“सरकार ने हिन्दुओं के लिए क्या किया?” – जानिए तथ्य, पहचानिए दिशा – यह कोई राजनीतिक लेख नहीं, यह आत्ममंथन की पुकार है✍️ राजेश कुमरावत ‘सार्थक’ – पढ़िए : इस लेख में “ऑपरेशन प्रतिशोध और आत्मसम्मान की पुनर्प्रतिष्ठा”

हिन्दुओं के लिए क्या किया सरकार ने? – जानिए तथ्य, पहचानिए दिशा
आस्था, संस्कृति और अस्मिता के पुनर्जागरण का दस्तावेजी विवरण
“जिसे नहीं जानना हो, वह अनदेखा करेगा, जिसे भरमाया गया हो, वह नकारेगा… लेकिन जिसे आत्मचिंतन की आदत है, वह अवश्य पूछेगा – क्या हमने अपने समय का मूल्यांकन सत्य के आईने में किया है?” ✍️ राजेश कुमरावत ‘सार्थक’
आजकल एक प्रश्न हर गली-मोहल्ले, सोशल मीडिया पोस्ट और चर्चाओं में उभरता है –
“सरकार ने हिन्दुओं के लिए आखिर किया ही क्या है?”
यह प्रश्न यदि जागरूक विवेक से उठाया जाए, तो उचित है। लेकिन जब यह प्रश्न उस समाज की ओर से उठता है जो सहस्र वर्षों तक अपने ही मन्दिरों, तीर्थों, ग्रंथों, आस्था और संस्कृति की रक्षा के लिए लड़ता रहा – तब यह चिंता का विषय भी बन जाता है।
इसलिए आइए तथ्यों और कार्यों के प्रकाश में स्वयं देखें कि मोदी-योगी युग में भारतीय संस्कृति, विशेषकर हिन्दू आस्था के लिए क्या किया गया है – और क्यों यह युग ‘सांस्कृतिक पुनर्जागरण’ का युग कहा जाए।
I. राम से राष्ट्र तक – आस्था की मूर्त अभिव्यक्ति
- राम मंदिर का निर्माण केवल ईंट-पत्थर नहीं, वह करोड़ों लोगों की सहस्त्र वर्षों की प्रतीक्षा का उत्तर है।
- काशी विश्वनाथ कॉरिडोर और विंध्याचल कॉरिडोर जैसे परियोजनाएं वह संकल्प हैं जो सैकड़ों वर्षों की उपेक्षा को समाप्त कर रहे हैं।
- चारधाम को रेल, सड़क और वायु मार्ग से जोड़ना केवल तीर्थ नहीं, यह संस्कृति का अधोसंरचना निर्माण है।
- केदारनाथ धाम का पुनरोद्धार हो या 84 कोस परिक्रमा मार्ग को 4 लेन में बदलना – यह भूगोल को श्रद्धा से जोड़ने का अद्भुत उदाहरण है।
II. महोत्सवों का महायुग – उत्सवधर्मा भारत की पुनर्प्रतिष्ठा
- अयोध्या दीपोत्सव में लाखों दीपों से विश्व रिकॉर्ड बनाकर यह स्पष्ट किया गया – यह देश अब अपने राम को संकोच से नहीं, गर्व से पुकारेगा।
- कृष्ण जन्मोत्सव, रंगोत्सव, दिव्य-भव्य कुंभ, और जेलों में जन्माष्टमी आयोजन – यह संकेत हैं कि भारत अब अपनी जड़ों को सिर पर धारण कर रहा है।
- नवरात्रि में कन्या पूजन, रामलीला मंचन, और श्रद्धालुओं पर पुष्पवर्षा जैसे प्रतीकात्मक कार्य भी प्रशासन की चेतना को दर्शाते हैं।
III. विधिक शास्त्र से सांस्कृतिक सुरक्षा तक
- धारा 370 और 35A का हटाया जाना – हिन्दू समाज की संवैधानिक सुरक्षा का सबसे बड़ा अध्याय है।
