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आलेख एवं अनुभव वृत्तांत :: “राष्ट्रीय चेतना और साहित्यिक संवाद का संगम” 👉 भारती के सपूत: एक समागम, एक संवाद – लेखक : गिरधर दान रतनू दासोड़ी

 लेखक परिचय-
🔹 बीकानेर में जन्में चारण साहित्य के सिद्धहस्त हस्ताक्षर की ख्याति एक निबंधकार, समालोचक एवं कहानीकार के रूप में है।
🔹आपने 50 से अधिक राष्ट्रीय-अंतर्राष्ट्रीय संगोष्ठियों में शोधपत्र पढ़े हैं।
🔹प्राचीन राजस्थानी साहित्य संग्रह संस्थान दासोड़ी के आप मानद अध्यक्ष के साहित्यिक सम्मानों से आपको विभूषित किया गया है।
🔹पीथल पुरस्कार, राष्ट्रीय काग बापु पुरस्कार, विद्याधर अलंकरण जैसे 15 से अधिक राष्ट्रीय स्तर
🔹लोकपूज्य चारण देवियों की उत्सर्ग गाथाएँ जैसी 25 से अधिक पुस्तकों के आप लेखक हैं।
🔹 आपने 50 से अधिक राष्ट्रीय-अंतर्राष्ट्रीय संगोष्ठियों में शोधपत्र पढ़े हैं।
"भारती के सपूत: एक समागम, एक संवाद" 
"आलेख एवं अनुभव वृत्तांत"
जनमत जागरण @आपके लेख ::
मित्रों फेसबुक को अमुमन हम आभाषी दुनिया कहते हैं और है भी।इसके माध्यम से बने संबंधों को हम प्राय:कृत्रिम भी मानते और कहते हैं।लेकिन हम भूल जाते हैं कि यहां भी गहन गंभीर प्रवृत्ति के वे लोग भी हैं जो संबंधों को जीवंत रखने में विश्वास रखते हैं। इसीलिए तो स्नेह को सग्गा (संबंधी)कहा गया है।यानी रक्त संबंधों में स्नेह नहीं है तो ,वे ही पराये लगते हैं और स्नेह निजीपन की ठंडक की अनुभूति कराते हैं -
🔹नेह सगा सोई सगा, हाड न सगा होय।
मेरे इस मंच पर ऐसे अनेक मित्र हैं ।
जिनके जीवंत संबंधों से यही अहसास होता है कि -
🔹सस्नेही समंदां परै ,जाण हियै मंझार।
कुस्नेही घर आंगणै ,जाण समंदां पार।।

