झालावाड़ स्कूल हादसा: 6 मासूमों की एक साथ उठी अर्थियाँ, एक बच्ची की चिता टायर जलाकर जलाई गई | सिस्टम की संवेदनहीनता पर उठते सवाल

झालावाड़ स्कूल हादसा: एक साथ उठी 6 बच्चों की अर्थी, चिता पर टायर जलाए गए; व्यवस्थाओं की चिता भी सुलगी!
“छोटे-छोटे बस्तों से उठी चिताएँ, और टायरों की आग में बुझा सिस्टम का सच…”
झालावाड़ के पीपलोदी में स्कूल के छत हादसे ने न केवल मासूम जीवन निगल लिए, बल्कि व्यवस्थाओं की पोल भी खोल दी। जहां एक ओर एक साथ छह अर्थियां उठीं और भाई-बहन की एक ही चिता सजाई गई, वहीं दूसरी ओर चांदपुरा भीलान में एक बच्ची का अंतिम संस्कार टायर जला कर किया गया – क्योंकि मुक्तिधाम में सूखी लकड़ियों तक का इंतज़ाम नहीं था। मातम में डूबे गांवों में कल से चूल्हे नहीं जले, लेकिन लापरवाही की चिता धधकती रही। क्या यही है ग्रामीण शिक्षा और आपदा प्रबंधन का चेहरा? क्या यही है अंतिम यात्रा का सरकारी सम्मान?
हृदयविदारक दृश्य: पीपलोदी में एक साथ उठीं छह अर्थियाँ

झालावाड़ जिले के मनोहर थाना उपखंड के पीपलोदी गांव में शुक्रवार को उस समय हृदय विदारक दृश्य देखने को मिला, जब स्कूल की जर्जर छत गिरने से जान गंवाने वाले छह मासूमों की अर्थियां एक साथ उठीं। गांव का कोई भी कोना ऐसा नहीं था जहां चीख-पुकार और मातमी सन्नाटा न पसरा हो।

हादसे के बाद एसपी और अन्य प्रशासनिक अधिकारियों की मौजूदगी में सुबह 5:00 बजे मृतकों के शव परिजनों को सौंपे गए। मनोहर थाना अस्पताल से शवों को अलग-अलग वाहनों से गांव लाया गया। शवों के पहुंचते ही घरों में कोहराम मच गया।
भाई-बहन का एक साथ अंतिम संस्कार

इस दर्दनाक हादसे में दो सगे भाई-बहन – कान्हा और मीना – भी शामिल थे। दोनों को एक ही अर्थी पर श्मशान घाट लाया गया और एक ही चिता पर अंतिम संस्कार किया गया। कुल मिलाकर पांच चिताओं पर छह बच्चों का संस्कार हुआ। सभी को उनके पिता द्वारा मुखाग्नि दी गई। चिताओं में आग लगते ही वहां मौजूद ग्रामीणों की रुलाई फूट पड़ी।
चूल्हे नहीं जले, गांव में मातम पसरा

ग्रामीणों ने बताया कि हादसे के बाद गांव में किसी भी घर में चूल्हा नहीं जला है। लोग गहरे सदमे में हैं। जिन परिवारों के बच्चे काल के गाल में समा गए, उनमें से कई के पास एक ही संतान थी। जिन बच्चों की जान गई, उनकी उम्र 7 से 10 साल के बीच थी और अधिकतर के माता-पिता मेहनत-मजदूरी कर जीवन यापन करते हैं।
चांदपुरा भीलान में हुआ एक बच्ची का अंतिम संस्कार — पर टायरों से!

इस हादसे में जान गंवाने वाली एक और बच्ची प्रियंका का अंतिम संस्कार गांव चांदपुरा भीलान में किया गया। लेकिन यहां हालात और भी शर्मनाक थे। बरसात के चलते सारी लकड़ियां गीली थीं और मुक्तिधाम में लकड़ी भंडारण का कोई इंतज़ाम नहीं था। ऐसे में ग्रामीणों को मजबूरी में टायर, राल, कंडे और घी का सहारा लेना पड़ा ताकि चिता जल सके।
व्यवस्था पर बड़ा सवाल: सूखी लकड़ी तक उपलब्ध नहीं
ग्रामीणों का कहना है कि मुक्तिधाम में न छाया है, न लकड़ी रखने की व्यवस्था। बारिश में लकड़ियां भीग जाती हैं और अंतिम संस्कार में कठिनाइयाँ आती हैं। यह समस्या नई नहीं है, लेकिन प्रशासन ने कभी ध्यान नहीं दिया। आखिर ऐसे में ग्रामीण क्या करें? क्या अपने बच्चों की चिता को भी जलाने के लिए अब टायर और पेट्रोल ही सहारा बनेंगे?
- जब स्कूल भवनों की मरम्मत का बजट खर्च नहीं हो पाता और बच्चों की जान जाती है — तो दोष किसका है?
- जब अंतिम संस्कार के लिए भी व्यवस्था नहीं और टायरों का सहारा लिया जाता है — तो यह किसकी संवेदनहीनता है?

🔷 सार्थक चिंतन | संपादक की दृष्टि से
(राजेश कुमरावत ‘सार्थक’ )
“जब मासूम चिताएँ एक साथ धधकें, और अग्नि देने के लिए टायर जलाने पड़ें – तब समझिए कि सिर्फ बच्चे नहीं जले, व्यवस्था भी राख हो गई है।”
शिक्षा का मंदिर कब कब्रगाह बन गया, किसी को पता नहीं चला। और अंतिम संस्कार की आग भी व्यवस्था की लाचारी से भीग गई। क्या यही है प्रशासन की तैयारी?
जब भवन गिरता है, तो वह ईंटों से नहीं – नीतियों की दरारों से गिरता है। जब चिताएं सूखी लकड़ियों के बिना जलती हैं, तो केवल शरीर नहीं – सम्मान भी जलता है।
अब समय आ गया है कि सवाल सिर्फ जांच बैठाने का नहीं, जवाबदेही तय करने का है।
बच्चों की मौत एक हादसा नहीं, संवेदनहीन सिस्टम का लिखा हुआ वह शोकगीत है, जिसे हर गांव रोज सुन रहा है – और चुप है।
कब जागेगा यह पत्थर बन चुका प्रशासनिक मन…? या हर चिता को टायरों से जलाना हमारी नियति बन जाएगी?



