धर्म की ज्योति से आलोकित नगर – बावड़ी के श्रीराम मंदिर में मनाया गया श्री मानस प्रचार संघ का 29वाँ वार्षिकोत्सव

🕉️ धर्म की ज्योति से आलोकित नगर – बावड़ी के श्रीराम मंदिर में मनाया गया श्री मानस प्रचार संघ का 29वाँ वार्षिकोत्सव
🪔 “तमसो मा ज्योतिर्गमय…” की भावना को साकार करता आस्था का यह अनुपम आयोजन

जनमत जागरण @ सोयतकलां।
सालों से निरंतर, बिना रुके, बिना थमे…
धूप हो या बारिश, गर्मी हो या शीत लहर – नगर के हृदयस्थल बावड़ी स्थित श्रीराम मंदिर में बीते 29 वर्षों से अखण्ड रामायण पाठ की परंपरा श्री राधेवेन्द्र सरकार की कृपा और श्री हनुमानजी के आशीर्वाद से अविराम रूप से चल रही है। इस नित्य श्रद्धा और सेवा की परंपरा का उनतीसवाँ वार्षिकोत्सव 27 जून को श्री मानस प्रचार संघ द्वारा अत्यंत भक्तिभाव से मनाया गया।

🔆 आयोजन की झलकियां – एक दिव्य यात्रा
👉 दोपहर 12 बजे: वैदिक मंत्रोच्चारों के साथ हवन अनुष्ठान से प्रारंभ हुआ कार्यक्रम।
👉 दोपहर 2 बजे: पूरे नगर के श्रद्धालुओं के साथ सामूहिक सुंदरकांड पाठ, जिसमें रामभक्ति का सागर उमड़ पड़ा।
👉 सायं 6 बजे: नगर में भव्य शोभायात्रा निकाली गई – जिसमें श्रीराम दरबार की झांकी, हनुमानजी की प्रतिमा, शंख, घंटा, मृदंग की ध्वनि और गुलाल की वर्षा ने आध्यात्मिक उत्सव को जीवंत कर दिया।
👉 सायं 7.30 बजे: प्रसादी वितरण के साथ समस्त श्रद्धालुजनों ने भक्ति और सेवा का पुण्य लाभ लिया।

🌸 मंदिर परिसर – एक अलौकिक अनुभव
इस अवसर पर श्रीराम की झांकी का दिव्य श्रृंगार नगरवासियों को स्तब्ध कर गया। ठीक उसी तरह श्री हनुमानजी की विशाल चमत्कारी मूर्ति को गेरुए वस्त्रों और फूलों की माला से सजाया गया।
भोलेनाथ महादेव की प्रतिमा को रुद्राभिषेक के पश्चात विशेष श्रृंगार में सुसज्जित किया गया – जिससे भक्तों को दिव्य अनुभूति हुई।
मंदिर प्रांगण में स्थित श्री गणेश मंदिर भी आकर्षक दीपों से जगमगा उठा।
⛲ आध्यात्मिक धरोहर – प्राचीन बावड़ी
यह मंदिर परिसर न केवल भक्ति का केंद्र है बल्कि प्राचीन बावड़ी के कारण आध्यात्मिक और सांस्कृतिक महत्व भी रखता है। बावड़ी, जल संरक्षण और धर्म की एक प्राचीन परंपरा का जीवंत प्रमाण है।
🏛️ धर्मस्व विभाग द्वारा संरक्षित धरोहर
यह मंदिर परिसर मध्यप्रदेश शासन के धर्मस्व विभाग के अंतर्गत आता है और मंदिर धर्मशाला की सुविधा भी इसी में अंतर्निहित है, जो यात्रियों और श्रद्धालुओं के लिए सेवा भाव का केंद्र बनी हुई है।

📜 आस्था की परंपरा – एक अनुकरणीय मिसाल
29 वर्षों से रामायण पाठ और मानस प्रचार का यह अभियान केवल धार्मिक अनुष्ठान नहीं, बल्कि नगर की आस्था, एकता और सांस्कृतिक चेतना का प्रतिनिधित्व करता है।
यह आयोजन सिर्फ एक ‘कार्यक्रम’ नहीं, बल्कि धर्म, संस्कृति और परंपरा का जीवंत महाकाव्य है – जो आने वाली पीढ़ियों को भी अपने मूल की स्मृति दिलाता रहेगा।
📜 मानस प्रचार संघ की ओर से कृतज्ञता संदेश:
श्री मानस प्रचार संघ के समस्त पदाधिकारियों ने इस भव्य और दिव्य आयोजन की सफलता पर समस्त नगरवासियों, श्रद्धालुजनों, सहयोगियों एवं सेवा में संलग्न रहे समर्पित जनों के प्रति हृदय से आभार व्यक्त किया है। संघ ने कहा कि यह आयोजन किसी एक संस्था का नहीं, अपितु पूरे नगर की आस्था, एकता और सेवा-भाव का प्रतीक है। राम नाम की यह अखंड धारा तभी संभव हो पाती है जब जनमानस स्वयं श्रद्धा बनकर प्रवाहित होता है। सभी पदाधिकारियों ने नगर की समरस संस्कृति और अध्यात्म के प्रति इस अटूट निष्ठा के लिए नगरवासियों को शुभकामनाएं देते हुए मंगलकामना की कि ऐसे आयोजन जन-जन के अंतःकरण को आलोकित करते रहें, यही सच्ची सेवा और सच्चा संकल्प है।
✍️ जनमत जागरण विशेष रिपोर्ट
“जहाँ रामकथा चलती है, वहाँ केवल कथा नहीं चलती – वहाँ समाज जागता है।”

