लम्पीरोग से बचाव के लिए अभयारण्य के सभी 6000 गोवंश को लगातार 03 दिनों तक औषधीय लड्डू खिलाएं जाएंगे- स्वामी गोपालानंद सरस्वती

जनमत जागरण @ सुसनेर। श्राद्ध मे गोमाता ही एक सशक्त माध्यम है , जिसके माध्यम से पित्रों की तृप्ति होती है विगत दिनों पित्रों के श्राद्ध कर्म करने के स्थान, श्राद्ध करने योग्य पात्र कौन कौन हो सकते है उसकी विस्तृत जानकारी में बताया और आज की कथा में बताया कि श्राद्धकर्म के लिए किन विप्रो के माध्यम से श्राद्धकर्म कर सकते है उसके बारे में बताते हुए कहां कि महाभारत में भीष्म जी ने युद्धिष्टर को बताया है कि देवकार्य में भले ही ब्राह्मण की परीक्षा न लो तो भी चलेगा पर श्राद्ध में तों विप्र / ब्राह्मण की पात्रता मुख्य है और श्राद्ध में तो पूर्ण पवित्र वेदवेत्ता ब्राहाण को ही बुलाना चाहिए नहीं तो समय व द्रव्य दोनों ही व्यर्थ हो जाते है,क्योंकि देवकार्य में तो किसी भी कार्य को सिद्ध देवता ही करतें है पर शश्राद्ध में तो योग्य विप्र के माध्यम से पितृ को संतुष्ट। किया जाता है, इसलिये गोप्रेमी व वेदवेत्ता ब्राहाण की श्राद्ध हेतु महत्ती आवश्यकता है और अगर अधिक वेदवेत्ता विप्र देवता न भी मिल पाये तो कम सें कम एक पात्र विप्र अवश्य लाएं ताकि श्राद्ध के माध्यम से पूरे कुल का कल्याण हो जाएं और ऐसा विप्र सैकडो किलोमीटर दूर भी है तो भी उन्हें ही बुलाना चाहिए।
🚩 विप्र की क्या योग्यता होनी चाहिए अनुशासन पर्व में भीष्म बताते है कि अगर विप्र पात्र होता है तो श्राद्ध में कव्य पितृ तक जाते हैं क्योंकि ब्राह्मण और धेनु एक ही वृक्ष की दो शाखाएं हैं और ब्राह्मण को पात्र बनाने वाली मूलरूप से गोमाता ही है अर्थात जिस प्रकार विप्र अपने मुख से मंत्र प्रकट करके पितृ देवों को बुलाते है- तो गोमाता सब गव्य देकर कव्य को गांव से प्रकट करती है यानि दधि, दुध व घृत व शुद्ध अन्न गोमाता ही दे सकती है- तथा गव्यों को पकाकर श्राद्ध हेतु श्रेष्ठतम कव्य बनाया जाता है और जब धेनु एवं विप्र की शक्ति मिल जाती है तो तर्पण,यज्ञ सभी का फल मिल जाता है। ऋषि मुनियों ने जो विधि बताई है, विप्र मुख से जब यह विधि प्रगट होती है तो पितृ तृप्त हो जाते है उदाहरणार्थ जिस प्रकार अनेक गोवों के बीच बछड़ा अपनी माँ को ढूढकर दुग्धपान कर लेता है,वैसे ही विप्र का आश्रय पाकर विप्रो के मुख से पितृ तृप्त होते है । क्योंकि पितृ वायु रूप में रहते है तथा विप्र मुख के माध्यम से जो श्राद्ध का भोजन पाते हैं पितृ उसे सहज प्राप्त करते है ।
🚩 स्वामीजी ने बताया कि लम्पी रोग पुनः देशभर में पैर पसार रहा है और लम्पी रोग की रोकथाम के लिए अजवायन,कालीमिर्च,हल्दी एवं गोमाता के घृत से बने लड्डू गोमताओं के खिलाएंगे तो गोमाताए लम्पीरोग से मुक़ाबला कर पाएगी और उन्हे लम्पीरोग नहीं सताएगा और गो अभयारण्य के सभी 6000 गवंश को लगातार 3 दिनों तक उक्त औषधियों से बने लडडू प्रत्येक गोमाताओ को खिलाएंगे जाएंगे साथ ही देशभर के सभी गो प्रेमियों से आह्वान किया कि जो जो भी निराश्रित गोवंश है उन्हें लम्पीरोग से रोकथाम के लिए उपर्युक्त ओषधी के लड्डू गोमाताओ को खिलाएं । स्वामीजी ने बताया कि घर की एवं गौशालाओं की गोमाताओ को तो उनको संभालने वाले औषधीय लड्डू खिला देंगे लेकिन जो सड़कों पर निराश्रित गोवंश घूम रहा है उन्हें हम सब मिलकर लम्पीरोग से बचाने में सहयोग करेंगे तो इससे बढ़कर इस श्राद्ध पक्ष में और कोई पुण्य कार्य हो ही नही सकता।

⏩ 172 वें दिवस पर अतिथी सुसनेर के भू- निरीक्षक गौरीशंकर शर्मा, ननोरा पटवारी प्रहलाद मालवीय एवं सुसनेर तहसील के प्रशिक्षु पटवारी रामकुमार दीक्षित एवं भेरुलाल शर्मा गणेशपुरा उपस्थित रहें ।

⏩172 वे दिवस पर चुनरी यात्रा मध्यप्रदेश के देवास से :: एक वर्षीय गोकृपा कथा के 172 वें दिवस पर मध्यप्रदेश के देवास जिले की सोनकच्छ तहसील के जामगोद ग्राम से श्रीमति आभा तिवारी के परिवार की और से अपने देश, राज्य एवं ग्राम, नगर के जन कल्याण के लिए गाजे बाजे के साथ भगवती गोमाता के लिए चुनरी लेकर पधारे और कथा मंच पर विराजित भगवती गोमाता को चुनरी ओढ़ाई एवं गोमाता का पूजन कर स्वामी गोपालानंद सरस्वती महाराज से आशीर्वाद लिया और अंत में सभी ने गो पूजन करके यज्ञशाला की परिक्रमा एवं गोष्ठ में गोसेवा करके सभी ने गोव्रती महाप्रसाद ग्रहण किया।



