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'सार्थक' दृष्टिकोणआगर मालवाइनोवेशन एण्ड यूमध्यप्रदेशस्पाट लाइटहेल्थ

सोयतकलां में मरणोपरांत नेत्रदान का संकल्प – दिवंगत माता को दी अनोखी श्रद्धांजलि – पत्रकार जितेन्द्र राठौड़ और पत्नी की संवेदनशील प्रेरक पहल

श्रद्धांजलि का उजियारा – पुण्यतिथि पर नेत्रदान का संकल्प

नेत्रदान नहीं, यह है जीवनदान – राठौड़ दंपती की प्रेरणादायक पहल

जनमत जागरण @ सोयतकलां (आगर-मालवा)।
“श्रद्धा जब संकल्प बन जाए,
तो स्मृतियां समाज का दीप जलाएं।
नेत्र भले न रहें, पर दृष्टि बन जाए,
तो पुण्यतिथि भी जीवन का उत्सव कहलाए।”

श्रद्धांजलि केवल कुछ क्षणों की औपचारिकता नहीं होती – वह अवसर होता है, जब हम किसी प्रिय की स्मृति को किसी महान उद्देश्य से जोड़ सकते हैं। सोयत निवासी पत्रकार श्री जितेन्द्र सिंह राठौड़ (जिला संयोजक, बजरंग दल) एवं उनकी धर्मपत्नी श्रीमती सुनीता राठौड़ (शिक्षिका, शिशु मंदिर) ने अपनी स्वर्गीय माताजी श्रीमती रतनबाई राठौड़ की द्वितीय पुण्यतिथि पर एक ऐसा ही सजीव संदेश समाज को दिया – मरणोपरांत नेत्रदान का संकल्प।

इस दंपती ने भारत विकास परिषद (आगर मालवा) के माध्यम से नेत्रदान संकल्प-पत्र भरकर, प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्र सोयतकलां में पदस्थ नर्सिंग ऑफिसर अशोक मेहरा को औपचारिक रूप से सौंपा। यह केवल एक पारिवारिक निर्णय नहीं, अपितु समाज को रोशनी की ओर ले जाने वाला एक सामाजिक संकल्प है।

सच्ची श्रद्धांजलि क्या है?

जहां अधिकांश पुण्यतिथियां केवल औपचारिक आयोजन बनकर रह जाती हैं, वहीं राठौड़ परिवार का यह निर्णय बताता है कि किसी दिवंगत आत्मा को सच्ची श्रद्धांजलि कैसे दी जाती है – ऐसी श्रद्धांजलि जो किसी अंधे को दृष्टि दे सके, किसी जीवन में आशा का दीप जला सके।

भारत विकास परिषद ने इस पहल को “संवेदनशील परिवारों से शुरू होने वाली जनचेतना” का नाम दिया है और चिकित्सा समुदाय ने भी इसे प्रेरणादायक करार दिया है। यह कदम उस चेतना का प्रतीक है, जहां मृत्यु के बाद भी किसी और का जीवन प्रकाशित हो सकता है।


✍️संपादक की कलम से – सार्थक चिंतन

“जब मातृत्व की स्मृति केवल आंसुओं में न बहकर समाज के लिए दीपक बन जाए,
तो बेटा केवल पुत्र नहीं, संस्कृति का वाहक बन जाता है।”

जब पुत्र अपने स्वजन की स्मृति को सेवा में रूपांतरित करता है, तो वह केवल परिवार नहीं, समाज के लिए भी आदर्श गढ़ता है। जितेन्द्र जी और उनकी धर्मपत्नी का यह संकल्प एक मौन संदेश है श्रद्धांजलि केवल आँसू नहीं, संकल्प भी हो सकती है।यह नेत्रदान नहीं, मातृभक्ति की वह रोशनी है जो आने वाली पीढ़ियों की राह रोशन करेगी।

राठौड़ दंपती की यह पहल नई पीढ़ी के लिए एक उदाहरण है कि स्मृति और सेवा जब जुड़ते हैं, तो परंपराएं मूल्य बन जाती हैं। यह रिपोर्ट केवल एक समाचार नहीं, आने वाले समाज के लिए दिशासूचक बन सकती है।


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