धर्म की पाठशाला : गर्मी की छुट्टियों में महिलाएं चला रहीं जैन संस्कार कक्षा, 50 से अधिक बच्चे हो रहे लाभान्वित

धर्म की पाठशाला : संस्कारों की दीपशिखा जलातीं महिलाएं, छुट्टियों में बच्चों को सीखा रहीं धर्म की बारीकियाँ
– खेल, प्रतियोगिता, भजन और पाठ से संस्कारित कर रहीं नन्हे मन, पुरस्कारों से मिल रहा प्रेरणा का संबल
जनमत जागरण @ सुसनेर | दीपक जैन की स्पेशल रिपोर्ट
जब समर्पण का भाव साधना में बदलता है, तो वह धर्म की अमूल्य परंपराओं को पीढ़ी-दर-पीढ़ी संजोने का माध्यम बन जाता है। ऐसा ही प्रेरणास्पद उदाहरण नगर के श्री चंद्रप्रभु दिगम्बर जैन छोटे मंदिर में प्रतिदिन सायं गूंज रही स्तुतियों और श्लोकों की स्वरलहरियों में देखा जा सकता है, जहां “मुनि ब्रह्मानंद सागर पाठशाला” के अंतर्गत छुट्टियों में बच्चों को जैन धर्म का पाठ पढ़ाया जा रहा है।
बच्चों में प्रारंभ से ही अध्यात्म और नैतिक मूल्यों का बीजारोपण करने के उद्देश्य से संचालित इस पाठशाला की विशेष बात यह है कि इसका संचालन नगर की समर्पित महिलाएं — श्रीमती समता जैन, श्रीमती सरोज जैन और दीदी रानी जैन — पूरी लगन और श्रद्धा से कर रही हैं। ये महिलाएं अपने मायके जाने के स्थान पर हर शाम को बच्चों की धर्म-पाठशाला में उपस्थिति देकर उन्हें जीवन के सार्थक मूल्यों से जोड़ रही हैं।
3 से 16 वर्ष आयु वर्ग के 50 से अधिक बच्चे इस पाठशाला में उत्साहपूर्वक भाग ले रहे हैं, जहां उन्हें खेल, भजन, गीत, प्रतियोगिता और अध्ययन के माध्यम से दर्शन स्तुति, महामंत्र, श्लोक, स्रोत एवं धर्म की मूल अवधारणाएं सिखाई जा रही हैं। प्रतिदिन शाम 7 से 8 बजे तक चलने वाली इन कक्षाओं में न केवल धार्मिक ज्ञान दिया जाता है, बल्कि बच्चों को हर दिन एक छोटा-सा त्याग का नियम और सीखी गई बातों को परिजनों के साथ साझा करने का ‘होमवर्क’ भी दिया जाता है।
बच्चों की सहभागिता और आत्मविश्वास को बढ़ाने के लिए पाठशाला में प्रश्नोत्तरी का आयोजन भी किया जाता है, जिसमें सही उत्तर देने वाले बच्चों को पुरस्कार देकर उत्साहित किया जाता है। यह शिक्षण केवल रटंत विद्या नहीं, अपितु जीवन के गूढ़ अर्थों को सरलता से समझाने का एक सजीव प्रयोग है।

रविवार को विशेष पूजन प्रशिक्षण और तीर्थदर्शन का आयोजन
हर रविवार की सुबह, दीदी रानी जैन द्वारा बच्चों को जिनेन्द्र भगवान की अष्टद्रव्य पूजन का प्रशिक्षण दिया जाता है। इस दौरान उन्हें पूजा की विधि, मंत्रोच्चारण और आचरण की सूक्ष्मताओं को अभ्यास सहित समझाया जाता है। बच्चों की रुचि को बनाए रखने हेतु हल्का स्वल्पाहार भी प्रदान किया जाता है।
इस पाठशाला की सबसे सुंदर विशेषता यह है कि इसके माध्यम से तैयार हो रहे ये नन्हे धर्मवीर, वर्षभर के धार्मिक आयोजनों में सांस्कृतिक प्रस्तुतियां देते हैं और समय-समय पर तीर्थयात्राओं का भी आनंद लेते हैं।
एक दशक से चल रही सेवा : यह केवल शिक्षा नहीं, एक संस्कार आंदोलन है
पिछले दस वर्षों से चल रही यह संस्कार पाठशाला जैन समाज की उन महिलाओं का जीवंत उदाहरण है जो धर्म को पुस्तकों से निकालकर बच्चों के जीवन में आत्मसात करवा रही हैं। उनका स्पष्ट मानना है कि यदि बच्चों को बचपन से धर्म की सही शिक्षा दी जाए तो वे जीवन के हर मोड़ पर सही निर्णय लेना सीखेंगे और सद्मार्ग से कभी विचलित नहीं होंगे।
निष्कर्षतः, यह पाठशाला न केवल छुट्टियों का एक सार्थक उपयोग है, बल्कि यह एक ऐसा धर्म-संस्कार अभियान बन चुका है, जो आने वाली पीढ़ियों को अध्यात्म, संयम और संस्कार की शक्ति से परिपूर्ण करने का मौन व्रत ले चुका है। सच्चे अर्थों में यह पाठशाला एक ‘संस्कार शाला’ है – जहां शिक्षा से अधिक जीवन को दिशा दी जाती है।



