“सरकारी ज़मीन पर साजिश का गोदाम! न्यायालय को गुमराह करने का प्रयास – अपर आयुक्त ने दिया साफ़ आदेश: हटाओ अवैध वेयरहाउस”- [मामला सुसनेर एक निजी वेयरहाउस का]

उज्जैन संभाग के अपर आयुक्त का बड़ा फैसला – जनमत जागरण की रिपोर्टिंग और भागीरथ देवड़ा की कानूनी पहल से जागा प्रशासन
✍️ “सालों तक अंधेरे में लिपटा एक सच… न्याय की चौखट पर खेला गया एक सुनियोजित खेल… और सरकारी ज़मीन पर खड़ा हुआ एक छल का महल! “जब न्याय की आँखों पर व्यवस्थागत धूल डाली जाती है, तब सत्य की मशाल को जलाए रखना किसी पत्रकार की ज़िम्मेदारी और किसी अधिवक्ता का धर्म बन जाता है। वर्षों से दबे सच को उजागर करने का साहस अगर जन और विधिक शक्ति में हो — तो व्यवस्था को झुकना ही पड़ता है। उज्जैन संभाग की यह घटना, उसी जनजागरण और सत्याग्रह की परिणति है, जिसने आखिरकार अंधकार में डूबी न्याय प्रक्रिया को सूरज की रौशनी दिखाई।” यह मामला केवल एक भूमि विवाद नहीं, बल्कि न्याय को छलने वाले तंत्र का आइना है, जिसकी दरारों में से अब सच की किरणें फूट पड़ी हैं।”

जनमत जागरण @ आगर-मालवा/उज्जैन। सरकारी जमीन पर अवैध कब्जे से बनाए गए वेयरहाउस के मामले में आखिरकार न्याय की जीत हुई है। यह सिर्फ एक कानूनी आदेश नहीं, बल्कि एक सतत जनजागरण, पत्रकारिता और विधिक प्रयासों के सफल परिणाम की घोषणा है।
इस पूरे प्रकरण में जनमत जागरण न्यूज़ पोर्टल की लगातार रिपोर्टिंग, एडवोकेट भागीरथ देवड़ा द्वारा दायर नोटिस, और पूर्व में शिकायतकर्ता देवीलाल दांगी द्वारा वर्ष 2016 में की गई शिकायत – तीनों ने मिलकर वह दबाव बनाया, जिसके फलस्वरूप प्रशासन को कार्रवाई के लिए बाध्य होना पड़ा।
👉 आपको बता दें कि 15 मार्च 2025 को जनमत जागरण द्वारा प्रकाशित “घोटाले पर घोटाला!” शीर्षक रिपोर्ट ने इस प्रकरण की तह तक जाकर सच्चाई को उजागर किया था। इसके बाद 18 मार्च 2025 को प्रकाशित “समझिए: विवादित जमीन पर बने वेयरहाउस का सच!” नामक रिपोर्ट में एमपीडब्ल्यूएलसी जिला प्रबंधक दुर्गेश जाट का बयान भी सामने आया था, जिसमें उन्होंने स्वीकार किया कि यदि शपथ पत्र में झूठी जानकारी दी गई है, तो नियमानुसार कार्रवाई की जाएगी।