🪔 सार्थक दृष्टिकोण से विशेष संपादकीय
“रामकथा जहाँ निरंतर बहे – वहाँ कलियुग का अंधकार भी हार मान लेता है”
“राम नाम मनि दीप धरु जीह देहरीं द्वार।
तुलसी भीतर बाहेरहुँ, जौं चाहसि उजियार॥”
जहाँ रामचरितमानस का पाठ अनवरत होता है, वहाँ न केवल वातावरण पावन हो जाता है, बल्कि जन-मन में भी दिव्यता का उदय होता है। राम नाम का दीपक जब किसी नगर या जीवन की देहरी पर जलता है, तो वहां से अज्ञान, कलह, दुख और अधर्म अपने आप ही पलायन कर जाते हैं।
सोयतकलाँ में श्री मानस प्रचार संघ द्वारा बीते 29 वर्षों से किए जा रहे अखंड रामायण पाठ की यह साधना केवल शाब्दिक नहीं, ऊर्जा और चेतना की सजीव धारा है। यह पाठ ‘श्रवण, मनन और चिंतन’ की ऐसी परंपरा का प्रतीक है, जो जीवन के अंधकार को आलोक में परिवर्तित कर देता है।
“जेहि कें बसि बिधि हरि जसु गावहिं।
सकल सुकृत फल भगति सुरावहिं॥”
(बालकाण्ड)
जहाँ रामकथा का नियमित गायन होता है, वहाँ विधाता तक भी विवश होकर कृपा बरसाते हैं। यह गायन सकल सुकृतों (सभी पुण्य फलों) को समेट लाता है और शुद्ध, निष्काम भक्ति का बीज हर हृदय में अंकुरित कर देता है।
रामायण केवल ग्रंथ नहीं – जीवन का विज्ञान है, संस्कृति का शास्त्र है, और धर्म का दीप है।
जब कोई नगर अथवा संस्था लगातार 29 वर्षों तक ‘अखंड रामायण’ का आयोजन करती है, तो उसका प्रभाव केवल श्रोता तक सीमित नहीं रहता। उसकी तरंगें वातावरण, विचार और व्यवहार तक को बदल देती हैं।
“जिनके रहत सदा उर भारा।
रामचरित अनुराग अपारा॥”
(उत्तरकाण्ड)
जो रामकथा के अनुराग में जीवन जीते हैं, उनके हृदयों में कभी अंधकार, भय और विषाद नहीं ठहरते। रामकथा की निरंतरता सकारात्मकता, शांति और संस्कारों की गंगा बनकर बहती है।
🌸 यह केवल धार्मिक आयोजन नहीं, यह नगर की आत्मा का उत्सव है।
जहाँ रामायण पाठ निरंतर होता है, वहाँ जीवन की व्यस्तता में भी मौन की मधुरता, ध्वनि में दिव्यता और समाज में सद्भावना बनी रहती है।
“रामसिंहासन बिराजे, सीता संग सुभाय।
गावत मंगल धुनि सुखद, बाजत सुरनिबाय॥”
(लव-कुश काण्ड)
सोचिए – जब शब्दों में राम, भावों में भक्ति और दिनचर्या में धर्म आ जाए, तो उस नगर का भविष्य कैसा होगा?
📝 सार्थक चिंतन:
👉 अखंड रामायण पाठ से वातावरण शुद्ध होता है, रोग-शोक दूर होते हैं।
👉 परिवारों में समरसता आती है, और नगर में नैतिक ऊर्जा का संचार होता है।
👉 भय, क्रोध, लोभ जैसे मानसिक विकार शांत होते हैं।
👉 संस्कारों की नींव बच्चों के मन में गहराई तक स्थापित होती है।
श्री मानस प्रचार संघ द्वारा यह परंपरा केवल स्मृति नहीं, संस्कारों की प्राणवायु है। यह अखंड पाठ आने वाले समय की धर्मनिष्ठ और चरित्रवान पीढ़ियों का बीज बो रहा है।
“रामकथा के स्वरूप में भविष्य का स्वर गूंजता है – और जब वह स्वर अखंड हो, तो समाज निःसंदेह आदर्श पथ पर अग्रसर होता है।”
✍️ राजेश कुमरावत ‘सार्थक’ – संपादक