- CAA, लव जिहाद विरोधी कानून, जबरन धर्मांतरण पर रोक, दंगों में वसूली का कानून – ये सभी आस्था की रक्षा के लिए एक दृढ़ राजनीतिक इच्छाशक्ति का परिचय देते हैं।
IV. शिक्षा, सेवा और संस्कार के संगम की योजनाएं
- 4 करोड़ से अधिक छात्रों को छात्रवृत्ति, निःशुल्क कोचिंग, संस्कृत विश्वविद्यालयों की स्थापना – यह केवल शैक्षणिक सहायता नहीं, यह अगली पीढ़ी को जड़ों से जोड़ने का प्रयास है।
- गौवंश संरक्षण, गोकुल मिशन, कामधेनु आयोग – यह संस्कृति को अर्थ और नीति से जोड़ने की पहल है।
V. वैश्विक मंचों पर हिन्दू संस्कृति का गौरवगान
- योग दिवस को अंतरराष्ट्रीय मान्यता, गंगा की सफाई, अबूधाबी और बहरीन में मंदिर निर्माण, विश्व नेताओं को गीता और रामायण भेंट करना – यह सब इंगित करता है कि भारत की आत्मा अब पुनः विश्वगुरु बनने के पथ पर चल पड़ी है।
👉 आतंकवाद और घुसपैठ के खिलाफ निर्णायक युद्ध: 2014 के बाद देश ने उरी हमले के जवाब में 2016 में सर्जिकल स्ट्राइक और पुलवामा हमले के बाद 2019 में एयर स्ट्राइक जैसे ऐतिहासिक कदम उठाए। इससे पहले कभी भारत ने इस प्रकार की सैन्य कार्रवाई का साहस नहीं दिखाया था।
ऑपरेशन ऑल आउट (कश्मीर में आतंकियों के सफाए हेतु), ऑपरेशन सिंदूर पहलगांव की घटना का प्रतिशोध (मणिपुर में उग्रवादियों पर सफल वायु-सैन्य कार्रवाई), बालाकोट स्ट्राइक, डोकलाम पर चीनी घुसपैठ का मुकाबला—ये सब भारत की नई रक्षा नीति और राष्ट्रसुरक्षा की प्रतिबद्धता का प्रतीक हैं
और तब भी कुछ नहीं किया…?
“कहना आसान है – किया क्या? लेकिन कठिन है यह स्वीकार करना कि जो कुछ किया गया, वह इतिहास में पहली बार हुआ।”– ‘सार्थक’
जब यह सब देख-सुनकर भी कोई हिन्दू कहे – “सरकार ने हमारे लिए कुछ नहीं किया”, तो यह या तो जानबूझ कर फैलाया गया भ्रम है या कृतघ्नता का आधुनिक स्वरूप।
इस लेख का उद्देश्य किसी पार्टी, व्यक्ति या सत्ता का गुणगान नहीं, बल्कि तथ्यों से साक्षात्कार कराना है।
अब यह निर्णय आपके विवेक पर है –
क्या यह सब कुछ आपके आत्मसम्मान को सशक्त करता है या आपकी शंका को और गहरा करता है?
समापन – एक विनम्र आत्मप्रश्न
“यदि कोई सरकार हमारी संस्कृति के लिए, हमारी आस्था के लिए, हमारी परंपराओं के लिए इतना कुछ करे… और हम फिर भी तटस्थ, उपेक्षित या कृतघ्न बने रहें – तो दोष किसका होगा?” ✍️ ‘सार्थक’
अब समय है – ‘आत्मघाती आलोचना’ से बाहर आकर ‘सार्थक जागरूकता’ अपनाने का।
– यह लेख “जनमत जागरण” न्यूज़ पोर्टल के संपादक राजेश कुमरावत ‘सार्थक’ द्वारा प्रस्तुत ‘सार्थक दृष्टिकोण’ स्तंभ के अंतर्गत प्रकाशित किया गया है।
प्रकाशन हेतु संपर्क: editor@janmatjagran.in | @sarthakvoice
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