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दिव्य अलौकिक गोकथा: दुर्गाष्टमी, नवमी पर गोबरपीठ से देश के सभी सनातनियों से स्वामी जी ने क्या किया आग्रह : पढ़ें यह ई-रिपोर्ट

🚩 दुर्गाष्टमी, नवमी पर मां को पशुबलि के बजाय गो दुग्ध से निर्मित खीर का भोग लगाएं – स्वामी गोपालानंद सरस्वती

जनमत जागरण @ सुसनेर। स्वामीजी ने गो कृपा कथा की गोबर पीठ से देश के सभी सनातनियों से आग्रह किया कि शारदीय नवरात्रि की अष्टमी को अनेक देवी स्थानों पर पशुबलि देने की परम्परा है , पशुबलि देने वालों से मैं आग्रह करता हूं कि मां स्वयं सतोगुणी है उन्हें केवल गोमाता के पंचगव्य से निर्मित प्रसाद अथवा नारियल का ही भोग लगता है वह मांस भक्षणी नहीं है मुगल आतताईयो के चंगुल में पथभ्रष्ट हुए कुछ जीभ के चाटुकारों ने अपनी स्वार्थ पूर्ति के लिए पशु बलि जैसी प्रथा रूपी एक षड्यंत्र रचा है । इसलिए हमें उनके इस षड़यंत्र से बचना चाहिए और हां आपको लगता हैं कि पशु नहीं चढ़ाएंगे तो मां नाराज हो जाएगी तो वे लोग देवी के मंदिर पर बलि देने वाले पशु को वही बिना वध किए छोड़ आएं तो मां उन भक्तों की सभी मनोकामनाएं पूर्ण करेगी क्योंकि पशुबलि का केवल प्रेत आत्मा ही भोग चढ़ाती है और उसके बदले वे आपके परिवार से सभी कष्ट बाधाएं हरण कर लेगी क्योंकि मां तो ममता की मूर्ति है वह किसी के वध करने से प्रसन्न थोड़े होती है और आप इस पाप से बचेंगे तो मां आप पर खूब कृपा करेगी , इसलिए संकल्प लीजिए कि इस बार पशु बलि मां के नाम नहीं करेंगे । उक्त बातें एक वर्षीय वेदलक्षणा गो आराधना महामहोत्सव के 183 वे दिवस के अवसर पर श्रोताओं को सम्बोधित करते हुए स्वामी गोपालानंद सरस्वती महाराज ने कही।

📘 आज के दिन का इतिहास:: 31 जुलाई 1880 को जन्में  हिंदी-उर्दू के सबसे अधिक लोकप्रिय उपन्यासकार, कहानीकार और विचारक मुंशी प्रेमचन्द जी की आज पुण्यतिथि है। 08 अक्टूबर 1936 को उनका निधन हो गया था। 8 अक्टूबर की तारीख इतिहास में धनपत राय श्रीवास्तव की पुण्यतिथि के तौर पर दर्ज है,लेकिन लोगों को यह नाम कुछ अनजाना सा लग सकता है, परन्तु अगर कहें कि आठ अक्टूबर 1936 को मुंशी प्रेमचंद का निधन हुआ तो कलम के जादूगर को हर कोई पल में पहचान जाएगा। 

🚩दानियों की पुण्य धरा राजस्थान का मारवाड़ :: करणी माता की त्रि -दिवसीय प्रकटीकरण कथा के प्रथम दिवस पर पूज्य स्वामीजी ने बताया पूरे भारत में मारवाड़ी जैसा कोई धार्मिक प्रवृत्ति के लोग नही है भारत के धार्मिक मंदिरों, हॉस्पिटल,विद्यालयों एवं गौशालाओं में गोमाता के लिए सबसे अधिक दान देने वाले मारवाड़ी ही है अर्थात देश में गोमाता के नाम देने वालों में 80% भूमिका केवल मारवाड़ियो की ही है और बाकि 20% अन्य लोग । और दानियों की पुण्य धरा राजस्थान के मारवाड़ के पांच पीरों में से एक मेहाजी मांगलिया द्वारा मेहाजी चारण को प्रदत सुवाप गांव में मेहाजी चारण की धर्म पत्नी देवल देवी के गर्भ से आश्विन शुक्ल सप्तमी, शुक्रवार, वि. सं. 1444 (28 सितम्बर 1387) को श्री करणी माता का जन्म हुआ। करणी माता को देवी हिंगलाज का अवतार माना जाता है करणी माता चारण जाति की योद्धा मातृशक्ति थी, जिनके बचपन का नाम रिघुबाई था और मां के आशीर्वाद से ही बीकानेर और जोधपुर रियासत की स्थापना हुई थी ।

अतिथि :: दुलीचंद राठौर, अध्यक्ष राठौर समाज झालरापाटन एवं श्री सांवलिया सेठ गोशाला समिति अध्यक्ष, नन्दलाल राठौर संरक्षक राठौर समाज झालरापाटन,गोपाल राठौर उपाध्यक्ष राठौर समाज,, नन्दलाल राठौर पूर्व अध्यक्ष राठौर समाज झालरापाटन, रतन लाल राठौर, उपाध्यक्ष राठौर समाज झालावाड़,, जगदीश दांगी उपाध्यक्ष श्री सांवलिया सेठ गोशाला झालरापटन,अनिल राठौर उपाध्यक्ष व्यापार संघ झालरापाटन एवं सचिव श्री सांवलिया सेठ गोशाला समिति झालरापाटन,एवं बनवारी लाल राठौर कोषाध्यक्ष राठौर समाज, गुमान सिंह पटेल ढाकनी मन्दसौर, शंकर सिंह सरपंच, अर्जुन सिंह, सौदान सिंह, अध्यक्ष, दुग्ध संघ। खेड़ी धर्मशाला, अंदर सिंह एवं गोपी सिंह सरकनिय(झालावाड़) आदि अतिथि उपस्थित रहें ।

183 वे दिवस पर चुनरी यात्रा दिल्ली,राजस्थान एवं मध्यप्रदेश से :   एक वर्षीय गोकृपा कथा के 183 वें दिवस पर श्री गोपाल गो रक्षा दल उपाध्यक्ष वीरेन्द्र सिंह भदौरिया नई दिल्ली, श्रीगोधाम महातीर्थ पथमेड़ा के मुख्य गो चिकित्साधिकारी डॉ. नरेन्द्र सिंह एवं मध्ययप्रदेश के हरदा जिले  के टेमा गांव में स्थित सतपुड़ा गो गोअभयारण्य से दिनेश  मालाकार एवं राजस्थान के झालावड जिले के पिडावा नगर से श्रीमती आभा शर्मा, कुशाल शर्मा , शिल्पा शर्मा एवं दियान शर्मा   आदि ने अपने परिवर  की और से सम्पूर्ण  देश, राज्य एवं ग्राम, नगर  के जन कल्याण के लिए गाजे बाजे के साथ भगवती गोमाता के लिए  चुनरी लेकर पधारे और कथा मंच पर विराजित भगवती गोमाता को चुनरी ओढ़ाई एवं गोमाता का पूजन कर स्वामी गोपालानंद सरस्वती महाराज से आशीर्वाद लिया और अंत में सभी ने गो पूजन करके यज्ञशाला की परिक्रमा एवं गोष्ठ में गोसेवा करके सभी ने गोव्रती महाप्रसाद ग्रहण किया। 

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