कवि/लेखक
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क्या रूढ़ियों की रक्षा ही संस्कृति है? विवेकानंद, नारी स्वतंत्रता और मनुस्मृति पर बड़ा विमर्श
मनुस्मृति के एक श्लोक से शुरू हुई बहस आखिर संस्कृति और रूढ़ि के अंतर तक कैसे पहुंचती है? विवेकानंद के…
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मत भागो पश्चिम की ओर : भारतीय संस्कृति, स्वभाषा और स्वदेशी चेतना का काव्य-संदेश
कवि अमृत चौहान की कविता "मत भागो पश्चिम की ओर" भारतीय संस्कृति, स्वदेशी विचार, हिंदी भाषा और सनातन मूल्यों के…
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मैं विद्रोही : अन्याय के विरुद्ध जनचेतना का घोष करती कवि गोपाल केसर मालवीय की ओजस्वी कविता
"मैं विद्रोही" केवल कविता नहीं, बल्कि अन्याय, शोषण और सामाजिक असमानता के विरुद्ध जनचेतना का सशक्त स्वर है। कवि गोपाल…
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जंतर-मंतर विश्वविद्यालय: BA in आंदोलन | राजनीति और आंदोलन संस्कृति पर तीखा व्यंग्य
क्या आंदोलन अब करियर बन गया है? पढ़िए डॉ. बालाराम परमार 'हँसमुख' का समसामयिक राजनीतिक व्यंग्य, जो शिक्षा, राजनीति और…
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अरे शोषकों… : श्रम, शोषण और सामाजिक विषमता पर करारा प्रहार करती कवि गोपाल केसर की ओजस्वी कविता| साहित्य विशेष | जनमत जागरण
"अरे शोषकों..." केवल कविता नहीं, बल्कि मेहनतकश समाज की पीड़ा और अन्याय के विरुद्ध उठी एक सशक्त साहित्यिक आवाज़ है।
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भारतीय ज्ञान परंपरा: केवल अतीत का गौरव नहीं, भविष्य का मार्गदर्शन
डॉ. बालाराम परमार ‘हँसमुख’ सेवानिवृत्त प्राचार्य, केन्द्रीय विद्यालय संगठन।सदस्य, विद्या भारती (मध्य क्षेत्र – मध्यप्रदेश-छत्तीसगढ़)। सदस्य, मध्यप्रदेश पाठ्यपुस्तक निर्माण एवं…
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“14 अप्रैल: जयंती से आगे—क्या हम अंबेडकर के विचारों को जीवन में उतार पा रहे हैं?”✍️ डॉ बालाराम परमार
✍️ 14 अप्रैल केवल एक जयंती नहीं, बल्कि आत्ममंथन का अवसर है।डॉ. भीमराव अंबेडकर को सच्ची श्रद्धांजलि उनके विचारों को…
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कोटा में काव्य संग्रह ‘रिश्ते’ का भव्य लोकार्पण: पारिवारिक मूल्यों पर आधारित 108 कविताओं का संकलन बना आकर्षण
विश्व जल दिवस पर कोटा में आयोजित समारोह में हुआ लोकार्पण, साहित्यकारों ने बताया—परिवार से राष्ट्र निर्माण तक की भावनाओं…
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भोजशाला विवाद का निर्णायक मोड़: 1400 बलिदानों के 510 वर्ष बाद न्याय की घोषणा
अंचल का शिक्षा और कला का ऐतिहासिक गौरव : सरस्वती प्रकट स्थल “भोजशाला”🚩 1514 ईस्वी के 1400 हिन्दू बलिदान—510 वर्ष…
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“मीना बाजार” की असलियत: अकबर की अय्याशी से शुरू हुई झूठी परंपरा का सच — क्यों जरूरी है मीना बाजार का पुनर्मूल्यांकन?
मीना बाजार: पुरानी परंपरा का पुनर्मूल्यांकन ✍️ डॉ. बालाराम परमार ‘हंसमुख’ भूमिका – परंपरा या परछाई? भारत की सांस्कृतिक परंपराएँ…
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