“भारत अब युद्ध अधूरा नहीं छोड़ता…”– राजेश कुमरावत ‘सार्थक’ की कलम से, ‘सार्थक दृष्टिकोण’ में एक राष्ट्रचेतना से भरा संपादकीय विश्लेषण।

“हर बार जीते… फिर क्यों छोड़ा?” | अब अधूरा नहीं छोड़ता भारत – ऑपरेशन सिंदूर इसका प्रमाण है
“दुश्मन को, आग को, बीमारी को और कर्ज को कभी अधूरा नहीं छोड़ना चाहिए…”
यह वाक्य न कोई युद्धनीति है, न कोई राजनैतिक घोषणापत्र, यह तो भारत के शास्त्रों का वह अमर मंत्र है जिसे कभी राजीव दीक्षित जैसे सपूत ने मंचों से हुंकार बनाकर दोहराया था। पर क्या दुर्भाग्य! स्वतंत्र भारत के ‘सत्ताधीशों’ ने इस मंत्र को बार-बार भुलाया, और हर बार अधूरी छोड़ दी वो लड़ाई, जो पूरी हो सकती थी।
लेकिन विडंबना देखिए, स्वतंत्र भारत के इतिहास में इस मंत्र को सुनने वाले बैठे थे — समझने वाले नहीं।
1948 में कश्मीर से पाकिस्तानियों को खदेड़ दिया… और नेहरू जी ने सीज़फायर करवा दिया।
1965 में भारतीय सेना लाहौर के दरवाज़े तक पहुँच गई… और ताशकंद समझौता थमा दिया गया।
1971 में तो भारत ने युद्ध ही नहीं, पाकिस्तान को दो टुकड़ों में बाँट दिया – 90,000 सैनिक हमारे बंदी थे, फिर भी छोड़ दिए।
कारगिल में अटलजी के नेतृत्व में सेना ने विजय पाई, लेकिन हम ‘अंतरराष्ट्रीय छवि’ के मोह में चुप रह गए।
हर बार भारत जीता — पर राजनीति हार गई।
हर बार सैनिकों का शौर्य ‘राजनीतिक शांति’ के नाम पर दया की भेंट चढ़ गया।
हर बार देशवासियों को यह कहकर बहलाया गया — “हम शांति चाहते हैं, हम युद्ध नहीं करते।”
पर सवाल अब भी वही है – आखिर कब तक?
इन सत्ताओं ने देश को ‘शांति‘ का चश्मा पहनाकर वास्तविकता की ‘सीमा‘ को धुंधला कर दिया। देश की जनता हर बार पट्टी पढ़ती रही — “भारत कभी पहले आक्रमण नहीं करता…”, लेकिन जनता यह पूछती रही — “क्या भारत जवाब भी नहीं देगा?”लेकिन 2014 में भारत ने केवल सरकार नहीं बदली, भारत ने अपनी रीढ़ सीधी की।यह कोई चुनावी जीत नहीं थी, यह एक जनक्रांति थी — जहाँ जनता ने सिर्फ नेता नहीं चुना, एक ‘विवेकशील योद्धा’ को दिल्ली की गद्दी पर बिठाया। और तब से इतिहास ने करवट ली।
अब भारत बदल गया है…
लेकिन 2014 में भारत ने केवल सरकार नहीं बदली, भारत ने अपनी रीढ़ सीधी की । यह कोई चुनावी जीत नहीं थी, यह एक जनक्रांति थी — जहाँ जनता ने सिर्फ नेता नहीं चुना, एक ‘विवेकशील योद्धा‘ को दिल्ली की गद्दी पर बिठाया। और तब से इतिहास ने करवट ली।
2014 के बाद भारत ने एक नया स्वरूप लिया है —
अब यह ‘सहनशील भारत’ नहीं, ‘सशक्त भारत’ है।
अब यह देश युद्ध नहीं चाहता, लेकिन अगर युद्ध थोप दिया गया, तो उसे अधूरा नहीं छोड़ता।
और अब…
उरी — भारत की छाती पर हमला हुआ। लेकिन पहली बार प्रधानमंत्री ने चुप्पी की माला नहीं पहनी। सर्जिकल स्ट्राइक ने वह लकीर खींच दी, जिसके पार अब शत्रु भी कदम बढ़ाने से डरता है।
