“विश्व पृथ्वी दिवस पर विशेष चिंतन: नरवाई जलाने से लेकर जल-संकट तक, धरती माँ की पीड़ा को समझिए”

वक्त है… समझ लो पृथ्वी का दर्द
22 अप्रैल – विश्व पृथ्वी दिवस विशेष संपादकीय
– राजेश कुमरावत ‘सार्थक’
धरती, जिसे वेदों में वसुधा कहा गया, ऋषियों ने जिसे माता के रूप में वंदित किया—आज उसी धरती की छाती दरक रही है। हवा में विष घुल गया है, जल में जहर उतर आया है, और अग्नि का ताप अब सहन की सीमा पार कर रहा है। विश्व पृथ्वी दिवस पर यह केवल एक प्रतीकात्मक आयोजन भर नहीं, बल्कि आत्मपरीक्षण का दिन होना चाहिए—कि हम क्या दे रहे हैं उस धरती को, जिसने हमें सब कुछ दिया?
धर्म की धरा पर अधर्म का बोझ
भारत जैसे देश में जहाँ धरती को ‘भूमि माता’, वृक्षों को ‘देवता’, और नदियों को ‘गंगा मैया’ कहा जाता है, वहाँ सबसे पहले यह सोचना होगा कि क्या हम अपने आचरण से इस श्रद्धा को निभा रहे हैं? धर्मग्रंथों ने सिखाया कि प्रकृति की रक्षा करना ही सच्चा धर्म है। पर क्या आज के धार्मिक कर्मकांडों में भी कोई पर्यावरण के प्रति संवेदना बची है?
यदि हमने केवल 50% भी अपने धार्मिक मूल्यों का पालन किया होता, तो शायद आज पृथ्वी को ‘बचाने’ के लिए अंतरराष्ट्रीय दिवस की ज़रूरत ही न पड़ती।
नरवाई जलाना – प्रकृति के फेफड़े में आग
हर साल फसल कटाई के बाद खेतों में बची नरवाई को जलाया जाता है—शायद इसलिए कि यह आसान है, सस्ता है, और किसान को तत्काल राहत देता है। पर यह क्षणिक राहत पूरी पृथ्वी के लिए दीर्घकालिक संकट बन रही है।
नरवाई जलाने से न केवल करोड़ों टन कार्बन वायुमंडल में घुलता है, बल्कि मिट्टी की ऊपरी जैविक परत जल जाती है। केंचुए मर जाते हैं, जीवाणु-जीवाणु नष्ट हो जाते हैं—जो धरती को जिंदा रखते हैं। यह मात्र प्रदूषण नहीं, धरती के जीवन तंतु का संहार है।
आधुनिकता के नाम पर प्राकृतिक संसाधनों की लूट
हमने विकास का जो मॉडल अपनाया है, वह प्रकृति-विरोधी है। खेतों में हर साल रासायनिक खादों की मात्रा बढ़ रही है, जिससे मिट्टी नमकीन हो रही है, उसका पीएच असंतुलित हो गया है।
नलकूपों के अंधाधुंध उपयोग से जो पानी खेतों तक पहुंच रहा है, वह भीतर से लवण खींचकर ला रहा है—सोडियम, कैल्शियम, मैग्नेशियम जैसी खनिज लवण अब ज़मीन की उपजाऊ परत में जम रहे हैं। ये न दिखने वाला विनाश है, पर सबसे घातक है।
वृक्ष कटे, छांव छिनी
हर साल लाखों पेड़ कट जाते हैं—कभी सड़कों के नाम पर, कभी इमारतों के नाम पर। हम भूल जाते हैं कि एक पेड़ केवल लकड़ी नहीं है—वह प्राण वायु का स्त्रोत, छाया का दाता, और धरती का सच्चा रक्षक है।
जब वृक्ष कटते हैं, तो केवल पर्यावरण ही नहीं, हमारी संस्कृति भी कटती है। गाँवों में पीपल, नीम, बरगद के नीचे जो सामूहिक जीवन बसता था, वह छिन्न-भिन्न हो चुका है।
जल संकट – केवल इंसानी नहीं, धरती का भी संकट
वह धरती जो नदियों की लहरों से मुस्कराती थी, आज सूखती धाराओं से कराह रही है। भूमिगत जल स्तर इतना गिर गया है कि गर्मियों में कुएँ और हैंडपंप भी जवाब दे देते हैं।
जब धरती का पेट खाली होता है, तो वह फसल नहीं उगलती—वह चुपचाप कराहती है। और हम समझ नहीं पाते कि यह सिर्फ मौसम की मार नहीं, यह हमारी भूलों का परिणाम है।
सार्थक चिंतन – अब भी समय है
विश्व पृथ्वी दिवस पर हमें भाषण नहीं, एक संकल्प चाहिए। संकल्प कि—
- नरवाई नहीं जलाएँगे, उसके जैविक उपयोग के विकल्प अपनाएँगे।
- प्राकृतिक खेती की ओर लौटेंगे, मिट्टी को फिर से जीवित करेंगे।
- हर पेड़ को जीव समझकर बचाएँगे, और नए वृक्षों का रोपण करेंगे।
- जल को केवल उपयोग नहीं, संरक्षण की भावना से देखेंगे।
यह दिन केवल ‘पृथ्वी का दिन’ नहीं—यह हमारे जीवन का दिन है।
क्योंकि जब धरती नहीं बचेगी, तो हम किसके भरोसे बचेंगे?
समय है… समझ लो पृथ्वी का दर्द।



