कवि/लेखकइंदौरदेशमध्यप्रदेशस्पेशल रिपोर्ट

“समय की कसौटी पर लोकसाहित्य: अतीत की विरासत या भविष्य की अनिवार्यता? क्या लोकसंपृक्त साहित्य ही समाज का भविष्य तय करेगा?”- श्री हेमंत मुक्तिबोध का दृष्टिकोण”

◾विचार मंथन के नये संकल्प के साथ नर्मदा साहित्य मंथन के अहिल्या पर्व का समापन -
◾"संवाद से समाधान तक: जानिए नर्मदा मंथन क्या क्या निकले संदेश"
◾ नर्मदा मंथन से निकला संदेश"लोकमंगल और लोकरंजन के लिये लोकसंपृक्त साहित्य की शाश्वत आवश्यकता है : श्री हेमंत मुक्तिबोध

जनमत जागरण न्यूज नेटवर्क इन्दौर । विश्व संवाद केन्द्र मालवा द्वारा आयोजित नर्मदा साहित्य मंथन के चतुर्थ सोपान अहिल्या पर्व का समापन देवी अहिल्या विश्वविद्यालय के सभागृह में संपन्न हुआ। देवी अहिल्या विश्वविद्यालय और कालिदास अकादमी के सहप्रायोजकत्ल में आयोजित नर्मदा साहित्य मंथन के विभिन्न सत्रों में पच्चीस से अधिक पुस्तकों का विमोचन हुआ । मालवा-निमाड के विभिन्न नगरों और गाँवों से साहित्यानुरागी, विचारक, चिंतक, शोधार्थी और अध्येता इस नर्मदा साहित्य मंथन में सम्मिलित हुए। विचार मंथन के नये संकल्प के साथ नर्मदा साहित्य मंथन के अहिल्या पर्व का समापन हुआ । “संवाद से समाधान तक: जानिए नर्मदा मंथन पर विभिन्न वक्ताओं के उद्बोधन से क्या क्या निकले संदेश”

प्रथम सत्र ::   समापन सत्र के प्रथम चरण में "पत्रकारिता के भारतीय तत्व" विषय पर आयोजित परिचर्चा में वरिष्ठ पत्रकार श्री जयदीप कर्णिक और श्री अमिताभ अग्निहोत्री ने अपने विचार साझा किए। 🔹 पत्रकारिता: सनातन मूल्य और सत्य की साधना :: परिचर्चा में वक्ताओं ने भारतीय संस्कृति और पत्रकारिता के आपसी संबंधों पर प्रकाश डालते हुए कहा कि भारत केवल एक भूखंड नहीं, बल्कि आत्म तत्व का प्रतिबिंब है। भारत की आत्मा से जुड़कर ही यहां की पत्रकारिता अपने वास्तविक स्वरूप को प्राप्त कर सकती है।
👉श्री जयदीप कर्णिक ने कहा—"इस देश की संस्कृति को अज्ञानी समझे जाने वाले आम लोग ही जीवित रखते आए हैं। सिर पर गठरी रखकर कुंभ में पहुंचने वाला श्रद्धालु ही इस संस्कृति के प्रवाह का वास्तविक कारक है।"
👉वहीं, श्री अमिताभ अग्निहोत्री ने पत्रकारिता के मूल सिद्धांतों पर प्रकाश डालते हुए कहा—"पत्रकारिता कोई सहज कार्य नहीं, यह एक साधना है। जो इसे साध लेता है, वही इसे सच्चे अर्थों में जी सकता है। पत्रकार हर पल परीक्षा में खड़ा होता है, क्योंकि सत्य की खोज और उसे निर्भीकता से प्रस्तुत करना ही उसका धर्म है।"
अंत में यह निष्कर्ष निकला कि भारतीय पत्रकारिता को सनातन मूल्यों से निरपेक्ष नहीं किया जा सकता। पत्रकारिता केवल सूचना का माध्यम नहीं, बल्कि समाज के विवेक को जागृत करने का साधन भी है। इस परिचर्चा ने भारतीय पत्रकारिता के गहरे तत्वों पर प्रकाश डालते हुए यह संदेश दिया कि "साधना, सत्य और सतत परीक्षा ही इसकी पहचान है।"