⚖️ न्यायिक निर्णय: निगरानी आवेदन खारिज, अतिक्रमण हटाने के आदेश
उज्जैन संभाग के अपर आयुक्त ने कृष्णाबाई पति वल्लभदास आदि, ग्राम सुसनेर, आगर मालवा निवासी द्वारा दायर निगरानी आवेदन को अस्वीकार करते हुए महत्वपूर्ण आदेश पारित किया है। न्यायालय ने पाया कि यह आवेदन न तो अंतिम आदेश के विरुद्ध था और न ही भू-राजस्व संहिता की धारा 50 के अंतर्गत विचारणीय था, बावजूद इसके यह प्रकरण लगभग पांच वर्षों तक लंबित रखा गया, जिससे अधीनस्थ न्यायालय द्वारा शासकीय भूमि से अतिक्रमण हटाने की प्रक्रिया बाधित हुई। अंततः न्यायालय ने आवेदन को पोषणीय न मानते हुए निरस्त कर दिया और कलेक्टर, आगर मालवा को निर्देशित किया कि संबंधित शासकीय भूमि से अवैध अतिक्रमण व व्यवसायिक उपयोग को तत्काल रोका जाए तथा भू-राजस्व संहिता के अनुरूप भूमि का संरक्षण सुनिश्चित किया जाए।
अब उज्जैन संभाग के अपर आयुक्त ने निगरानी आवेदन क्रमांक 07/निगरानी/2019-20 को खारिज करते हुए स्पष्ट आदेश दिए हैं कि शासकीय भूमि से अतिक्रमण हटाया जाए और उक्त भूमि को सुरक्षित रखा जाए। कलेक्टर, आगर मालवा को इस हेतु निर्देशित किया गया है।
जनमत जागरण को अधिवक्ता भागीरथ देवड़ा ने दी पुष्टि
अधिवक्ता भागीरथ देवड़ा ने जनमत जागरण को जानकारी दी कि उन्होंने अपर आयुक्त कार्यालय से इस पूरे मामले की प्रमाणित प्रति आवेदन देकर प्राप्त की है। जब यह प्रमाणित प्रति उन्हें प्राप्त हुई, तब स्पष्ट हुआ कि आदेश में वेयरहाउस के संबंध में स्पष्ट निर्देश हैं और सरकारी जमीन पर बने वेयरहाउस को हटाने के आदेश अपर आयुक्त द्वारा जारी किए जा चुके हैं। यह दस्तावेज़ अब इस पूरे प्रकरण का निर्णायक प्रमाण बन गया है, जो न्यायालयीन प्रक्रिया में प्रस्तुत किया जा सकता है और जनहित में इसे प्रकाशित करना भी आवश्यक है।

