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“गांधी-अंबेडकर: आदर्शों की राजनीति या सत्ता का साधन?” “गांधी और अंबेडकर के नाम पर राजनीति: कब तक?”

महात्मा गांधी और डॉ भीमराव अम्बेडकर को सत्ता प्राप्ति का साधन न बनाएं तो अच्छा है !!
✍️ डॉ बालाराम परमार 'हॅंसमुख'

जनमत जागरण @ आपके लेख::
आजादी के अमृत उत्सव काल में भारतीय समाज 'एकता के सूत्र में बंधे और तरक्की करे' , ये विचार महात्मा गांधी और डॉ भीमराव अम्बेडकर के ही हैं। परन्तु राजनीति के लोग इनकी राष्ट्र निर्माण दृष्टि एवं समाज कल्याण संरचना को समझे बिना इनके नाम पर रोटियां सेंकने में लगे हैं। भारतीय समाज में भिन्नता एक सच्चाई है। समाज में एकता का चिंतन एक समान नहीं है । समाज के कर्णधार की मन: स्थिति और समाज सुधार विचार भी समान नहीं है । परिस्थितियां समान होने पर भी समाज सुधारक रास्ते भटक गये हैं । इस्लाम के मानने वाले अलग तरीके से धर्मनिरपेक्षता,समता और समरसता की चर्चा करते हैं। ईसाई धर्मावलंबी की अपनी मान्यता है। बाबा की 'शिक्षित बनो', संगठित बनो और संघर्ष करो' की शिक्षा और संदेश आजादी के 75 साल बाद भी साकार रूप नहीं ले पाए हैं। डॉ भीमराव अम्बेडकर और महात्मा गांधी की विचारधारा को स्वतंत्रता और संविधान के प्रकाश में समाज सुधार और सामाजिक एकता लाने की दिशा में राजनीतिक दलों के प्रयास में कितनी सच्चाई है, इस पर कलमकारों और मतदाताओं को गंभीरता से विचार करने की जरूरत है।
प्रश्न है- संविधान में संशोधन होना चाहिए अथवा नहीं होना चाहिए ? आजादी के 75 साल बाद सामाजिक, धार्मिक, आर्थिक , राजनीतिक एवं सांस्कृतिक मूल्य क्या हो । बदलते वैश्विक परिदृश्य के अनुरूप संवैधानिक प्रावधान क्या होना चाहिए ? धार्मिक कट्टरता, भाषाई भिन्नता और राजनीतिक सोच में भिन्नता के आलोक में इसका उत्तर सरल नहीं है ? हो भी नहीं सकता ? कठिन इसलिए भी है कि भारतीय राजनीति की सत्ता प्राप्ति को लेकर दिशा लड़खड़ाने लगी है। राजनीतिक दलों के आकाओं का अहंकार सातवें आसमान पर चढ़ कर बोल रहा है। अमृत उत्सव काल में राजनीतिक नैतिकता और विपक्ष की समन्वय चेतना शुन्य हो चुकी दिखाई देती है। राहुल गांधी की भारत जोड़ो यात्रा और मोहब्बत की दुकान उन्हीं के आचरण से ढकोसला साबित हो रही है। अधिकांश राष्ट्रीय दलों की सोच वर्तमान संवैधानिक सुधार की सोच से मेल नहीं खाती दिखाई दे रही है। वर्तमान राजनीति के ठेकेदार , और राजनीतिक दल के नेता महात्मा गांधी और डॉ भीमराव अम्बेडकर को सत्ता प्राप्ति का साधन मानने से गुरेज नहीं कर रहे हैं। सभी दल महात्मा गांधी और डॉ भीमराव अम्बेडकर के नाम पर अनावश्यक बवाल खड़ा कर रहे हैं। बड़बोले नेता सदन के अंदर और बाहर कार्यपालिका एवं व्यवस्थापिका में आधी अधुरी जानकारी परोस कर वाहवाही लूटने की घिनौना चेष्टा कर रहे हैं। महात्मा गांधी और डॉ भीमराव अम्बेडकर पर अनर्गल टिका- टिप्पणियों से लग रहा है कि राजनीतिक सुचिता ,नैतिकता और समरसता की आशा करना बेईमानी होगी ?
भारतीय संविधान में जितना लिखा है उससे कहीं ज्यादा अलिखित भावना है । यह कहना शायद प्रासंगिक होगा कि "लिखित कम, गुड़ रहस्य ज्यादा है"। नीति निर्देशक तत्व के समावेश की भावना में संविधान निर्माताओं के 'भारत - भविष्य' चिंतन में प्रत्येक भारतीय को डुबकी लगानी होगी। धर्म, जाति, भाषा, लिंग और स्थान से परे 'भारत- भविष्य' चिंतन को मूर्त रूप में समझना होगा। तब कहीं जाकर सपना पूरा होगा गांधी- अंबेडकर के भारत का।
माने या न माने, गांधी जी आजादी का प्रतीक हैं और रहेंगे। इसी तरह अंबेडकर जी संविधान की आत्मा हैं और रहेंगे । इन दोनों हूतात्मा का दुर्भाग्य देखिए कि इनकी विचारधारा को मानने वाले ही अपमान कर रहे हैं और दूध का धुला निरूपित करने की दृष्टि से "मान- अपमान" का ढिंढोरा पीट कर इन्हें राजनीतिक सत्ता पाने का साधन बना रखा है। जबकि ये महापुरुष संविधान और आजादी के "साध्य" हैं', सत्ता प्राप्ति के साधन नहीं है"। आजादी के अमृत उत्सव काल में नागरिकों को समझना होगा कि हर कहीं छोटी-छोटी बातों में गांधी- अंबेडकर लाना ठीक नहीं है। अंबेडकरवादी और गांधीवादी दोनों ही सोच के लोग उनके नाम का दुरुपयोग कर सत्ता हासिल करने की होड़ में जघन्य अपराध कर रहे हैं। गांधी और अंबेडकर के नाम पर लाभ के लिए रोज उनके जीवन दर्शन को धूमिल करने में लगे हैं ?
अंबेडकरवादी विचारधारा को लेकर राजनीतिक नेताओं, सामाजिक कार्यकर्ताओं एवं साहित्यकारों ने अति कर रखी है। बाबा साहब के जीवन दर्शन एवं राष्ट्र सेवा के चिंतन का इतना अधिक पोस्टमार्टम किया जा रहा है कि उनकी आत्मा कांप रही होंगी। दोनों की विचारधारा पर बनी पार्टियों ने केवल उनके फोटो का उपयोग किया है। उनकी शिक्षा को आत्मसात नहीं किया गया है। उनकी राष्ट्र एवं समाज कल्याण सोच, सिद्धांत एवं शिक्षा तार-तार हो रही है।
अंबेडकरवादी चंद्रशेखर आजाद 'रावण' ने 'भीम आर्मी' बना डाली और अनुयायीयों ने आपत्ति नहीं उठाई ? 'भारत रत्न बाबा साहब' के नाम का इस तरह दुरुपयोग चिंतनीय एवं निंदनीय है। अरविंद केजरीवाल और ओवैसी जिनका अंबेडकर विचारधारा से दूर दूर तक कोई लेना देना नहीं है । फिर भी उनकी पार्टी के बैनर पर उनका फोटो लगाकर घोर पाखंड कर रहे हैं ।
सच्चे अंबेडकरवादी की निगाह में अक्षम्य अपराध है ।

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