“पान की बेल या परंपरा की टूटती सांस? “क्या पान की खेती को मिलेगा सांस्कृतिक खेती का दर्जा? तम्बोली समाज की मांगें”

“पान की खेती: एक पवित्र परंपरा, एक उपेक्षित समाज – अब न्याय चाहिए!”
संपादक की दृष्टि से – राजेश कुमरावत ‘सार्थक’
भारत की कृषि परंपरा में अनेक फसलें केवल आजीविका का नहीं, संस्कृति का स्वर बनती हैं। पान की खेती उन दुर्लभ परंपराओं में से एक है, जिसे सिर्फ उगाया नहीं जाता, बल्कि श्रद्धा और आस्था के साथ पाला जाता है। यह कोई आम खेती नहीं, बल्कि एक दूध पीते शिशु की भांति संवेदनशील और स्नेहिल देखभाल मांगती है।
पान की बेल न तो अधिक गर्मी सह पाती है, न अधिक सर्दी और न ही अधिक वर्षा। और जो समाज – विशेषतः तम्बोली समाज – इसे सदियों से पूजन, संस्कृति और आजीविका के रूप में संजोता आया है, वह आज उपेक्षा का शिकार हो चुका है।
एक दिव्य उपहार: पान की बेल का आध्यात्मिक रहस्य

पान की बेल के बारे में पूर्वजों से चली आ रही एक मान्यता इसे ईश्वरीय उपहार के रूप में प्रतिष्ठित करती है। यह बेल न फूल देती है, न फल। इसका जीवनचक्र साल में एक बार, उस ‘द्वि-फूटन’ नामक बिंदु पर सक्रिय होता है, जहां से एक शाखा काटकर उसे पुनः पनवाड़ी (बरेजा) में बोया जाता है।
तमोली समाज इस प्रक्रिया को पूजा के अनुष्ठान की भांति निभाता है। चप्पल पहनकर बरेजा में प्रवेश तक वर्जित होता है। पवित्रता, स्वच्छता और संयम से युक्त यह खेती मात्र कृषि नहीं, आध्यात्मिक साधना है।
विपरीत स्थितियाँ और टूटती परंपरा
जब विपरीत मौसम या प्राकृतिक आपदाएँ आती हैं, तो इस मेहनत से पली-बढ़ी फसल एक झटके में नष्ट हो जाती है। नतीजा? वर्षों की कमाई, समाज की सांस्कृतिक विरासत और एक परिवार की उम्मीद – सब धराशायी हो जाते हैं। ऐसी परिस्थितियों में दो-तीन साल में एक बार होने वाली प्राकृतिक मार ही पूरे समाज को खेती से विमुख कर देती है।
आज देश भर में हजारों तम्बोली परिवार पान की खेती छोड़ चुके हैं। और दुख की बात यह है कि इस समाज को अब तक सरकार की मुख्यधारा योजनाओं में कहीं स्थान नहीं मिला – न कोई फसल बीमा, न उत्पादन बोनस, न संरचनागत अनुदान।
क्या सरकार ने अब तक कुछ किया है? – एक विश्लेषण

कुछ राज्य सरकारों (जैसे बिहार, उत्तर प्रदेश) ने पान उत्पादकों के लिए सीमित अनुदान या प्रशिक्षण की पहल की है, लेकिन वह भी सिर्फ तकनीकी सहायता या कुछ हद तक बरेजा निर्माण तक सीमित है।
मध्य प्रदेश में पान की खेती करने वाले किसानों के लिए कोई विशेष योजना नहीं है। हालांकि, राज्य सरकार द्वारा फल पौधारोपण योजना के तहत किसानों को 40% से 50% तक की सब्सिडी प्रदान की जाती है, लेकिन यह योजना पान की खेती के लिए नहीं है।
पान की खेती को ‘संवेदनशील पारंपरिक फसल’ का दर्जा,
तम्बोली समाज को ‘संरक्षित पारंपरिक कृषक समुदाय’ के रूप में मान्यता,
या ‘संस्कृति आधारित खेती’ के तहत संरक्षण – इस दिशा में अब तक कोई ठोस राष्ट्रीय नीति नहीं बनी है।
✍️ नीतिगत मांगें – समय की पुकार
- पान उत्पादक किसानों के लिए विशेष फसल बीमा योजना चलाई जाए, जिससे प्राकृतिक आपदा की भरपाई हो सके।
- पान अनुसंधान एवं संरक्षण केंद्र की स्थापना की जाए, जो इसकी वैज्ञानिक, सांस्कृतिक और व्यावसायिक संभावनाओं पर कार्य करे।
- ‘पनवाड़ी’ संरचना (बरेजा) के निर्माण पर सब्सिडी योजना दी जाए – जैसे पॉलीहाउस को दी जाती है।
- ‘पान किसान क्रेडिट कार्ड योजना’ शुरू हो, जिससे तत्काल नकद सहायता संभव हो।
- पान को ‘भारतीय सांस्कृतिक कृषि धरोहर’ (Indian Agricultural Heritage Crop) का दर्जा दिया जाए।
- तम्बोली समाज को विशेष कृषक श्रेणी में जोड़कर सामाजिक और आर्थिक सहयोग योजनाओं में प्राथमिकता दी जाए।
- शिक्षा और प्रशिक्षण के विशेष सत्र तम्बोली युवाओं के लिए चलाए जाएं ताकि नई पीढ़ी खेती से जुड़ी रहे और तकनीक भी सीखे।
समापन – पान की बेल, सिर्फ बेल नहीं – हमारी जड़ों का प्रतीक है

तम्बोली समाज की यह भावनात्मक खेती केवल एक फसल नहीं, एक संस्कृति की आखिरी सांसें हैं। यदि हमने अब भी इसे नहीं बचाया, तो एक दिन यह वेदमंत्रों में पूजित पत्ता, विवाह मंडपों की शोभा, और पूजा थाल का यह अक्षत-सहित पत्ता इतिहास बन जाएगा।
सरकार, नीति-निर्माताओं, और सामाजिक संगठनों से यह अपील है कि वे इस पुकार को सुनें। यह पुकार केवल तंम्बोली समाज की नहीं, यह भारत की उस परंपरा की है जो मिट रही है – धीरे, चुपचाप, लेकिन निश्चित रूप से।
– राजेश कुमरावत ‘सार्थक’
संपादक, जनमत जागरण न्यूज़ पोर्टल
The Conscious Voice – Journalist | Educator | Earth-Centered Visionary