👉 फोटो 4 -साल 2019 में जिला कलेक्टर संजय कुमार द्वारा अपर आयुक्त उज्जैन को भेजा गोपनीय पत्र
जनमत जागरण और देवड़ा की संयुक्त भूमिका निर्णायक

यदि एडवोकेट भागीरथ देवड़ा ने कानूनी स्तर पर धारा 80 CPC के तहत प्रशासन को आवेदक रोडूलाल देवड़ा गांव आंकली के अनुसार स्पष्ट नोटिस जारी कर दबाव नहीं बनाया होता और जनमत जागरण ने जनहित में यह रिपोर्टिंग न की होती, तो यह मामला संभवतः वर्षों और लटक जाता।
यही नहीं, वर्ष 2016 में देवीलाल दांगी द्वारा की गई शिकायत भी इस पूरे घटनाक्रम की प्रारंभिक चेतावनी थी, जिसे तत्कालीन अधिकारियों ने गंभीरता से नहीं लिया।
प्रशासन की अग्निपरीक्षा: आदेश का पालन कब?
न्यायालय के स्पष्ट निर्देशों के बावजूद यदि समय रहते प्रशासन ने वेयरहाउस नहीं हटाया और शासकीय भूमि को पुनः सुरक्षित नहीं किया, तो एडवोकेट देवड़ा द्वारा न्यायालय में सीधा वाद दायर किया जाएगा।
अब देखना यह है कि क्या प्रशासन इस जनहित के फैसले को तुरंत लागू करता है या फिर जनता को एक और लंबा इंतजार झेलना पड़ेगा।
🟢 यह सिर्फ एक रिपोर्ट नहीं, जनजागृति की मिसाल है।
जनमत जागरण न्यूज़ फार एक्शन
✍️ रिपोर्टिंग टीम | जनमत जागरण पोर्टल
🔍 प्रशासनिक पत्राचार से उजागर हुआ न्यायिक प्रक्रिया का दुरुपयोग!
तत्कालीन कलेक्टर के गोपनीय पत्र से खुली न्यायिक खेल की परतें
सरकारी ज़मीन पर हुए इस विवादास्पद निर्माण और वित्तीय लेनदेन के बीच, एक ऐसा गोपनीय पत्र सामने आया है जिसने पूरे मामले को एक नए मोड़ पर ला खड़ा किया है। तत्कालीन कलेक्टर द्वारा वरिष्ठ अधिकारियों को लिखा गया यह पत्र न केवल ज़मीनी हकीकत की पुष्टि करता है, बल्कि यह भी संकेत देता है कि प्रशासनिक तंत्र के भीतर कहीं न कहीं गंभीर लापरवाही या मिलीभगत का संदेह गहराता जा रहा है। इस पत्र में प्रयुक्त शब्द, संदेह और जांच की आवश्यकता को दर्शाते हैं, जो इस ‘न्यायिक खेल’ की परत-दर-परत सच्चाई उजागर करने के लिए पर्याप्त हैं।
साल 2019 में जिला कलेक्टर संजय कुमार द्वारा अपर आयुक्त उज्जैन को भेजे गए इस गोपनीय पत्र से यह भी स्पष्ट होता है कि संबंधित प्रकरण की निगरानी प्रक्रिया को राजस्व न्यायालय द्वारा पहले ही सुन लिया गया था। बावजूद इसके, वर्ष 2019 में निचली अदालत में पुनः निगरानी दायर कर प्रकरण को अनावश्यक रूप से लंबा खींचा गया — जो न्याय की मूल भावना के विपरीत है।

वहीं, दूसरी ओर विडंबना यह रही कि जिस भूमि पर स्वीकृति विवादित थी, वहां पिछले 6 वर्षों से वेयरहाउस संचालक द्वारा सरकारी भंडारण किया जा रहा है। यह तथ्य और भी गंभीर हो जाता है जब भंडारण के लिए नियमित रूप से झूठा शपथ-पत्र प्रस्तुत कर यह घोषित किया गया कि भूमि संबंधी कोई न्यायिक विवाद प्रचलित नहीं है।
उक्त पत्र इस संपूर्ण घटनाक्रम में प्रशासनिक जानकारी और अदालती प्रक्रियाओं के दोहरे इस्तेमाल की पुष्टि करता है — जो जनहित और पारदर्शिता की मूल आत्मा पर एक गहरी चोट है।
🔴 अधिकारियों का रुख सख्त – झूठे शपथ पत्र पर होगी कार्रवाई!
इस पूरे प्रकरण में एमपीडब्ल्यूएलसी (MPWLC) के जिला प्रबंधक दुर्गेश जाट का बयान भी विशेष महत्व रखता है। जनमत जागरण को दिए गए अपने आधिकारिक वक्तव्य में उन्होंने स्पष्ट किया:
“जो शपथ पत्र दिया गया है, और यदि वह झूठा सिद्ध होता है, तो संबंधित पक्ष के विरुद्ध वैधानिक कार्रवाई की जाएगी। हमने इस संबंध में कलेक्टर महोदय को मौखिक रूप से अवगत कराया था। उन्होंने निर्देश देते हुए नए स्टॉक का पेमेंट फिलहाल रोक दिया है।”
— दुर्गेश जाट, जिला प्रबंधक, MPWLC, आगर-मालवा
यह बयान केवल एक चेतावनी नहीं, बल्कि संकेत है कि अब प्रशासन की निगाहें भी पूरे मामले पर गंभीर हो चुकी हैं। भंडारण संबंधी झूठे शपथ पत्र देना एक कानूनी अपराध है और यदि इसके पीछे प्रशासनिक लापरवाही या प्रबंधन की मिलीभगत पाई जाती है, तो यह मामला और अधिक गंभीर रूप ले सकता है।



