प्रेशर कुकर – क्या इसमें पकता है खाना या मरती है जीवन शक्ति? जानिए राजीव दीक्षित का वैज्ञानिक दृष्टिकोण

“स्वास्थ्य संकल्प – 365 दिन”
भाग 15: प्रेशर कुकर – भाप में पका खाना या जीवन ऊर्जा का विनाश?
“विज्ञान नहीं, विवेक की बात”
हमने रोटी को तवे पर सेंका, दाल को हांडी में उबाला, सब्ज़ियों को धीमी आंच पर पकाया – और पीढ़ियों तक स्वस्थ रहे। फिर आया ‘प्रेशर कुकर’ – जिसने सब कुछ मिनटों में पका तो दिया, लेकिन क्या जीवनी शक्ति भी बची?
प्रेशर कुकर का आविष्कार सुविधा के लिए हुआ, समय बचाने के लिए हुआ, लेकिन क्या इस सुविधा ने हमारे जीवन से प्राकृतिक ऊर्जा भी छीन ली? राजीव जी दीक्षित ने वर्षों पहले चेताया था – “प्रेशर कुकर में जो भोजन पकता है, उसमें अग्नि तत्व की भूमिका लगभग समाप्त हो जाती है।” इसका मतलब यह कि खाना सिर्फ भाप से पकता है, न कि अग्नि की संतुलित तपन से – जो भारतीय परंपरा में पाचनशक्ति (जठराग्नि) को पोषित करने वाला तत्व माना गया है।
क्या होता है जब खाना सिर्फ भाप से पकता है?
भाप से पका खाना ऊपरी तौर पर मुलायम दिख सकता है, लेकिन उसमें जीवनदायिनी ‘प्राण ऊर्जा’ की कमी हो जाती है। आयुर्वेदिक दृष्टिकोण से हर अनाज और सब्ज़ी में पंचतत्वों का संतुलन होता है, जिसमें अग्नि तत्व के द्वारा ही वह शरीर में सहज रूप से पचता है। कुकर में यह संतुलन टूट जाता है।
राजीव जी दीक्षित इसे “मृत भोजन” कहते हैं – जिसमें शरीर को जड़ ऊर्जा (calories) तो मिलती है, लेकिन चेतन ऊर्जा (vitality) नहीं।
पोषण का ह्रास – वैज्ञानिक दृष्टिकोण
- विटामिन B और C जैसे जल में घुलनशील पोषक तत्व अत्यधिक तापमान और दबाव में नष्ट हो जाते हैं।
- सब्ज़ियों का एंज़ायमेटिक प्रोफाइल दबाव के कारण समाप्त हो जाता है – जिससे पाचन कठिन हो जाता है।
- लंबे समय तक कुकर-आधारित खाना खाने से एसीडिटी, अपच, और मेटाबोलिक गड़बड़ियाँ बढ़ती हैं।
राजीव जी दीक्षित का समाधान: धीमी आंच, हांडी, मिट्टी के बर्तन
वे हमेशा कहते थे – “भोजन पकाओ, जलाओ मत”।
मिट्टी, तांबे, पीतल और लोहे के बर्तनों में धीमी आंच पर पका भोजन न केवल स्वादिष्ट होता है, बल्कि वह शरीर के ऊर्जातंत्र से सामंजस्य भी रखता है। देसी घी में तड़का लगाकर बनाई गई दाल, लोहे की कढ़ाई में बनी भाजी – यही है जीवन का असली स्वाद और पोषण।
सार्थक चिंतन
एक ओर हम कहते हैं – “खाना जीवन देता है”, और दूसरी ओर उसे ऐसे उपकरणों में पकाते हैं जो उसकी प्राकृतिक जीवन ऊर्जा ही नष्ट कर दें?
क्या कुछ मिनटों का समय बचाकर हम सालों की सेहत गंवा रहे हैं?
हमें यह स्वीकारना होगा कि तेजी से जीवन जीने की दौड़ में हमने ‘जीने लायक जीवन’ ही खो दिया है।
कुकर ने रसोई से परंपरा, प्रेम और प्रतीक्षा – तीनों को बाहर कर दिया।
शायद अब समय आ गया है कि हम फिर से धीमे जीवन की ओर लौटें – जहां खाना धीमी आंच पर, धैर्य से, और प्रेम से बने।
प्रस्तुति: राजेश कुमरावत ‘सार्थक’
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“विज्ञान नहीं, विवेक की बात”



