभावनाएं दिखाई जाएंगी।

भारत तब जुड़ेगा जब राजनीतिक दल चुनाव जीतने के लिए समाज की दरारों को चौड़ा करने के बजाय उन्हें भरने का प्रयास करेंगे।

अच्छे विचार, अच्छे वचन और अच्छे कर्म

पारसी धर्म की मूल नैतिक शिक्षा—अच्छे विचार, अच्छे शब्द और अच्छे कर्म—आज की राजनीति के लिए अत्यंत प्रासंगिक है।

राजनीति में अच्छे विचार का अर्थ है राष्ट्रहित को सर्वोपरि रखना।

अच्छे शब्द का अर्थ है ऐसा भाषण न देना जिससे समाज में स्थायी वैमनस्य पैदा हो।

और अच्छे कर्म का अर्थ है सत्ता और विपक्ष दोनों में रहते हुए राष्ट्र निर्माण में सकारात्मक भूमिका निभाना।

भारत को आज विपक्ष की आवश्यकता है, लेकिन ऐसे विपक्ष की जो सरकार का विरोध करते हुए राष्ट्र का मनोबल कमजोर न करे।

भारत को सरकार की भी आवश्यकता है, लेकिन ऐसी सरकार की जो विकास के साथ सामाजिक न्याय और संवेदनशीलता बनाए रखे।

अनुसूचित जाति, जनजाति और मुस्लिम समाज से भी संवाद आवश्यक

भारत के सभी नागरिकों को 21वीं सदी की बदलती परिस्थितियों को समझना होगा।

आज भारत शिक्षा, विज्ञान, तकनीक, अर्थव्यवस्था और वैश्विक प्रतिष्ठा के नए दौर में प्रवेश कर रहा है।

देश के वंचित वर्गों को भी केवल राजनीतिक नारों के आधार पर अपनी स्थिति का मूल्यांकन नहीं करना चाहिए। उन्हें देखना चाहिए कि शिक्षा, रोजगार, उद्यमिता और आर्थिक अवसरों में उनके लिए कौन से नए द्वार खुल रहे हैं।

समाज को इतिहास से सीखना चाहिए, लेकिन इतिहास की पीड़ा को स्थायी राजनीतिक हथियार नहीं बनाना चाहिए।

बार-बार मनुस्मृति, रामायण या प्राचीन सामाजिक संरचनाओं के कुछ विवादास्पद प्रसंगों को वर्तमान समाज में संघर्ष पैदा करने के लिए इस्तेमाल करना भी गंभीर चिंतन का विषय है।

इतिहास का अध्ययन आवश्यक है। इतिहास की गलतियों को स्वीकार करना भी आवश्यक है। लेकिन वर्तमान पीढ़ियों को अतीत के नाम पर एक-दूसरे का शत्रु बना देना उचित नहीं।

राष्ट्र पहले, राजनीति बाद में

भारत की संस्कृति जितनी समृद्ध होगी, दुनिया में भारत का सम्मान उतना ही बढ़ेगा।

राष्ट्रगान का सम्मान केवल एक गीत का सम्मान नहीं है, बल्कि राष्ट्रीय चेतना का सम्मान है।

जन्मभूमि का सम्मान केवल भावनात्मक आग्रह नहीं, बल्कि अपनी सभ्यता के प्रति कृतज्ञता है।

कर्मभूमि का सम्मान उस ऋण को स्वीकार करना है जो समाज और राष्ट्र हमें प्रदान करते हैं।

आज भारत को सबसे अधिक आवश्यकता विभाजनकारी राजनीति से ऊपर उठने की है।

राहुल गांधी हों या कोई अन्य विपक्षी नेता, प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी हों या सत्ता पक्ष का कोई अन्य प्रतिनिधि—सभी को यह समझना होगा कि लोकतंत्र में राजनीतिक प्रतिद्वंद्वी होना और सामाजिक शत्रु बन जाना, दोनों अलग-अलग बातें हैं।

भारत को तोड़ने वाली भाषा किसी के हित में नहीं है।

जाति के नाम पर विभाजन, धर्म के नाम पर भय और विदेशों में भारत की छवि को लेकर गैर-जिम्मेदार राजनीतिक बयान—इन सभी पर राष्ट्रीय स्तर पर गंभीर आत्ममंथन होना चाहिए।

आज भारत को एक नए राजनीतिक संस्कार की आवश्यकता है।

ऐसी राजनीति जिसमें प्रश्न हों, लेकिन षड्यंत्र का भ्रम न हो। विरोध हो, लेकिन राष्ट्र-विरोध का वातावरण न बने। सामाजिक न्याय हो, लेकिन समाज को स्थायी रूप से जातियों में विभाजित न किया जाए।

राहुल गांधी और कांग्रेस सहित देश के सभी राजनीतिक दलों के सामने चुनौती यही है कि वे चुनावी गणित से ऊपर उठकर राष्ट्रीय सामाजिक समरसता का नया मॉडल प्रस्तुत करें।

भारत जोड़ने का सबसे बड़ा मार्ग सड़कों पर चलने से नहीं, समाज के भीतर खड़ी दीवारों को गिराने से निकलेगा।

और शायद आज भारतीय राजनीति को सबसे अधिक इसी आत्ममंथन की आवश्यकता है।

– डॉ. बालाराम परमार

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