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विद्यालय या मलबे का ढांचा? | सुसनेर क्षेत्र के सरकारी स्कूलों में बच्चों की जान जोखिम में, सवालों के घेरे में सुसनेर का शिक्षा तंत्र

✍️ छात्र की कलम से – एक कराह…

“सर, छत से फिर गिरा प्लास्टर… किताबों पर पानी टपक रहा है… टॉयलेट की दीवार गिरने को है… लेकिन हम रोज़ आ जाते हैं, क्योंकि पढ़ना है… कुछ बनना है…”

ये शब्द हैं उस छोटे से बालक के, जो रोज़ अपने सपनों को साथ लेकर उस भवन में प्रवेश करता है जिसे ‘स्कूल’ कहते हैं, लेकिन जो अब एक खंडहर बन चुका है। न छत सुरक्षित, न दीवारें, न ज़मीन… और न ही प्रशासन की संवेदनशीलता।

क्या हमारे नौनिहालों की जान इतनी सस्ती है कि उन्हें जीर्ण-शीर्ण भवनों में बैठाकर पढ़ाई का नाम दिया जाए? क्या हम किसी और हादसे का इंतज़ार कर रहे हैं?

शासन के आदेश हैं, कलेक्टर के निर्देश भी हैं… लेकिन ज़मीन पर सब मौन है।

जहां एक ओर बच्चे खुले आसमान तले बैठकर “अबकी बार छत नहीं गिरे…” की प्रार्थना करते हैं, वहीं दूसरी ओर फाइलों में दबे प्रस्ताव और अधिकारियों की चुप्पी अगले हादसे की पटकथा लिख रही है।

📌 पढ़िए इसी विषय पर आधारित हमारी विशेष रिपोर्ट:
“सरकारी सिस्टम की चुप्पी और मासूमों की ज़िंदगियों के बीच झूलते प्रश्न – शिक्षा या शोक?”


ग्राउंड स्टोरी – शिक्षा पर संकट – सुसनेर – संवाददाता दीपक जैन


📌 समाचार विवरण:

छतों से गिरता प्लास्टर, झूलते सरिए, टपकती छतें और जर्जर दीवारों के बीच मासूमों का भविष्य गढ़ने की जिद – ये कोई उपन्यास की पंक्तियाँ नहीं, बल्कि सुसनेर विकासखंड की उन सरकारी शालाओं की हकीकत है जिनके भवनों को ‘डिस्मेंटल’ घोषित किया जा चुका है, लेकिन आज भी बच्चों को उन्हीं में बैठाकर पढ़ाया जा रहा है।

मध्यप्रदेश के आगर जिले में कुल 77 विद्यालय और सुसनेर ब्लॉक में 16 प्राथमिक विद्यालय ऐसे हैं जो जीर्ण-शीर्ण घोषित हो चुके हैं। इन स्कूलों में ना सिर्फ पढ़ाई खतरे में है, बल्कि बच्चों की जान भी हर रोज़ खतरे में पड़ रही है।


⚠️ क्या प्रशासन किसी हादसे का इंतज़ार कर रहा है?

राजस्थान के झालावाड़ जिले में हाल ही में हुए स्कूल हादसे के बाद भी, समीपवर्ती सुसनेर क्षेत्र में न तो सजगता दिखी, न गति।
कलेक्टर द्वारा जारी किए गए निर्देशों में स्पष्ट कहा गया कि:

  • जर्जर भवनों को तत्काल बंद किया जाए,
  • वैकल्पिक भवनों में संचालन सुनिश्चित किया जाए,
  • नवीन भवनों के लिए प्रस्ताव भेजे जाएं,
  • आवश्यकतानुसार आपदा प्रबंधन निधि, सांसद-विधायक निधि, CSR, DMF जैसे स्रोतों से निर्माण करवाया जाए।

लेकिन जमीनी हकीकत ये है कि 6 स्कूल ऐसे हैं जहां कोई वैकल्पिक भवन ही मौजूद नहीं है। मजबूरीवश शिक्षक बच्चों को खुले में पढ़ा रहे हैं या उसी जर्जर भवन में, जो किसी दिन खुद ‘पाठशाला की चिता’ बन सकता है।


📍 ये हैं वो 16 स्कूल जिनके भवन डिस्मेंटल घोषित हैं:

ग्राम खिंदिया खेड़ी, मगिसपुर, बड़िया, गुंदलावदा, पायली, खेजड़ाखेड़ी, लोधाखेड़ी, बराई, सादलपुर, खेरिया सोयत, करकड़िया, कादमी, अन्तरालिया, बाजना का खेड़ा, गुराड़ी सोयत, कन्या शाला सोयत (नगरीय केंद्र) शामिल हैं।

इनमें से कई स्कूल अब आंगनवाड़ी भवनों (2), माध्यमिक स्कूल के कक्षों (1), या 7 अतिरिक्त कक्षों में चलाए जा रहे हैं। लेकिन यह व्यवस्था भी सीमित और अस्थायी है।

👉 “सुसनेर ब्लॉक के भूतिया स्कूल” “लोधाखेड़ी-ढाबली जैसे गांवों में स्कुलो की सच्चाई”

कुछ स्कूल तो कब से ज़मींदोज़ हैं, लेकिन कागज़ों में अब भी “जीवित” हैं। लोधाखेड़ी, ढाबली और ऐसे कई स्कूल हैं जो पूरी तरह डिस्मेंटल हो चुके हैं—छतें नहीं, दीवारें नहीं, बच्चे कहीं और भटकते हैं, लेकिन विभाग ने उन्हें अब तक “घोषित बंद” करना भी ज़रूरी नहीं समझा। कागज़ों के आंकड़ों में सबकुछ दुरुस्त दिखाने की जिद, ज़मीनी हकीकत को कुचल रही है। क्या यह सिर्फ लापरवाही है या जानबूझकर किया गया अनदेखा अपराध?


🎙️ प्रशासन की प्रतिक्रिया:

“विकासखंड में कुल 187 शालाओं में से 16 के भवन जीर्ण-शीर्ण हैं। इनको अन्य भवनों में स्थानांतरित करने और नवीन भवन के प्रस्ताव भेजने के लिए जिला कलेक्टर द्वारा निर्देश प्राप्त हुए हैं।”
राधेश्याम पाटीदार, विकासखंड स्रोत समन्वयक, सुसनेर


🧠 सार्थक चिंतन:

स्कूल भवन केवल ईंटों से नहीं बनते, वे भविष्य के निर्माण स्थल होते हैं।
जब इन भवनों की नींव हिलने लगती है, तब समाज की बुनियाद भी चरमराने लगती है। यह केवल एक प्रशासनिक विफलता नहीं, बल्कि शिक्षा के मंदिरों में व्याप्त संवेदनहीनता की भयावह गूंज है।

प्रश्न यह नहीं कि प्रस्ताव भेजे गए या नहीं… प्रश्न यह है कि क्या व्यवस्था के पास हमारे बच्चों के सपनों के लिए समय है?


📷 फोटो दस्तावेज:

इस समाचार के साथ जुड़े वास्तविक तस्वीरें पूरे सुसनेर ब्लॉक के उन विद्यालयों की हैं जो शब्दों से ज्यादा चीखते हैं!
झड़ती छतें, गड्ढों वाले फर्श, खुले में पढ़ते बच्चे – ये दृश्य ही प्रशासन के मुंह पर सवाल हैं।


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