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एक्सक्लूसिव रिपोर्टदेशमध्यप्रदेशसम्पादकीय

एक्सक्लूसिव : 2 दिन, 4 हादसे, 3 मौतें और 25 घायल – आखिर कब तक? ” NH552G पर हादसों का कहर और आर्थिक सहायता में भेदभाव : आखिर जिम्मेदार कौन?”

▪️नेशनल हाईवे 552G पर हादसों का कहर: कौन जिम्मेदार?▪️2 दिन, 4 हादसे, 3 मौतें और 25 घायल - आखिर कब तक?▪️"नेशनल हाईवे 552G पर मौत का सफर: क्या अंधे मोड़ और प्रशासनिक लापरवाही जिम्मेदार?"

जनमत जागरण@ संपादकीय डेस्क ।
रफ्तार की लापरवाही, सड़कों की खामियां, और प्रशासनिक उदासीनता – ये तीनों मिलकर नेशनल हाईवे 552G को एक मौत के जाल में तब्दील कर चुके हैं। दो दिनों में चार दर्दनाक हादसों ने तीन परिवारों की खुशियां छीन लीं और दर्जनों लोगों को घायल कर दिया। हर टक्कर के साथ न केवल गाड़ियों के हिस्से टूटे, बल्कि सपने, रिश्ते और जिंदगी भी बिखर गई। ये हादसे सिर्फ आंकड़े नहीं हैं, बल्कि उन चीखों का गवाह हैं जो कभी दोबारा हंसने का मौका नहीं पाएंगी। सवाल उठता है, कब तक सड़कें खून से लाल होती रहेंगी? और कब तक हमारी संवेदनाएं सरकार की प्राथमिकताओं के नीचे कुचलती रहेंगी?
झालावाड़ से उज्जैन तक फैला नेशनल हाईवे 552G पिछले दो दिनों में हादसों का अड्डा बन चुका है। मात्र 48 घंटों में चार बड़ी दुर्घटनाओं ने 3 लोगों की जान ले ली और 25 लोगों को घायल कर दिया।

आखिरी 48 घंटों की घटनाएं:
1. पगारिया टोल प्लाजा: सोमवार शाम, दो बाइकों की टक्कर। एक बाइक में आग लग गई। गंभीर रूप से घायल ऋतुराज को जिला अस्पताल रेफर किया गया।
2. अमरकोट: रविवार रात, दो बाइकों की भिड़ंत। मनोहर की मौत, कालूसिंह गंभीर रूप से घायल।
3. राधास्वामी सत्संग के समीप: सोमवार, कार और पिकअप की भिड़ंत। दो मौतें, चार घायल।
4. इंदौर-कोटा हाईवे पर स्लीपर कोच बस दुर्घटना: रविवार सुबह, 17 लोग घायल, दो की हालत गंभीर।

इन हादसों में एक पैटर्न उभरता है—अंधे मोड़, सड़क निर्माण में तकनीकी खामियां और यातायात नियमों की अनदेखी। सवाल यह उठता है कि क्या नेशनल हाईवे पर सफर करना मौत को न्योता देने के बराबर है?▪️सरकार और प्रशासन की उदासीनता इन हादसों के पीछे तकनीकी खामियां और प्रशासनिक लापरवाही स्पष्ट हैं। खराब सड़कों, गलत डिज़ाइन और अंधे मोड़ों की वजह से यह हाईवे हादसों का गढ़ बनता जा रहा है। समाधान की जरूरत▪️हाईवे की पुनर्रचना: तकनीकी खामियों को दूर किया जाए। अंधे मोड़ों पर संकेतक और स्पीड ब्रेकर लगाए जाएं।▪️यातायात जागरूकता अभियान: स्थानीय और राष्ट्रीय स्तर पर लोगों को यातायात नियमों का पालन करने के लिए शिक्षित किया जाए।

"आर्थिक सहायता में दोहरा मापदंड: क्या हादसों की कीमत सरकार की प्राथमिकताओं पर निर्भर?"आर्थिक सहायता में भेदभाव: क्यों दोहरे मापदंड?

आर्थिक सहायता में सरकार का भेदभाव पीड़ित परिवारों के जख्मों पर नमक छिड़कने जैसा है। एक हादसे में मृतकों के परिजनों को लाखों की सहायता और घायलों को सांत्वना दी जाती है, जबकि दूसरे हादसे में पीड़ितों को नजरअंदाज कर दिया जाता है। क्या मानव जीवन की कीमत घटना की जगह और प्रचार पर निर्भर करती है? ऐसी असमान नीतियां सरकार की संवेदनशीलता और न्यायप्रियता पर सवाल खड़े करती हैं।
मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव ने आगर-उज्जैन मार्ग पर हुए हादसे में मारे गए दो लोगों के परिजनों को 2-2 लाख रुपये और घायलों को 50-50 हजार रुपये की सहायता की घोषणा की। उन्होंने मृतकों के लिए शोक जताते हुए प्रशासन को घायलों की हरसंभव मदद करने के निर्देश भी दिए।
लेकिन सवाल यह उठता है कि पगारिया टोल प्लाजा और अमरकोट में हुई दुर्घटनाओं में मृतकों और घायलों को ऐसी ही सहायता क्यों नहीं मिली? क्या हाईवे के अलग-अलग हिस्सों पर हुई दुर्घटनाओं में पीड़ितों के लिए सरकार का नजरिया भी अलग हो जाता है?
▪️भेदभाव का कारण क्या है?
संवेदनहीनता या प्रशासनिक चूक: मुख्यमंत्री की संवेदनशीलता केवल बड़े हादसों तक सीमित है या प्रशासन ने इस मुद्दे को अनदेखा कर दिया है? सरकार से सवाल: क्या सड़क पर हुई हर मौत समान नहीं है? , क्या हर पीड़ित को समान संवेदना और सहायता नहीं मिलनी चाहिए? प्रशासन कब तक हादसों को नियति मानकर छोड़ता रहेगा? ।

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