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सुसनेर में लापरवाही से मासूम की मौत – अस्पताल में उपलब्ध था एंटी स्नैक इंजेक्शन, फिर भी नहीं लगाया सीएमएचओ बोले – दोषी कोई भी हो, जांच में सामने आया तो होगी सख्त कार्रवाई

सर्पदंश से तड़पते रहे संयम की साँसें, अस्पताल में मौजूद थे इंजेक्शन, फिर भी नहीं मिला जीवनदान
इंसानियत को झकझोर देने वाली यह घटना सुसनेर की है, जहाँ लापरवाही की एक सुई ने जीवन की पूरी डोर काट दी…

रिपोर्ट: जनमत जागरण संवाददाता | आगर से विशेष रिपोर्ट

बीती रविवार की रात सुसनेर नगर ने जो देखा, वह किसी भी संवेदनशील मन को भीतर तक हिला देने वाला था। 12 वर्षीय मासूम संयम जैन, जो एक सामान्य बालक की तरह मोबाइल पर गेम खेलते हुए घर के सोफे पर बैठा था, उसकी जिंदगी का खेल एक सर्पदंश ने समाप्त कर दिया। लेकिन इस मृत्यु के पीछे केवल सांप का जहर नहीं था, बल्कि अस्पताल की व्यवस्था और चिकित्सा तंत्र की वह सड़ी हुई मानसिकता थी, जिसने “इंजेक्शन होने के बावजूद” उस मासूम को जीवन से वंचित कर दिया।

डॉक्टर की मेज पर पड़ी फ़ाइलों, स्टाफ के मुंह पर चढ़ी उदासीनता और सिस्टम की जड़ता—ये सब मिलकर एक जीवन को निगल गए। मृतक संयम को जब परिवारजन सिविल अस्पताल लाए, तब एंटी स्नैक इंजेक्शन स्टॉक में मौजूद था। बावजूद इसके, इलाज की प्राथमिकता पीछे रह गई और उसे रैफर कर दिया गया। परिणाम—संयम ने अस्पताल पहुँचने से पहले ही दम तोड़ दिया।

मंगलवार को जब सीएमएचओ डॉ राजेश गुप्ता के नेतृत्व में जिला स्तरीय जांच दल सुसनेर अस्पताल पहुँचा, तो वहाँ आक्रोश की ज्वाला थी—परिजनों की पीड़ा, समाज के सवाल, और नागरिकों की आंखों में घुलता हुआ भरोसे का क्षय। तहसीलदार विजय सेनानी, भाजपा जिलाध्यक्ष ओम मालवीय, तथा नगर के समाजसेवी व जैन समाज के प्रतिनिधियों की उपस्थिति में यह स्पष्ट हुआ कि यह केवल एक घटना नहीं, बल्कि “सिस्टम की शवयात्रा” थी।

मुख्य चिकित्सा एवं स्वास्थ्य अधिकारी डॉ गुप्ता ने मीडिया से बात करते हुए आश्वस्त किया कि दोषी कोई भी हो—डॉक्टर या कर्मचारी—कार्रवाई अवश्य की जाएगी। लेकिन इस घटना ने ऐसे प्रश्न छोड़ दिए हैं, जो केवल जांच दल से नहीं, पूरी चिकित्सा व्यवस्था से उत्तर मांगते हैं—

  • जब इंजेक्शन अस्पताल में था, तो उसे लगाया क्यों नहीं गया?
  • डॉक्टर और स्टाफ को ऐसी आवश्यक दवा की जानकारी क्यों नहीं थी?
  • क्या पर्ची बनवाने की प्रक्रिया, जीवन से भी बड़ी हो गई है?

संयम की मौत पर शोक जताते हुए स्थानीय समाजसेवी अशोक जैन मामा, मुकेश साँवला, अंकित जैन और अन्य प्रतिनिधियों ने कहा कि यह घटना महज लापरवाही नहीं, अपराध की श्रेणी में आती है।

संयम अब नहीं है, लेकिन उसकी मौत एक आईना है—जिसमें हम सबको देखना होगा कि क्या हमारी चिकित्सा व्यवस्था इतनी ठंडी, इतनी यंत्रवत और इतनी असंवेदनशील हो गई है कि एक मासूम के प्राण भी उसे नहीं झकझोर सकते?

यह केवल एक बच्चा नहीं था, एक जीवन था, जो अस्पताल की दीवारों के बीच समय से पहले बुझ गया…


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