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जंतर-मंतर विश्वविद्यालय: BA in आंदोलन | राजनीति और आंदोलन संस्कृति पर तीखा व्यंग्य

क्या अब आंदोलन भी करियर बन गया है? राजनीति, मीडिया और भीड़तंत्र पर एक तीखा समसामयिक व्यंग्य लेखक – डॉ. बालाराम परमार 'हँसमुख'

क्या अब आंदोलन भी करियर बन गया है? राजनीति, मीडिया और भीड़तंत्र पर एक तीखा समसामयिक व्यंग्य

क्या अब सफलता का रास्ता किताबों और प्रतियोगी परीक्षाओं से होकर नहीं, बल्कि धरना-प्रदर्शन, नारेबाजी और मीडिया की सुर्खियों से होकर गुजरता है? क्या आंदोलन अब केवल लोकतांत्रिक अधिकार नहीं, बल्कि प्रसिद्धि और राजनीति में प्रवेश का शॉर्टकट भी बनते जा रहे हैं?

इन्हीं सवालों को व्यंग्य की पैनी धार से उकेरते हुए प्रस्तुत है डॉ. बालाराम परमार ‘हँसमुख’ का यह समसामयिक राजनीतिक व्यंग्य। यह रचना वास्तविक विश्वविद्यालय का वर्णन नहीं, बल्कि वर्तमान सामाजिक-राजनीतिक विमर्श, आंदोलन की संस्कृति, मीडिया की भूमिका और सत्ता-विपक्ष की राजनीति पर एक साहित्यिक कटाक्ष है।


सूचना! सूचना!! सूचना!!!

NEET का पेपर आउट हुआ? घबराइए मत!

डॉक्टर नहीं बन पाए? कोई बात नहीं। स्टेथोस्कोप छोड़िए, आंदोलन का झंडा उठाइए।

क्योंकि देश में अब खुल चुका है एक नया संस्थान—

“जंतर-मंतर विश्वविद्यालय

हमारी सबसे लोकप्रिय डिग्री है—

BA in आंदोलन

जंतर-मंतर भारत की वह ऐतिहासिक धरती है, जहाँ वर्षों से लोग अपनी आवाज़ सत्ता तक पहुँचाने आते रहे हैं। अनेक आंदोलनों ने यहीं से राष्ट्रीय बहसों को जन्म दिया और राजनीति की दिशा प्रभावित की। बस, हमने उसी परंपरा को आधुनिक शिक्षा का रूप दे दिया है!

ज़रा सोचिए…

उधर आप 12वीं पास करेंगे, फिर JEE या NEET की तैयारी करेंगे। दो-तीन साल कोचिंग, फिर परीक्षा, फिर रिज़ल्ट का इंतज़ार। उसके बाद पाँच-साढ़े पाँच साल की पढ़ाई। फिर नौकरी की तलाश। तब तक उम्र तीस के आसपास और जेब लगभग खाली।

इधर हमारी यूनिवर्सिटी में पूरा कोर्स केवल 7 से 10 दिन, और विशेष परिस्थितियों में 26 दिन का।

फीस?

बस एक बैनर…

कुछ बुलंद नारे…

और कैमरे के सामने जोशीला चेहरा।

जैसे—

“हमारी माँगें पूरी करो!”

“इस्तीफा दो!”

“व्यवस्था बदलो!”


रिज़ल्ट की गारंटी

प्रवेश के तीसरे दिन ही आपका चेहरा किसी न किसी टीवी चैनल की ब्रेकिंग न्यूज़ में दिखाई देगा।

कुछ डिजिटल प्लेटफॉर्म आपको “युवा क्रांतिकारी” घोषित कर देंगे।

सोशल मीडिया पर फॉलोअर्स बढ़ेंगे।

और यदि किस्मत अच्छी रही तो किसी राजनीतिक दल की नज़र भी आप पर पड़ सकती है।


प्लेसमेंट सेल सबसे मजबूत

हमारे पूर्व छात्रों का रिकॉर्ड देख लीजिए।

आंदोलन से राजनीति तक, मंच से विधानसभाओं तक और कैमरे से सत्ता के गलियारों तक पहुँचने वाले अनेक चेहरे समय-समय पर देश ने देखे हैं।

इसलिए हमारा दावा है—

“डिग्री लो, पहचान पाओ।”


हमारे प्रोफेसर कौन हैं?

वर्षों से धरना-प्रदर्शन का अनुभव रखने वाले विशेषज्ञ।

नारे बनाने वाले प्रशिक्षक।

मीडिया मैनेजमेंट के जानकार।

और सोशल मीडिया पर ट्रेंड चलाने वाले डिजिटल योद्धा।


सिलेबस

  • प्रभावशाली नारेबाजी
  • धरना प्रबंधन
  • मीडिया बाइट देने की कला
  • कैमरे के सामने भावुक होने का अभ्यास
  • सोशल मीडिया ट्रेंडिंग
  • पुलिस बैरिकेड पहचानना
  • भूख हड़ताल का प्रायोगिक प्रशिक्षण

डिग्री के बाद करियर

डिग्री मिलते ही अवसरों की कमी नहीं।

किसी राजनीतिक दल में जगह मिल सकती है।

किसी संगठन का राष्ट्रीय प्रवक्ता बन सकते हैं।

यूट्यूब चैनलों पर बहस के नियमित अतिथि बन सकते हैं।

और यदि लोकप्रियता बढ़ गई तो चुनावी टिकट भी दूर नहीं।


हमारा संदेश

कोचिंग पर लाखों खर्च क्यों करना?

इतनी किताबें क्यों पढ़ना?

जब कैमरा, माइक और पोस्टर भी पहचान दिला सकते हैं!

आइए…

जंतर-मंतर विश्वविद्यालय में प्रवेश लीजिए।

यहाँ फेल होने का डर नहीं।

जितने दिन धरना, उतनी बड़ी पहचान।

जितनी लंबी भूख हड़ताल, उतनी लंबी चर्चा।


विशेष सूचना

प्रवेश के लिए आवश्यक दस्तावेज़

  • एक जोशीला भाषण
  • एक बैनर
  • कैमरे के सामने आत्मविश्वास
  • और व्यवस्था परिवर्तन का अटूट उत्साह

बाकी व्यवस्थाएँ… परिस्थितियों के अनुसार होती रहेंगी!


(यह रचना एक व्यंग्य है। इसका उद्देश्य समकालीन सामाजिक-राजनीतिक प्रवृत्तियों पर साहित्यिक कटाक्ष करना है, न कि किसी व्यक्ति, संस्था या समूह के संबंध में तथ्यात्मक निष्कर्ष प्रस्तुत करना।)

– डॉ. बालाराम परमार ‘हँसमुख’

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