20 वर्षों से पक्षी सेवा का अनूठा संकल्प: राजस्थान-मध्यप्रदेश के गाँवों में बाँधे जा रहे परिंडे, जीवदया की मिसाल बना ‘दाना-पानी अभियान’

गर्मी की तपती दोपहरें जब ज़िंदगी को झुलसाने लगती हैं, उस वक़्त यदि कोई मनुष्य बेजुबानों की प्यास बुझाने के लिए आगे आए तो वह केवल सेवा नहीं, संवेदना और करुणा की मिसाल बन जाता है। जलते सूरज के नीचे, जब पक्षी पंख फैलाकर छांव और पानी की आस में भटकते हैं, तब कुछ हृदय ऐसे भी होते हैं जो बिना किसी अपेक्षा के ‘जीव मात्र’ के कल्याण का संकल्प लेकर निकल पड़ते हैं। राजस्थान और मध्यप्रदेश की सरहदों को लांघते हुए यह जीवदया का पुण्य अभियान, अब एक जनांदोलन का रूप ले चुका है—जहां परिंडे, सकोरे और दाना-पानी के माध्यम से ‘जीवन की प्यास’ बुझाने का सच्चा उपक्रम चल रहा है।
पिड़ावा से एक उदाहरण, जो करुणा का जीवंत प्रतीक बना
जनमत जागरण @ सुसनेर :: राजस्थान के पिड़ावा निवासी एवं सेंट्रल एजुकेशनल संस्थान के संचालक राजेन्द्र सिंह जैन बीते दो दशकों से ‘दाना-पानी अभियान’ को अपनी निजी प्रेरणा और सामाजिक जिम्मेदारी के रूप में जीवंत बनाए हुए हैं। वर्ष 1997 में आरंभ हुआ यह कार्य अब राजस्थान के झालावाड़ और मध्यप्रदेश के आगर जिले के सैकड़ों गांवों में बेजुबान पक्षियों की सेवा का माध्यम बन चुका है। रविवार को सोयत और उसके आसपास के गाँवों में परिंडे बाँधे गए, वहीं बुधवार को सालरिया, पटपड़ा सहित अन्य ग्रामों में यह अभियान पहुँचेगा।

जनजागरण से जनसहयोग तक – प्रशासनिक सहयोग का उदाहरण भी बना यह अभियान
वर्ष 2005 में तत्कालीन कलेक्टर जितेन्द्र सोनी की पहल पर पूरे झालावाड़ जिले में करीब एक लाख परिंडे जनसहयोग से बाँधे गए थे। यह अभियान केवल सेवा का उपक्रम नहीं, बल्कि नागरिक सहभागिता का उत्कृष्ट उदाहरण भी बन गया। राजेन्द्र सिंह जैन बताते हैं कि इस वर्ष भी लगभग एक हजार परिंडे बाँधकर, ज्वार के दाने और जल भरने की जिम्मेदारी स्थानीय लोगों को संकल्प के माध्यम से सौंपी जा रही है।
संतों की प्रेरणा और चींटियों तक की चिंता
यह कार्य दिगंबर जैन संत मुनि ब्रह्मानंद जी की प्रेरणा से आगे बढ़ रहा है। इस वर्ष पक्षियों के साथ-साथ चींटियों के लिए भी दाने की व्यवस्था की गई है। यह दृष्टिकोण दर्शाता है कि यह सेवा केवल प्यास बुझाने तक सीमित नहीं, बल्कि समग्र जीवमात्र की चिंता को आत्मसात करने वाली भावना है।
सुसनेर से जुड़ी एक और प्रेरणा: राजेश जैन घड़ीवाले का संकल्प
सुसनेर निवासी राजेश जैन (घड़ीवाले) ने भी जीवदया की इस भावना को आत्मसात करते हुए नगर के सभी प्रमुख मंदिरों में सकोरे बाँधने का संकल्प लिया है। उन्होंने अपने निजी खर्च से यह कार्य शुरू किया और साथ ही मंदिरों के पुजारियों को सकोरे में नियमित जल भरने का संकल्प दिलाया। उनकी इस पहल से प्रभावित होकर अब ग्रामीण मंदिरों के पुजारी भी निःशुल्क सकोरे प्राप्त कर रहे हैं।
सार्थक कमेंट (संपादकीय दृष्टिकोण):
यह समाचार केवल एक सामाजिक पहल की सूचना भर नहीं है, यह उन मूलभूत मानवीय गुणों की पुनः स्थापना की मिसाल है जो आज के यंत्रवत युग में कहीं खोते जा रहे हैं। राजेन्द्र जैन और राजेश जैन जैसे लोग जब बेजुबान पक्षियों और जीवों के लिए प्यास बुझाने की परवाह करते हैं, तब वे समाज को करुणा, सेवा और सहभागिता का नया पाठ पढ़ाते हैं। यह कार्य प्रशासन, समाज और साधु-संतों की प्रेरणा का त्रिवेणी संगम बनकर उभरा है।
यह केवल पानी नहीं, जीवन बांटने का अभियान है—एक ऐसी भावना जिसे हर व्यक्ति अपने छत, बालकनी, मंदिर, स्कूल और दिल में स्थान दे सकता है।



