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माइक्रोवेव ओवन से स्वास्थ्य को भारी खतरा! जानिए राजीव दीक्षित के वैज्ञानिक तर्क और देसी समाधान


भाग 12: माइक्रोवेव – सुविधा या स्वास्थ्य पर वार?

तेज़ पकाने की मशीन, धीमे ज़हर की डिलीवरी!


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माइक्रोवेव: विज्ञान की चालाकी या जीवन के साथ खिलवाड़?

सुविधा की अंधी दौड़ में हम जिन यंत्रों को रोज़मर्रा का हिस्सा बना बैठे हैं, उनमें सबसे ख़तरनाक उपकरणों में से एक है – माइक्रोवेव ओवन। दो मिनट में खाना गर्म करने वाला यह यंत्र शायद ही किसी रसोई से अनुपस्थित हो, लेकिन क्या हम जानते हैं कि यह हमारे भोजन के साथ क्या कर रहा है?

राजीव जी दीक्षित ने चेताया था – “माइक्रोवेव कोई सामान्य गरम करने वाली मशीन नहीं, यह भोजन की प्रकृति को बदलने वाला वैज्ञानिक धोखा है।” उसमें गर्म किया गया भोजन सिर्फ स्वाद के लिए होता है, स्वास्थ्य के लिए नहीं। क्योंकि उसकी जीवनी शक्ति, प्राकृतिक गुण और ऊर्जा नष्ट हो जाती है।


क्या होता है माइक्रोवेव की तरंगों से?

माइक्रोवेव ओवन में रेडियोवेव जैसी तरंगें होती हैं जो अणुओं की गति को असामान्य रूप से तेज़ कर देती हैं। इससे खाना गर्म तो हो जाता है, परंतु उसका आंतरिक रासायनिक संतुलन पूरी तरह बिगड़ जाता है। शोध बताते हैं कि माइक्रोवेव में बार-बार गरम किया गया भोजन शरीर में रक्त की गुणवत्ता को गिराता है, प्रतिरोधक क्षमता घटाता है, और लंबे समय तक सेवन करने पर कैंसर तक को न्यौता देता है।


Dr. Hans Hertel का शोध और चेतावनी

स्विट्ज़रलैंड के वैज्ञानिक Dr. Hans Hertel ने यह सिद्ध किया कि माइक्रोवेव भोजन रक्त में विकृति लाता है। उन्होंने कहा, “माइक्रोवेव में पकाया गया भोजन शरीर के जैविक तंत्र को गम्भीर रूप से नुकसान पहुँचाता है।” परंतु पूंजीवादी शक्तियों ने इस शोध को छिपा दिया, क्योंकि यह उनकी बाज़ार की रणनीति के खिलाफ था।


देसी ज्ञान बनाम विदेशी भ्रम

राजीव जी दीक्षित कहते हैं, “भोजन को पकाने के पाँच तत्व हैं – अग्नि, जल, वायु, आकाश और पृथ्वी।” माइक्रोवेव में इनमें से कोई तत्व पूर्ण रूप से सम्मिलित नहीं होता। न उसमें वायु का स्पर्श होता है, न अग्नि की आंच, न मिट्टी की ऊर्जा, न सूर्य का प्रकाश।

आज भी जगन्नाथ पुरी में भोग मिट्टी के बर्तनों में लकड़ी की धीमी आंच पर बनता है। “जगन्नाथ का भात, जगत पसारे हाथ” – यह कहावत आज भी हमें बताती है कि प्रसाद वह है, जो तत्व-संयोजित हो, शुद्ध हो, सात्विक हो।


वैकल्पिक सोच: मिट्टी, तांबे, लोहे के बर्तनों की वापसी

हमने जिन बर्तनों और साधनों को “पुराना” कहकर त्याग दिया, वहीं हमारी सेहत के असली रक्षक थे। आज आवश्यक है कि हम देसी बर्तनों और धीमी आंच पर पकने वाले भोजन की ओर लौटें, क्योंकि वही भोजन जीवित, ऊर्जावान और पोषणकारी होता है।


सार्थक चिंतन

सुविधा का लालच कभी-कभी हमें असुविधा के गर्त में धकेल देता है। माइक्रोवेव की दो मिनट की सुविधा, शरीर के लिए वर्षों की बीमारी का कारण बन सकती है।
भोजन को लेकर हमारी दृष्टि को बदलना होगा – खाना सिर्फ पेट भरने के लिए नहीं, बल्कि शरीर, मन और आत्मा को पोषण देने के लिए होता है।
राजीव जी कहते हैं – “तेज़ गति में ऊर्जा नहीं होती, गहराई में होती है।” यही बात भोजन पर भी लागू होती है।

आइए, आधुनिकता के नाम पर अपनाई गई इन प्राणघातक तकनीकों से बचें और उस भोजन की ओर लौटें, जो न केवल भूख मिटाता है, बल्कि शरीर को जीवन देता है।


प्रस्तुति:

राजेश कुमरावत ‘सार्थक’
The Conscious Voice | Journalist | Educator | Earth-Centered Visionary
स्वास्थ्य संकल्प – 365 दिन लेखमाला संपादक
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