ऐसे ही मित्र हैं
आदरणीय जयशंकर जी शर्मा ,मालवा प्रांत प्रचार प्रमुख , राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ ।
जो मूलतः मेवाड़ के निवासी हैं।
राजस्थान वन सेवा में चयनित भी हुए लेकिन त्यागपत्र दे दिया।
जब मैं चारण देवियों की गौरव गाथाओं को समाविष्ट करते हुए "आत्मोसर्ग का आलोक" पुस्तक लिख रहा था।तब उनकी टिप्पणियों से उनकी सहजता व स्नेह की अनुभूति हुई थी। जब उज्जैन में आयोज्य कार्यक्रम "सुजलाम" में ,मैं प्रतिभागी के रूप में गया था।तब वे केवल मिलने के लिए इंदौर से उज्जैन आना चाहते थे। पर मैंने उन्हें उनकी व्यस्तता को अनुभूत कर विनम्रता पूर्वक मना कर दिया था। लेकिन संपर्क सतत और प्रगाढ़ बना रहा।
अभी आपने ३१जनवरी २५-२फरवरी २५को आयोज्य विश्व संवाद केंद्र मालवा और पत्रकारिता एवं जनसंचार अध्ययन शाला अदेविवि इंदौर द्वारा आयोजित प्रतिष्ठित साहित्योत्सव, नर्मदा साहित्य मंथन चतुर्थ सौपान ,अहिल्या पर्व में मेरे जैसे गांवेड़ू और साधारण व्यक्ति को बतौर वक्ता के रूप में आमंत्रित किया। तब मैं और मेरे परम मित्र व अनुजवत महेंद्रसा ढाढरिया ने इस अविस्मरणीय में सहभागिता की।
जब जयशंकर जी से मिला तो ऐसा लगा कि हम वर्षों से परिचित और आत्मीयजन है।
सहजता,मिलन सारिता, अनौपचारिकता, व गर्मजोशी वरेण्य अनुकरणीय। इस अवसर पर राष्ट्रीय अस्मिता की रक्षार्थ अहर्निश संलग्न मनीषी जो सनातनी संस्कृति और संस्कारों के सिंचन व संवर्धन हेतु प्रण प्राण से समर्पित हैं।जिनके अक्षर अक्षर में एक सुभग संदेश व दिशाबोध समाहित हैं‌।उनका सान्निध्य प्राप्त करने ,मंच साझा करने व संवाद करने का अवसर मिला।इस गरिमामय कार्यक्रम में वैचारिक प्रतिबद्धता, बौद्धिक जागृति व राष्ट्रीय चिंतन व चेतना के हरावल जत्थे के चिंतकों को सुनने व समझने का सुलभ अवसर मिला।इनकी गिरा गरिमा से परिचित हुआ।
तीन दिवसीय कार्यक्रम में जो राष्ट्र हित में चिंतन और वैचारिक मंथन हुआ वो निश्चित ही राष्ट्रीय चेतना व जन जागरण में अपनी महनीय भूमिका का निर्वहन करते हुए देशभक्ति की दीप्ति का प्रसार करेगा।
सनातनी जीवन मूल्यों के सामने खड़ी आसन्न समस्याओं को सुनकर , समझकर निश्चित ही युवा पीढ़ी में जागृति के भाव आएंगे।
जिन मनीषियों को सुनने का अवसर मिला उनमें राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की राष्ट्रीय कार्यकारिणी के सदस्य आदरणीय सुरेशजी सोनी, चिंतक विचारक श्री श्याम जी मनावत, उज्जैन, जम्मू-कश्मीर के हिंदू विस्थापितों के लिए झकझोरने वाली कलम की धनी क्षमाजी कौल जम्मू, मार्क्सवाद के कुटीलाओं की बारीकियों की गहरी समझ रखने वाले डॉ पवन विजय नई दिल्ली, भारतीय संस्कृति व संस्कारों के लिए संघर्षरत, प्रखर पत्रकार व पूर्व केंद्रीय सूचना आयुक्त, आदरणीय उदयजी माहूरकर ,जिन्होंने OTT की विद्रूपता , कुत्सित मानसिकता व षड्यंत्र का खाका सभागार के समक्ष रख श्रोताओं को चिंतन व चेतना की ओर अग्रसर किया।
इनके साथ ही श्रीरंग पांढेरकरजी,सुश्री भारती जी ठाकुर,नर्मदालय, डॉ गुरुप्रकाशजी पासवान, पटना, जयदीप कर्णिक दिल्ली, माधवेन्द्र सिंहजी भोपाल, लक्ष्मीनारायण जी भाला,नई दिल्ली,अशोकजी जमनानी नर्मदापुरम, श्रीं कृष्णजी श्रीवास्तव भोपाल,विकास जी दुबे भोपाल,अभिताभजी अग्निहोत्री नई दिल्ली, पद्मश्री जगदीशजी जोशीला निमाड़ी साहित्यकार, सहित कई महानुभावों के महत्त्वपूर्ण विचारों से लाभान्वित हुआ।
मुझे भी एक घंटा बोलने का अवसर मिला।मेरा विषय था-हिंदू संस्कृति रक्षण में मातृशक्ति का योगदान।
विषय ,मंच व सभागार पूर्णतया मेरे अनुकूल था।मैंने विभिन्न मनस्विनी महिलाओं के उदाहरण प्रस्तुत किए जिन्होंने अपना समग्र जीवन हिंदू हित रक्षण में जीया। भक्तिमती मीराबाई,महारानी पद्मिनी,रत्नावती भटियाणी, जयवंत दे,भगतांदे,कृष्णावती,सहलदे,जसमादे,के साथ करनी जी ,आई राजबाई,देवलजी,बैचराजी, आई जीवणी आई, भक्तिमती करमा बाई,चिपको आंदोलन की जनक इमरताबाई सहित कई।
उपस्थित महानुभावों की सद्प्रेरणा से कृतकृत्य हुआ। अतएव संपूर्ण आयोजक मंडल के प्रति कृतज्ञता ज्ञापित करता हूं। यही नहीं इस यात्रा में कई नवीन मित्र भी बने जिनमें डॉ राजेशजी रावल, राजेश जी कुमरावत, शिवकुमार जी डांगी, सदानंद जी चोबे, विजयसिंहजी चौहान,पारसजी जैन, मुकेश जी तिंवारी ,प्रो बजाज साहब ,मालपानी जी के साथ ही कुछ आत्मीयता रखने वालों के नाम अज्ञानतावश भूल चुका हूं। वे मित्र मुझे क्षमा करते हुए अपने बड़प्पन को बनाएं रखेंगे।
इस यात्रा में प्रिय अभिषेक जी सीरवी जो पाली के हैं और वहां कानून की पढ़ाई कर रहें हैं। इनसे मिलना सुखद रहा। इनकी सेवा भावना, संस्कार,शालीनता व सहजता हर युवा के लिए प्रेरक थी। तीन दिन हमारे साथ छाया सदृश रहे।
मैं इनके साफल्यमंडित जीवन की कामना करता हूं।


लेखक - गिरधर दान रतनू दासोड़ी

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