पुलवामा — 40 से अधिक जवानों की शहादत। भारत रोया नहीं, बदला लिया। बालाकोट एयर स्ट्राइक ने पाकिस्तान के आतंकी ढांचों को धूल में मिला दिया।
डोकलाम और गलवान — अब भारत सिर्फ पाकिस्तान ही नहीं, चीन को भी आंखों में आंख डालकर जवाब देता है।
आज देशवासी महसूस करते हैं कि प्रधानमंत्री चुप नहीं रहते — चुप्प रहना अब कूटनीति नहीं, कमजोरी मानी जाती है।
अब भारत ‘गांधीवाद’ की बीन नहीं बजाता, अब वह चाणक्य नीति अपनाता है।
इस बदलाव की मूल भावना यह नहीं कि भारत युद्ध चाहता है, बल्कि यह है कि भारत अब पलटवार करना जानता है।
अब कोई ‘लालकिले की प्राचीर’ से केवल भाषण नहीं देता, अब वहाँ से विश्व के मंच तक भारत की बुलंद आवाज जाती है।
वक्त आ गया है कि जनता यह समझे — “तटस्थता” एक धोखा है, और “शांति” की दुहाई एक राष्ट्र को कमजोर भी बना सकती है, अगर उसमें न्याय की तलवार न हो।
देश के हर नागरिक को यह याद रखना होगा कि राष्ट्र की रक्षा केवल सेना की जिम्मेदारी नहीं, जनमत की भी शक्ति है।
2014 से पहले की सरकारें यदि बार-बार दुश्मन को छोड़ती रहीं, तो 2014 के बाद की सरकार ने यह संदेश दिया —
“अब हम अधूरा नहीं छोड़ते — न कर्ज, न आग, न बीमारी, और न ही दुश्मन…”
निर्दोष पर्यटकों की नृशंस हत्या — 26 भारतीयों को पाकिस्तान समर्थित आतंकवाद ने शिकार बनाया।
पूरा देश स्तब्ध था, लेकिन इस बार मौन नहीं — आग थी।
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में “ऑपरेशन सिंदूर” प्रारंभ हुआ।
पाकिस्तान की सीमा में घुसकर आतंकी शिविरों को ध्वस्त किया गया।
सटीकता ऐसी कि दुश्मन को समझ भी नहीं आया — कब आए, कब बरसे और कब मिटा दिए गए।
यह सिर्फ सैन्य उत्तर नहीं था — यह था “राष्ट्र की आत्मा का उद्घोष।”
यह संदेश था — अब भारत न कभी डरता है, न छोड़ता है, न भूलता है।
अब अंतर है सिर्फ सरकार का नहीं… नायक का है
2014 से पहले जो सत्ता थी, वह सीमाओं की सुरक्षा को केवल फाइलों और नीतियों में खोजती थी।
आज की सत्ता सीमाओं की सुरक्षा को फौज के हौसले और जनता के विश्वास से जोड़ती है।
पहले राजनीति युद्ध जीत कर शांति के नाम पर छोड़ देती थी।
अब राजनीति दुश्मन को उसकी भाषा में उत्तर देती है — निर्णायक, सटीक और प्रभावशाली।
यह नायक भाषण नहीं देता, शौर्य दिखाता है।
यह नेतृत्व संधि नहीं करता, सर्जिकल करता है।
‘सार्थक चिंतन’ | राष्ट्रभक्ति से पूरित समापन की चार पंक्तियाँ
- अब भारत दया से नहीं, दृढ़ता से चलता है।
- अब सीमाओं की लकीर नहीं, ललकार बोलती है।
- दुश्मन की भाषा में उत्तर देना कमजोरी नहीं, अब यह हमारी नीति है।
- भारत अब शांति का पुजारी नहीं, न्याय का धारक है — और अधूरा कुछ नहीं छोड़ता।
– राजेश कुमरावत ‘सार्थक’
‘संपादक – जनमत जागरण’ | ‘सार्थक दृष्टिकोण’ से प्रस्तुत विश्लेषणात्मक लेख



