“गुड़ी पड़वा: सृष्टि आरंभ दिवस का ऐतिहासिक रहस्य! – जानिए म.प्र. शासन संस्कृति विभाग द्वारा विचाराधीन ‘अनंत से अनंत तक’ ग्रंथ में डॉ. बालाराम परमार का विश्लेषण”

अनंत से अनंत तक, गुड़ी पड़वा – सृष्टि आरंभ दिवस !!
✍️ लेखक – डॉ. बालाराम परमार ‘हँसमुख’
📖 भाग – 7
🚩 कालिदास समारोह की समीक्षा बैठक में मध्यप्रदेश शासन द्वारा ‘गुड़ी पड़वा : सृष्टि आरंभ दिवस’ के रूप में मनाए जाने की घोषणा को डॉ. बालाराम परमार ‘हँसमुख’ ने संजीदगी से लिया और देश-दुनिया को इसके पौराणिक महत्त्व के साथ धार्मिक, दार्शनिक एवं वैज्ञानिक दृष्टिकोण के माध्यम से पुस्तक के रूप में संकलित किया गया है
गुड़ी पड़वा की परंपरा: इतिहास के पन्नों से
भारतीय उपमहाद्वीप में हिन्दू धर्म, जिसे वैदिक धर्म और सनातन धर्म भी कहते हैं, के उदय के साथ ही हिन्दू साम्राज्यों का भी उत्थान हुआ। सनातन धर्म में ‘गुड़ी पड़वा: सृष्टि का आरंभ दिवस’ ब्रह्मा द्वारा सृष्टि की रचना के समय से ही मान लिया गया है। सनातन धर्म के प्रवर्तक और अधिष्ठाता ब्रह्मा, विष्णु और महेश हैं।
भारत और हिंदू धर्म का संबंध एक-दूसरे से इतना गहरा है कि यह पर्व सृष्टि की रचना और मानव उत्पत्ति से जुड़ा हुआ माना जाता है। बाहरी आक्रांताओं के काले संक्रांति काल को छोड़कर, यह पर्व पूरे भारतीय सभ्यता क्षेत्र में श्रद्धा और भक्ति के साथ मनाया जाता रहा है।
📜 गुड़ी पड़वा का ऐतिहासिक महत्व
सभी हिन्दू राजवंश इस पर्व को सृष्टि आरंभ दिवस के रूप में मनाते रहे हैं। इनमें प्रमुख रूप से कुरु, मगध, वाकाटक, नाग, पल्लव, कदंब, रायरा, मैत्रक, चाहमान, चालुक्य, शशांक, हर्ष, गुर्जर-प्रतिहार, चंदेल, राष्ट्रकूट, पाल, परमार, यादव, चन्द्र, होयसल, सेन, गंग, काकतीय, कल्याणी कल्चुरी, आहोम, बान, रेड्डी, गजपति, मेवाड़, चोग्याल, भोसले, त्रवनकोर, वर्मा, सिख राजवंश आदि शामिल हैं।
गुड़ी पड़वा और ऐतिहासिक संदर्भ
👉 मराठा इतिहास: लोककथाओं के अनुसार, राजा शालिवाहन ने मिट्टी की सेना बनाई और उन्हें जल से प्राण देकर एक शक्तिशाली सेना बनाई, जिससे मराठा साम्राज्य का विस्तार हुआ। यह दिन शालिवाहन शक संवत के प्रारंभ के रूप में भी माना जाता है।
👉 वाल्मीकि रामायण का संदर्भ: भगवान राम ने इसी दिन वानरराज बाली के अत्याचार से दक्षिण की प्रजा को मुक्त किया था, जिसके उपलक्ष्य में लोगों ने अपने घरों में ध्वज (गुड़ी) फहराया। इस परंपरा को आज भी लोग निभाते हैं।
👉 छत्रपति शिवाजी महाराज: गुड़ी पड़वा के दिन ही शिवाजी महाराज ने विजय पताका फहराई थी और भोसले राजवंश की नींव रखी थी। यह विजय पताका उनकी वीरता और हिंदू स्वराज्य की प्रतीक बनी।
👉 महाराजा विक्रमादित्य ‘हेमकर्ण’: उन्होंने 2300 ईसा पूर्व उज्जैन से अपना शासन प्रारंभ किया और विक्रम संवत की शुरुआत भी इसी दिन से की।
👉 राजा भोज: महान राजा भोज का राज्याभिषेक भी गुड़ी पड़वा के दिन ही हुआ था। धार की भोजशाला, भोजपुर शिवलिंग और केदारनाथ मंदिर के पुनर्निर्माण का शुभारंभ भी इसी दिन हुआ था।
👉 भोपाल का भोजताल: ‘ताल में ताल भोजपाल का, बाकी सब तलैया’ – इस कहावत को जन्म देने वाले राजा भोज ने भोपाल के प्रसिद्ध भोजताल का निर्माण गुड़ी पड़वा के दिन ही शुरू किया था।
🔬 वैज्ञानिक और आध्यात्मिक महत्व
गुड़ी पड़वा केवल एक धार्मिक पर्व नहीं है, बल्कि इसका वैज्ञानिक आधार भी है। इस दिन सूर्य उत्तरी गोलार्ध में विशेष ऊर्जा का संचार करता है, जिससे यह नववर्ष और नवरात्रि का शुभारंभ भी बनता है।
🌿 यह पर्व कृषि से भी जुड़ा हुआ है, क्योंकि यह रबी फसल कटाई के त्योहार का प्रतीक भी है।
📢 निष्कर्ष
गुड़ी पड़वा केवल महाराष्ट्र तक सीमित नहीं है, बल्कि यह पूरे भारतवर्ष की सांस्कृतिक धरोहर है। यह ग्रंथ भारतीय इतिहास, धर्म, दर्शन और विज्ञान के संगम को उजागर करता है।
📚 मध्य प्रदेश शासन के संस्कृति विभाग द्वारा विचाराधीन यह ग्रंथ, गुड़ी पड़वा के महत्त्व को व्यापक दृष्टि से समझने में सहायक सिद्ध होगा।