द्वितीय सत्र :: नर्मदा परिक्रमा पर मूर्धन्य लेखक श्री अशोक जमनानी ने भावपूर्ण संवाद में नर्मदा परिक्रमा के आध्यात्मिक एवं सामाजिक महात्मय् के साथ नर्मदा के पर्यावरणीय महत्व, लोकजीवन और लोक में नर्मदा के महत्व पर चर्चा की।

तृतीय सत्र :: इतिहास लेखन के इतिहास सत्र में श्री श्रीकृष्ण श्रीवास्तव ने भारतीय इतिहास लेखन की त्रुटियों और उसके दुरगामी परिणामों की व्याख्या करते हुए भारतीय इतिहास के प्रामाणिक स्रोतों का उद्घाटन किया।

चतुर्थ सत्र :: भारतीय ज्ञान परंपरा और विविध दृष्टिकोण विषय पर संवाद सत्र में श्री एम एस चैत्रा ने मैकॉले शिक्षा पद्घति द्वारा भारतीय ज्ञान परपंरा को प्रतिस्थापित करने के षड्यंत्रों को स्पष्ट किया एवं जीवन को आनन्द प्रदान करने वाली भारतीय ज्ञानपरंपरा को स्थापित करने एवं शोध की आवश्यकता पर बल दिया।

समापन सत्र में आशीर्वचन :: नर्मदा साहित्य मंथन के समापन सत्र में वरिष्ठ साहित्यकार श्री श्रीराम परिहार ने अपने आशीर्वचन में ज्ञान और कर्म के समन्वय की भारतीय परंपरा में संवाद और मंथन की पद्धति को प्रतिपादित किया।आपने लोक मंगल के साहित्य की व्याख्या और प्रसार में नर्मदा साहित्य मंथन के प्रयासों को रेखांकित किया। भारत के पुनर्निर्माण के लिये अपनी मिट्टी से जुड़ने का आग्रह किया।

समापन सत्र में मुख्य वक्ता उद्बोधन:: राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के मध्य क्षेत्र सह कार्यवाह श्री हेमंत मुक्तिबोध ने विचार शून्यता का दौर में नर्मदा साहित्य मंथन की सार्थक भूमिका की सराहना की। विचार विविधता की स्वीकृति और विचारों की विभिन्नता के आदर की संवाद परंपरा का ही विस्तार नर्मदा साहित्य मंथन है। हर प्रकार के विचार को सुनने और वैचारिक पाचन शक्ति बढ़ाने के लिये नर्मदा साहित्य मंथन हमारी संवाद का परंपरा है। भगवान श्रीकृष्ण ने गीता में संवाद के द्वारा ज्ञान-भक्ति और कर्म का संदेश देने पश्चात भी अपने विचार को मानने के लिये बाध्य नहीं किया। आपने लोकमंगल की कामना करने वाले साहित्य की अधिकाधिक रचना और समाज में प्रचार-प्रसार के लिये साहित्य मंथन जैसे कार्यक्रमों को प्रोत्साहित करने पर बल दिया। बहुजन हिताय के लिये लोकमंगल और लोकरंजन के लिये लोकसंपृक्त साहित्य की रचना समय की आवश्यकता है।

🚩द्वितीय दिवस नर्मदा साहित्य मथन

क्या नर्मदा साहित्य मंथन से निकले विचार राष्ट्र की नई राह बनाएंगे?” पढ़ें – वैचारिक मंथन में द्वितीय दिवस पर आयें विचारक, चिंतक और साहित्यकारों के नई क्रांति का सूत्रपात करने वाले उद्बोधन

🚩 उद्घाटन समारोह प्रथम दिवस

“राष्ट्र निर्माण में आचार, विचार और अनुभूति: क्या खंडन-मंडन की भारतीय परंपरा आज भी प्रासंगिक है?” – पढ़ें – नर्मदा साहित्य मंथन के चतुर्थ सोपान के उद्घाटन सत्र में बोले संघ के वरिष्ठ प्रचारक श्री सुरेश सोनी

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